समझौते के बाद धोखाधड़ी का केस खत्म
झारखंड हाई कोर्ट ने धारा 420 IPC के तहत दर्ज आपराधिक मामले को पक्षकारों के बीच हुए समझौते के आधार पर रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि निजी विवाद पूरी तरह सुलझ जाने के बाद मुकदमा जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
झारखंड हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी निजी विवाद से जुड़े आपराधिक मामले में पक्षकारों के बीच वास्तविक और स्वैच्छिक समझौता हो जाता है, तो ऐसे मामले की सुनवाई जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया (Process of Law) का दुरुपयोग माना जाएगा।
न्यायमूर्ति अनिल कुमार चौधरी की एकल पीठ ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 (धोखाधड़ी) के तहत लंबित आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए कहा कि मामले में दोषसिद्धि की संभावना अत्यंत कम है और मुकदमा जारी रखने से न्याय के उद्देश्य की पूर्ति नहीं होगी।
क्या था मामला?
मामला धारा 420 IPC के तहत दायर एक निजी शिकायत (Complaint Case) से जुड़ा था।
शिकायत के आधार पर धनबाद के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) ने 2 जुलाई 2019 को आरोपी के विरुद्ध संज्ञान लेते हुए आपराधिक कार्यवाही शुरू की थी।
मामला अभी ट्रायल कोर्ट में लंबित था और आरोप (Charge) भी तय नहीं हुए थे। इसी दौरान दोनों पक्षों के बीच मित्रों और शुभचिंतकों के हस्तक्षेप से आपसी समझौता हो गया।
इसके बाद आरोपी ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 के तहत झारखंड हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर पूरी आपराधिक कार्यवाही और 2 जुलाई 2019 के संज्ञान आदेश को रद्द करने की मांग की।
समझौते के समर्थन में दाखिल किए गए शपथपत्र
याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष एक अंतरिम आवेदन प्रस्तुत किया, जिसके साथ शिकायतकर्ता की पत्नी तथा याचिकाकर्ता के पैरवीकार-सह-भतीजे द्वारा शपथपत्र भी दाखिल किए गए।
इन शपथपत्रों में स्पष्ट रूप से कहा गया कि दोनों पक्षों ने मित्रों और शुभचिंतकों के हस्तक्षेप से अपने सभी विवाद आपसी सहमति से समाप्त कर दिए हैं तथा अब उनके बीच कोई विवाद शेष नहीं है।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि मामला पूरी तरह निजी प्रकृति का है और इसमें किसी सार्वजनिक हित (Public Interest) या सार्वजनिक नीति (Public Policy) का प्रश्न शामिल नहीं है।
राज्य सरकार ने भी नहीं किया विरोध
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से भी अदालत को बताया गया कि पक्षकारों के बीच समझौता हो चुका है और आपराधिक कार्यवाही रद्द किए जाने पर राज्य को कोई गंभीर आपत्ति नहीं है।
अभियोजन पक्ष ने भी स्वीकार किया कि विवाद का सौहार्दपूर्ण समाधान हो चुका है और मुकदमा जारी रखने से न्याय का कोई उद्देश्य पूरा नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का लिया सहारा
हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के Parbatbhai Aahir v. State of Gujarat (2017) फैसले का उल्लेख किया।
अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि आपराधिक मामला निजी विवाद से संबंधित हो और उसका समाज या सार्वजनिक हित पर व्यापक प्रभाव न पड़ता हो, तो पक्षकारों के बीच समझौते के आधार पर हाई कोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए कार्यवाही समाप्त कर सकता है।
निजी विवाद में मुकदमा जारी रखना उचित नहीं
हाई कोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामला किसी जघन्य अपराध (Heinous Offence) या नैतिक अधमता (Mental Depravity) से संबंधित नहीं है, बल्कि यह केवल दो पक्षों के बीच निजी विवाद का मामला है।
अदालत ने माना कि समझौते के बाद याचिकाकर्ता के दोषी सिद्ध होने की संभावना अत्यंत कम रह गई है। ऐसी स्थिति में मुकदमा जारी रखने से आरोपी को अनावश्यक उत्पीड़न और गंभीर अन्याय का सामना करना पड़ेगा।
हाई कोर्ट का फैसला
अदालत ने पाया कि पक्षकारों के बीच हुआ समझौता वास्तविक, स्वैच्छिक और पूर्ण है तथा अब उनके बीच कोई विवाद शेष नहीं है।
इसी आधार पर हाई कोर्ट ने धनबाद के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी द्वारा 2 जुलाई 2019 को पारित संज्ञान आदेश सहित पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। इसके साथ ही शिकायत मामले में लंबित सभी कार्यवाहियां भी समाप्त हो गईं।
मामला: Pappu Kumar Saw v. State of Jharkhand
मामला संख्या: Cr.M.P. No. 1140 of 2026
निर्णय की तिथि: 27 जून 2026
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