कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट के विशेष अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर डीएलएसए ने कानून का उल्लंघन किया और यांत्रिक तरीके से आदेश पारित किए
Meta Description: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोक अदालत और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) को तलाक का डिक्री देने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट के विशेष अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर डीएलएसए ने कानून का उल्लंघन किया और यांत्रिक तरीके से आदेश पारित किए।
लोक अदालत की सीमाओं पर हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि लोक अदालत (Lok Adalat) और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) को विवाह विच्छेद (तलाक) का डिक्री देने का कोई अधिकार नहीं है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पक्षकारों के बीच किसी भी प्रकार का वैध तलाक कभी हुआ ही नहीं था और लोक अदालत केवल समझौते को प्रोत्साहित कर सकती है, लेकिन वह फैमिली कोर्ट के विशेष अधिकार क्षेत्र का प्रयोग नहीं कर सकती।
न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अभदेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने डीएलएसए, उन्नाव की कार्यप्रणाली की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि उसने बिना कानूनी जांच-पड़ताल किए ऐसे समझौते को स्वीकार कर लिया जिसमें पक्षकारों को पुनर्विवाह की अनुमति दी गई थी, जबकि ऐसा प्रावधान कानूनन अस्वीकार्य है।
कोर्ट ने कहा—
“लोक अदालत/डीएलएसए ने एक सक्षम न्यायालय की शक्तियों का अतिक्रमण किया है और ऐसा कार्य किया है जिसकी उसे कानून के तहत कोई अनुमति नहीं थी।”
क्या था पूरा मामला?
विवाद की शुरुआत तब हुई जब पति ने उन्नाव जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) के समक्ष एक पूर्व-विवाद (Pre-Litigation) आवेदन प्रस्तुत किया। 1 जून 2018 को नोटिस जारी किया गया और 12 जून 2018 को मामला मध्यस्थता (Mediation) के लिए भेज दिया गया।
मध्यस्थता के दौरान एक समझौता तैयार किया गया, जिसमें तलाक से संबंधित शर्तें शामिल थीं। इसके बाद डीएलएसए ने 14 जुलाई 2018 को उस समझौते के आधार पर मामले का निस्तारण कर दिया।
पत्नी का आरोप था कि समझौते से संबंधित दस्तावेजों पर उसके हस्ताक्षर धोखे से कराए गए थे। बाद में पति ने इसी समझौते का सहारा लेकर दावा किया कि दोनों का आपसी सहमति से तलाक हो चुका है और इसी आधार पर उसने दूसरी शादी भी कर ली।
समझौते के बाद भी पति-पत्नी साथ रह रहे थे
पत्नी ने हाईकोर्ट को बताया कि कथित समझौते और डीएलएसए के आदेश के बावजूद दोनों पति-पत्नी के रूप में साथ रह रहे थे। इतना ही नहीं, 22 नवंबर 2019 को उनके यहां एक पुत्री का जन्म भी हुआ।
जब पति ने दूसरी शादी को सही ठहराने के लिए डीएलएसए के आदेश का सहारा लिया, तब पत्नी ने डीएलएसए के समक्ष पुनर्विचार याचिका दायर की। हालांकि 30 जून 2025 को डीएलएसए ने आवेदन खारिज करते हुए कहा कि उसके आदेश में कहीं भी विवाह को शून्य घोषित नहीं किया गया था।
इसके बाद पत्नी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया।
तलाक संबंधी मामलों पर लोक अदालत का कोई अधिकार नहीं
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (लोक अदालत) विनियम, 2009 का विस्तृत परीक्षण किया।
कोर्ट ने कहा कि विनियम 10(2) के प्रावधान के अनुसार तलाक से जुड़े मामलों को लोक अदालत में भेजा ही नहीं जा सकता। जब तलाक का विवाद लोक अदालत के समक्ष विचारणीय ही नहीं है, तो वह तलाक का डिक्री देने का दावा भी नहीं कर सकती।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि लोक अदालत का कार्य केवल समझौते को सुगम बनाना है, न कि न्यायिक निर्णय देना।
