पत्नी ने समझौते में छोड़ा था मेंटेनेंस का दावा, बाद में DV Act के तहत दोबारा नहीं मांग सकती: सुप्रीम कोर्ट

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वैध समझौते में अपने भरण-पोषण और अन्य मौद्रिक दावों को स्पष्ट रूप से छोड़ दिया

सुप्रीम कोर्ट ने Reji Baby v. Subi Mary में कहा कि वैध वैवाहिक समझौते में पत्नी द्वारा स्वेच्छा से छोड़ा गया भरण-पोषण व मौद्रिक दावा बाद में घरेलू हिंसा कानून के तहत पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता। हालांकि, समझौते की पक्षकार न रही बालिग बेटी के स्वतंत्र अधिकार बरकरार रहेंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि पत्नी ने वैवाहिक विवाद के निपटारे के लिए किए गए वैध समझौते में अपने भरण-पोषण और अन्य मौद्रिक दावों को स्पष्ट रूप से छोड़ दिया है और बाद में फैमिली कोर्ट के समक्ष भी इस त्याग की पुष्टि की है, तो वह उन्हीं पुराने दावों को Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005 (DV Act) की कार्यवाही के जरिए दोबारा जीवित नहीं कर सकती।

जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने केरल हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए पति के खिलाफ लंबित DV Act की कार्यवाही quash कर दी। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बालिग बेटी, जो समझौते की पक्षकार नहीं थी, उसके स्वतंत्र मौद्रिक अधिकार समाप्त नहीं हुए हैं।

23 जुलाई 2016 के समझौते में पत्नी ने छोड़े थे सभी मौद्रिक दावे

मामले में पति-पत्नी ने 23 जुलाई 2016 को अपने वैवाहिक विवादों के निपटारे के लिए एक Settlement Agreement किया था। समझौते में पत्नी ने पति के खिलाफ अपने मौद्रिक दावों, जिसमें maintenance का दावा भी शामिल था, को छोड़ दिया था।

समझौते में यह भी दर्ज था कि दोनों पक्षों के बीच सभी मौद्रिक लेन-देन समाप्त हो चुके हैं और भविष्य में कोई भी पक्ष दूसरे के खिलाफ किसी प्रकार का मौद्रिक दावा नहीं करेगा।

इसके बाद दोनों ने Divorce Act, 1869 की Section 10-A के तहत आपसी सहमति से तलाक की कार्यवाही शुरू की। 30 जनवरी 2017 को तलाक की डिक्री पारित हुई।

इससे पहले, 24 जनवरी 2017 को पत्नी ने फैमिली कोर्ट में एक affidavit भी दाखिल किया था। इसमें उसने पुष्टि की कि सभी दावे और देनदारियां निपट चुकी हैं तथा उसने maintenance का दावा छोड़ दिया है। उसने यह भी कहा था कि भविष्य में वैवाहिक संबंध से कोई दावा या liability नहीं होगी और तलाक की कार्यवाही उसकी स्वतंत्र इच्छा से हो रही है, उसमें कोई coercion या undue influence नहीं है।

तलाक और समझौते के बाद शुरू हुई DV Act की कार्यवाही

समझौते और तलाक के बावजूद बाद में पत्नी की ओर से DV Act के तहत कार्यवाही शुरू की गई।

पति ने केरल हाईकोर्ट में इन proceedings को quash करने की मांग की, लेकिन हाईकोर्ट ने 26 अक्टूबर 2018 को उनकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

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पति की ओर से दलील दी गई कि पत्नी पहले ही अपने सभी मौद्रिक दावों को छोड़ चुकी थी और बाद की DV कार्यवाही उसी settled dispute को फिर से खोलने का प्रयास थी।

पत्नी ने कहा- समझौता दबाव में कराया गया था

पत्नी की ओर से स्वीकार किया गया कि उसने समझौते में अपने मौद्रिक दावों को छोड़ा था। हालांकि, उसका तर्क था कि समझौता दबाव (duress) में कराया गया था।

दलील दी गई कि परिवार अमेरिका जाने की तैयारी में था और जल्दी तलाक लेने की आवश्यकता के कारण पत्नी ने पति की शर्तें स्वीकार कीं।

यह भी कहा गया कि बिना maintenance या अन्य पर्याप्त consideration के statutory और fundamental rights को छोड़ने वाला समझौता public policy के खिलाफ है और इसलिए बाध्यकारी नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट: केवल coercion का आरोप पर्याप्त नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया।

