पत्नी के करियर को ‘क्रूरता’ मानने पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी कहा कि “महिला की पहचान सिर्फ पत्नी नहीं”

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तलाक बरकरार, लेकिन आधार बदला – करियर चुनने पर क्रूरता का आरोप हटाया

सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाई कोर्ट और फैमिली कोर्ट के उन निष्कर्षों को रद्द कर दिया, जिनमें एक दंत चिकित्सक पत्नी के करियर और अलग रहने को ‘क्रूरता’ और ‘परित्याग’ माना गया था। कोर्ट ने कहा कि विवाह महिला की व्यक्तिगत और पेशेवर पहचान को खत्म नहीं करता।


पत्नी के करियर को ‘क्रूरता’ मानने पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण वैवाहिक विवाद मामले में कहा है कि किसी शिक्षित और पेशेवर महिला द्वारा अपना करियर जारी रखना या अपने बच्चे के बेहतर पालन-पोषण और चिकित्सा सुविधा के लिए अलग रहना “क्रूरता” या “परित्याग” नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने गुजरात हाई कोर्ट और फैमिली Court द्वारा पत्नी के खिलाफ दर्ज “क्रूरता” और “डेजर्शन” (परित्याग) संबंधी निष्कर्षों को रद्द करते हुए कहा कि निचली अदालतों का दृष्टिकोण “रूढ़िवादी, पितृसत्तात्मक और 21वीं सदी के संवैधानिक मूल्यों के विपरीत” था।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने विवाह को “irretrievable breakdown of marriage” यानी वैवाहिक संबंधों के पूरी तरह टूट जाने के आधार पर समाप्त रखने का फैसला बरकरार रखा।


क्या था मामला?

मामला एक दंपत्ति के बीच लंबे समय से चल रहे वैवाहिक विवाद से जुड़ा था। पत्नी पेशे से दंत चिकित्सक (डेंटिस्ट) थीं, जबकि पति भारतीय सेना में अधिकारी थे।

दोनों की शादी 3 सितंबर 2009 को हुई थी। पत्नी ने पुणे में अपना डेंटल क्लीनिक स्थापित किया था, जहां पति की पोस्टिंग थी। बाद में पति का तबादला कारगिल हो गया, जिसके बाद पत्नी ने अपना क्लीनिक बंद कर उनके साथ जाना स्वीकार किया।

कारगिल में गर्भावस्था के दौरान पर्याप्त चिकित्सा सुविधाओं के अभाव और स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के कारण पत्नी अहमदाबाद लौट आईं। बाद में बेटी के जन्म और उसके स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं के चलते पत्नी ने बेहतर चिकित्सा और सुरक्षित वातावरण के लिए अलग रहने का फैसला किया।

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इसी बीच पति ने फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर करते हुए पत्नी पर “क्रूरता” और “परित्याग” के आरोप लगाए। फैमिली कोर्ट ने पति के पक्ष में फैसला देते हुए तलाक दे दिया, जिसे गुजरात हाई कोर्ट ने भी बरकरार रखा।


“विवाह महिला की पहचान खत्म नहीं करता”: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों की सोच पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि विवाह के बाद महिला की स्वतंत्र पहचान समाप्त नहीं हो जाती।

अदालत ने कहा:

“हम 21वीं सदी में हैं, फिर भी एक योग्य महिला द्वारा अपना पेशेवर करियर जारी रखने और अपने बच्चे के बेहतर भविष्य के लिए सुरक्षित वातावरण चुनने को क्रूरता और परित्याग माना गया।”

पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी महिला से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह केवल इसलिए अपने करियर और पेशेवर आकांक्षाओं का त्याग कर दे क्योंकि उसके पति की पोस्टिंग किसी दूरस्थ क्षेत्र में है।


अदालत ने निचली अदालतों की सोच को बताया ‘पितृसत्तात्मक’

सुप्रीम कोर्ट ने फैमिली कोर्ट की उस टिप्पणी को भी अनुचित बताया, जिसमें कहा गया था कि पत्नी का अपने पति और ससुराल वालों को बताए बिना क्लीनिक खोलना “क्रूरता” है।

कोर्ट ने कहा कि यह दृष्टिकोण “पुरुष वर्चस्ववादी” मानसिकता को दर्शाता है।

पीठ ने कहा:

“महिला अब पति के घर की मात्र परिशिष्ट (appendage) नहीं मानी जा सकती। उसकी स्वतंत्र पेशेवर और बौद्धिक पहचान को सम्मान मिलना चाहिए।”


बेटी की चिकित्सा जरूरतों को भी माना महत्वपूर्ण

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पत्नी का अलग रहना केवल अपने करियर के लिए नहीं, बल्कि नाबालिग बेटी की स्वास्थ्य जरूरतों और सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करने के लिए भी था।

अदालत ने माना कि कारगिल जैसे दूरस्थ क्षेत्र में विशेष चिकित्सा सुविधाओं की कमी वास्तविक चिंता थी और पत्नी का निर्णय जिम्मेदार अभिभावकत्व (responsible parenthood) का हिस्सा था।


धर्म परिवर्तन के आरोप भी खारिज

पति ने पत्नी पर ईसाई धर्म अपनाने के लिए दबाव डालने का आरोप भी लगाया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई विश्वसनीय साक्ष्य नहीं है, जिससे इन आरोपों की पुष्टि हो सके।

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परजरी (Perjury) की मांग भी ठुकराई

पति ने पत्नी के खिलाफ कथित झूठे बयान देने के आधार पर धारा 195 और 340 CrPC के तहत परजरी कार्रवाई की मांग की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को “व्यक्तिगत दुर्भावना और वैवाहिक कटुता” से प्रेरित बताते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं है जिससे झूठी गवाही का अपराध बनता हो।


तलाक बरकरार, लेकिन आधार बदला

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी के खिलाफ “क्रूरता” और “परित्याग” के सभी निष्कर्ष हटा दिए, लेकिन यह देखते हुए कि दोनों पक्ष अब साथ नहीं रहना चाहते और पति ने दोबारा विवाह कर लिया है, अदालत ने तलाक को “irretrievable breakdown of marriage” के आधार पर बरकरार रखा।


फैसले का महत्व

यह फैसला वैवाहिक विवादों में महिलाओं की पेशेवर स्वतंत्रता, व्यक्तिगत पहचान और संवैधानिक गरिमा को लेकर एक महत्वपूर्ण न्यायिक संदेश माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आधुनिक समाज में विवाह का अर्थ महिला की स्वतंत्रता और करियर का अंत नहीं है।


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