पुनर्विवाह की अनुमति वाला समझौता पाया गया अवैध
कोर्ट ने पाया कि समझौते में एक शर्त यह भी थी कि दोनों पक्ष भविष्य में स्वतंत्र रूप से पुनर्विवाह कर सकते हैं।
इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा प्रावधान पूरी तरह अवैध है, क्योंकि बिना सक्षम न्यायालय द्वारा वैधानिक तलाक दिए किसी भी पक्ष को पुनर्विवाह का अधिकार नहीं मिल सकता।
अदालत ने कहा कि यह समझ से परे है कि ऐसी शर्त लोक अदालत के सदस्यों की नजर से कैसे गुजर गई और उसे स्वीकार कैसे कर लिया गया।
डीएलएसए के आदेशों को बताया यांत्रिक और बिना विचार के पारित
हाईकोर्ट ने 12 जुलाई 2018 और 14 जुलाई 2018 के डीएलएसए आदेशों को अत्यंत संक्षिप्त, यांत्रिक और बिना किसी कानूनी विचार-विमर्श के पारित बताया।
कोर्ट ने कहा कि आदेशों में न तो कानून का उचित परीक्षण किया गया और न ही यह देखा गया कि समझौते की शर्तें वैध हैं या नहीं।
पीठ ने कहा कि लोक अदालतों को केवल उन्हीं समझौतों को स्वीकार करना चाहिए जो उनके समक्ष विधिवत और स्वेच्छा से संपन्न हुए हों तथा जिनकी शर्तें कानूनसम्मत हों।
जल्दबाजी में पूरी की गई प्रक्रिया पर भी सवाल
हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि नोटिस जारी होने, मध्यस्थता के लिए संदर्भित किए जाने और समझौता संपन्न होने की पूरी प्रक्रिया अत्यंत कम समय में पूरी कर दी गई।
अदालत ने कहा कि विशेष रूप से वैवाहिक विवादों में लोक अदालतों को संवेदनशीलता, धैर्य और कानूनी सतर्कता के साथ कार्य करना चाहिए। केवल मामलों के शीघ्र निस्तारण के उद्देश्य से कानूनी सुरक्षा उपायों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने टिप्पणी की—
“वैवाहिक मामलों में वास्तव में कोई पक्ष विजेता नहीं होता। यह पति-पत्नी दोनों और विवाह संस्था, सभी के लिए एक प्रकार की हार होती है। इसलिए लोक अदालतों को ऐसे मामलों में अत्यधिक संवेदनशील और सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।”
फैमिली कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप
अदालत ने कहा कि डीएलएसए और लोक अदालत ने प्रभावी रूप से फैमिली कोर्ट के उस विशेष अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया, जो केवल विवाह विच्छेद (तलाक) संबंधी मामलों के निर्णय के लिए आरक्षित है।
कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार के आदेशों से न केवल पक्षकारों के अधिकार प्रभावित होते हैं, बल्कि अनावश्यक मुकदमेबाजी और कानूनी जटिलताएं भी पैदा होती हैं।
हाईकोर्ट का अंतिम फैसला
हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से घोषित किया कि पत्नी और पति के बीच कभी कोई वैध तलाक डिक्री पारित नहीं हुई थी। इसलिए पति द्वारा समझौते को तलाक का आधार बताना कानूनन स्वीकार्य नहीं है।
हालांकि अदालत ने रिट याचिका खारिज कर दी, लेकिन पत्नी को कानून के तहत उपलब्ध अन्य उपायों का सहारा लेने की स्वतंत्रता प्रदान की।
इसके साथ ही न्यायालय ने निर्देश दिया कि इस निर्णय की प्रति उत्तर प्रदेश की सभी लोक अदालतों और जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों को भेजी जाए, ताकि भविष्य में ऐसी त्रुटियों से बचा जा सके।
निर्णय का महत्व
यह फैसला स्पष्ट करता है कि लोक अदालतें विवादों के सौहार्दपूर्ण समाधान का मंच हैं, न कि वे नियमित न्यायालयों के अधिकारों का प्रयोग कर सकती हैं। विशेष रूप से वैवाहिक मामलों में, तलाक का डिक्री केवल सक्षम फैमिली कोर्ट ही दे सकता है और किसी भी समझौते के आधार पर विवाह स्वतः समाप्त नहीं माना जा सकता।
मामला: Sushma Devi v. State of U.P.
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