तेलंगाना हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट जज की अनिवार्य सेवानिवृत्ति रद्द की, कहा- सजा ‘अत्यधिक कठोर और चौंकाने वाली रूप से असंगत’

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ट्रायल कोर्ट जज को दी गई अनिवार्य सेवानिवृत्ति की सजा को रद्द

तेलंगाना हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट जज की 2018 की अनिवार्य सेवानिवृत्ति रद्द करते हुए कहा कि साबित misconduct के मुकाबले सजा अत्यधिक कठोर थी। जज को बिना back wages बहाल करने का आदेश दिया।

तेलंगाना हाईकोर्ट ने एक ट्रायल कोर्ट जज को दी गई अनिवार्य सेवानिवृत्ति की सजा को रद्द करते हुए उनकी बहाली का आदेश दिया है। जस्टिस पी. सैम कोशी और नरसिम्हा राव नंदिकोंडा की डिवीजन बेंच ने कहा कि जज के खिलाफ साबित हुआ misconduct ऐसा नहीं था, जिसके लिए compulsory retirement जैसी कठोर सजा उचित ठहराई जा सके।

अदालत ने टिप्पणी की कि सजा “unduly harsh and shockingly disproportionate” यानी अनुचित रूप से कठोर और चौंकाने वाली रूप से असंगत थी।

हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जज के आचरण को सही नहीं माना गया है। उन्हें बिना back wages बहाल किया जाएगा और शेष प्रशिक्षण पूरा करना होगा।

पुलिस चेकिंग के दौरान विवाद से शुरू हुआ मामला

मामला मार्च 2014 की एक घटना से जुड़ा था। संबंधित न्यायिक अधिकारी उस समय अपेक्षाकृत युवा थे और न्यायिक सेवा में अपने पहले पदस्थापन पर थे।

18 मार्च 2014 को छुट्टी के बाद कोर्ट जाते समय चुनाव संबंधी जांच के दौरान पुलिसकर्मियों ने उनकी सरकारी गाड़ी को एक चेकपोस्ट पर रोका। जज ने इस घटना की शिकायत प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश से की और बाद में हाईकोर्ट का भी रुख किया।

इसके बाद उनके खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू हुई और छह आरोप तय किए गए।

विभागीय जांच अधिकारी ने 8 अगस्त 2016 की रिपोर्ट में केवल दो आरोपों को साबित माना, जबकि बाकी आरोप साबित नहीं पाए गए।

बाद में अनुशासनिक प्राधिकारी ने कुछ निष्कर्षों से असहमति जताई और अंततः 2018 में राज्य सरकार ने उन्हें compulsory retirement की सजा दे दी।

हाईकोर्ट ने दो आरोपों को माना साबित

हाईकोर्ट ने पुलिस चेकपोस्ट पर जज के व्यवहार से संबंधित दो आरोपों को कायम रखा।

कोर्ट के अनुसार, पुलिसकर्मी उस समय Model Code of Conduct के तहत अपने आधिकारिक कर्तव्य का निर्वहन करते हुए वाहन की जांच कर रहे थे। जज की पहचान सामने आने के बाद पुलिसकर्मियों ने खेद भी व्यक्त किया था।

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अदालत ने कहा कि एक न्यायिक अधिकारी और जिम्मेदार लोक सेवक से अपेक्षा की जाती है कि वह पुलिस के साथ सहयोग करे। जांच अधिकारी द्वारा उनके व्यवहार को rude और discourteous पाया जाना न्यायिक सेवा के सदस्य से अपेक्षित restraint और dignity के अनुरूप नहीं था।

इसलिए इन आरोपों को misconduct माना गया।

बाकी आरोपों पर अनुशासनिक प्राधिकारी का निष्कर्ष खारिज

हालांकि, जज पर लगाए गए अन्य आरोपों—जिनमें कथित तौर पर toll staff को रोकना और कोर्ट से अनुपस्थित रहना शामिल था—पर हाईकोर्ट ने अनुशासनिक प्राधिकारी के निष्कर्षों को स्वीकार नहीं किया।

कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी द्वारा इन आरोपों को साबित नहीं मानने के निष्कर्ष से अलग जाने के लिए कोई cogent reason या स्वतंत्र material उपलब्ध नहीं था।

इसलिए इन आरोपों को साबित मानने का निष्कर्ष “wholly unsustainable” बताते हुए हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी की मूल रिपोर्ट बहाल कर दी।

‘जजों के आचरण के मानक ऊंचे होने चाहिए’

हाईकोर्ट ने हालांकि जज को राहत देते समय न्यायिक अधिकारियों के लिए आचरण के उच्च मानकों पर विशेष जोर दिया।

अदालत ने कहा कि Bench पर और Bench के बाहर—दोनों जगह न्यायिक अधिकारी का आचरण dignity, restraint, impartiality और propriety के उच्चतम मानकों के अनुरूप होना चाहिए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि समाज में बदलाव के बावजूद judicial standards को कमजोर नहीं किया जा सकता। Courtesy, civility, patience, restraint, tolerance और impartiality न्यायिक पद की बुनियादी अपेक्षाएं हैं।

साथ ही, अदालत ने यह महत्वपूर्ण तथ्य माना कि संबंधित अधिकारी बहुत युवा न्यायिक अधिकारी थे, अपने पहले स्टेशन पर कार्यरत थे और अभी probation पर थे।

Corruption या dishonest motive नहीं था

Compulsory retirement को असंगत बताते हुए हाईकोर्ट ने misconduct की प्रकृति पर भी गौर किया।

कोर्ट ने कहा कि मामले में:

  • भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं था;
  • integrity पर सवाल नहीं उठाया गया था;
  • moral turpitude का आरोप नहीं था;
  • न्यायिक पद का निजी लाभ के लिए दुरुपयोग नहीं हुआ था;
  • किसी dishonest motive का आरोप नहीं था।

इन परिस्थितियों में कोर्ट ने माना कि साबित misconduct के लिए Rule 9(8), Andhra Pradesh Civil Services (CCA) Rules, 1991 के तहत compulsory retirement जैसी कठोर सजा उचित नहीं थी।

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बहाली होगी, लेकिन Back Wages नहीं

हाईकोर्ट ने 4 जनवरी 2018 के compulsory retirement order और उससे संबंधित 5 जनवरी 2018 के आदेश को रद्द कर दिया।

जज को उनके पद पर बहाल करने का निर्देश दिया गया।

हालांकि कोर्ट ने उन्हें उस अवधि के लिए back wages या अन्य consequential monetary/service benefits देने से इनकार कर दिया, जब वे सेवा से बाहर रहे।

अदालत ने “No Work, No Pay” के सिद्धांत को लागू करते हुए कहा कि सेवा से बाहर रहना और अब मूल पद पर बहाल होना, साबित आरोपों के लिए एक प्रकार की सजा माना जा सकता है।

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि:

  1. उनकी seniority बहाली की तारीख से तय की जाए;
  2. उन्हें शेष judicial training पूरी करनी होगी;
  3. पिछली अवधि के लिए back wages नहीं मिलेंगे।

फैसले का कानूनी महत्व

यह फैसला judicial disciplinary proceedings में proportionality of punishment के सिद्धांत को रेखांकित करता है। हाईकोर्ट ने एक ओर न्यायिक अधिकारियों के लिए उच्च आचरण मानकों को स्वीकार किया, लेकिन दूसरी ओर यह भी स्पष्ट किया कि हर misconduct के लिए सबसे कठोर दंड नहीं दिया जा सकता।

विशेष रूप से, जब misconduct में भ्रष्टाचार, बेईमानी, नैतिक अधमता या पद के निजी लाभ के लिए दुरुपयोग जैसे गंभीर तत्व मौजूद न हों, तो disciplinary authority द्वारा दी गई सजा को उसकी गंभीरता के अनुपात में होना चाहिए।

फैसला: तेलंगाना हाईकोर्ट, जस्टिस पी. सैम कोशी एवं जस्टिस नरसिम्हा राव नंदिकोंडा, आदेश दिनांक 18 अगस्त 2026

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