कोर्ट ने महत्वपूर्ण रूप से कहा कि पत्नी ने केवल settlement agreement पर हस्ताक्षर ही नहीं किए थे, बल्कि बाद में फैमिली कोर्ट के समक्ष affidavit देकर भी उन्हीं शर्तों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि की थी।

इस affidavit में उसने साफ कहा था कि:

  • सभी दावे और liabilities समाप्त हो चुकी हैं;
  • उसने maintenance का दावा छोड़ दिया है;
  • भविष्य में वैवाहिक संबंध से कोई दावा नहीं होगा;
  • तलाक की कार्यवाही स्वेच्छा से की जा रही है;
  • उस पर कोई coercion या undue influence नहीं है।

ऐसी स्थिति में बाद में केवल यह कहना कि समझौता दबाव में हुआ था, अपने आप समझौते के कानूनी प्रभाव को समाप्त नहीं कर सकता।

कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि पत्नी ने समझौते या तलाक की डिक्री को चुनौती देने के लिए कोई स्वतंत्र कानूनी कार्यवाही नहीं की थी।

पुराने विवाद को DV Act के जरिए दोबारा नहीं खोला जा सकता

पीठ ने कहा कि इस मामले में कथित domestic violence की घटनाएं समझौते से पहले की थीं। ऐसा कोई नया cause of action नहीं बताया गया था जो settlement या divorce के बाद उत्पन्न हुआ हो।

इसलिए कोर्ट के अनुसार, DV Act की proceedings का उद्देश्य किसी नए विवाद का निपटारा करना नहीं बल्कि पहले से settled claims को फिर से उठाना था।

सुप्रीम कोर्ट ने इसे abuse of process of law माना।

Dhananjay Rathi v. Ruchika Rathi का भी हवाला

सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया फैसले Dhananjay Rathi v. Ruchika Rathi (2026) पर भी भरोसा किया। कोर्ट ने दोहराया कि वैध settlement agreement पक्षकारों को उसकी शर्तों से बांधता है।

यदि settlement के बाद उसका उल्लंघन होता है तो कानून के अनुसार उचित remedy उपलब्ध हो सकती है, लेकिन settlement को पूरी तरह नजरअंदाज कर उन्हीं दावों को नई कार्यवाही के जरिए पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता।

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लेकिन बेटी के अधिकार खत्म नहीं हुए

इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी और बेटी के अधिकारों को अलग-अलग माना।

बेटी settlement agreement की पक्षकार नहीं थी। इसके अलावा, वह समझौता होने से पहले ही बालिग हो चुकी थी

इसलिए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि माता-पिता के बीच हुए settlement के आधार पर बेटी के स्वतंत्र अधिकारों को समाप्त नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने उसे कानून के अनुसार पति के खिलाफ अपने स्वतंत्र मौद्रिक दावों के लिए नई कार्यवाही शुरू करने की स्वतंत्रता दी।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने:

  1. केरल हाईकोर्ट का 26 अक्टूबर 2018 का आदेश रद्द किया;
  2. पति के खिलाफ लंबित DV Act proceedings को quash कर दिया;
  3. माना कि पत्नी द्वारा settlement और Family Court affidavit में स्वेच्छा से छोड़े गए maintenance एवं monetary claims को बाद की DV proceedings में पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता;
  4. स्पष्ट किया कि केवल बाद में लगाए गए coercion के आरोप, बिना settlement या divorce decree को स्वतंत्र रूप से चुनौती दिए, पर्याप्त नहीं हैं;
  5. बालिग बेटी के स्वतंत्र अधिकारों को सुरक्षित रखा और उसे कानून के अनुसार fresh proceedings शुरू करने की अनुमति दी।

कानूनी महत्व

यह फैसला इस सिद्धांत को मजबूत करता है कि वैध और स्वेच्छा से किए गए matrimonial settlement को बाद में उसी cause of action के आधार पर DV Act की कार्यवाही के जरिए circumvent नहीं किया जा सकता। हालांकि, settlement केवल उन्हीं पक्षकारों के अधिकारों को प्रभावित करेगा जिन्होंने उसमें भाग लिया है; किसी तीसरे व्यक्ति, विशेषकर बालिग संतान, के स्वतंत्र कानूनी अधिकार स्वतः समाप्त नहीं होते।

केस: Reji Baby v. Subi Mary
पीठ: Justice Sandeep Mehta एवं Justice Manmohan
निर्णय: 24 अगस्त 2026

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