सुप्रीम कोर्ट व्यभिचार होटल रिकॉर्ड फैसला पति की अपील खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तलाक के मामले में व्यभिचार के आरोप की जांच के लिए होटल रिकॉर्ड और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) मंगाना निजता के अधिकार का उल्लंघन नहीं है। कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट: व्यभिचार के आरोप की जांच के लिए होटल रिकॉर्ड और कॉल डिटेल मंगाई जा सकती है, निजता का उल्लंघन नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि वैवाहिक विवाद में व्यभिचार (Adultery) के आरोप की जांच के लिए होटल रिकॉर्ड और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) मंगाना निजता के अधिकार (Right to Privacy) का उल्लंघन नहीं माना जाएगा।
जस्टिस मनोमोहन और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के 10 मई 2023 के फैसले को बरकरार रखते हुए पति की अपील खारिज कर दी।
क्या था मामला?
पति-पत्नी का विवाह 4 दिसंबर 1998 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था और उनकी एक बेटी है। समय के साथ दोनों के संबंध खराब हो गए।
पत्नी ने पति पर क्रूरता, घरेलू हिंसा और व्यभिचार के आरोप लगाए। उसका दावा था कि 29 अप्रैल से 1 मई 2022 के बीच पति जयपुर के होटल फेयरमोंट में एक अन्य महिला और उसकी बेटी के साथ कमरा नंबर 219 में ठहरा था।
पत्नी ने होटल में पति और उस महिला की साथ मौजूदगी दर्शाने वाली तस्वीरें भी अदालत के समक्ष पेश कीं।
पत्नी ने कौन-सी जानकारी मांगी?
व्यभिचार के आरोप को साबित करने के लिए पत्नी ने होटल से निम्नलिखित रिकॉर्ड मांगे—
- होटल बुकिंग का विवरण,
- आरक्षण (Reservation) रिकॉर्ड,
- कमरे में ठहरे लोगों के पहचान पत्र,
- भुगतान (Payment) संबंधी जानकारी।
होटल द्वारा जानकारी देने से इनकार किए जाने पर पत्नी ने फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उसने पति के दो मोबाइल नंबरों की कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) सुरक्षित रखने और अदालत में प्रस्तुत करने की भी मांग की।
फैमिली कोर्ट ने होटल और दूरसंचार कंपनियों को संबंधित रिकॉर्ड सुरक्षित रखकर सीलबंद लिफाफे (Sealed Cover) में अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश दिया।
दिल्ली हाईकोर्ट ने क्या कहा था?
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी के पास व्यभिचार का प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं था और वह फैमिली कोर्ट अधिनियम, 1984 की धारा 14 के तहत ऐसे दस्तावेज मंगाना चाहती थी, जिनसे उसके आरोप की पुष्टि हो सके।
अदालत ने माना कि व्यभिचार जैसे मामलों में प्रत्यक्ष प्रमाण मिलना कठिन होता है और ऐसे आरोप अक्सर परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (Circumstantial Evidence) से सिद्ध किए जाते हैं।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पत्नी प्रथम दृष्टया अपना मामला स्थापित करने में सफल रही है और मांगी गई जानकारी विवाद के निपटारे के लिए प्रासंगिक है।
निजता के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
पति ने तर्क दिया कि होटल रिकॉर्ड और कॉल डिटेल मंगाने से उसके तथा संबंधित महिला की निजता का अधिकार प्रभावित होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट की इस राय से सहमति जताई कि निजता का अधिकार पूर्ण (Absolute) अधिकार नहीं है।
अदालत ने कहा कि पत्नी की मांग केवल निजता के अधिकार से संबंधित नहीं है, बल्कि उसे हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 और फैमिली कोर्ट अधिनियम के तहत अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक साक्ष्य जुटाने का अधिकार भी प्राप्त है।
अन्य महिला और उसकी बेटी की निजता प्रभावित नहीं होगी
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि फैमिली कोर्ट ने केवल पति से संबंधित रिकॉर्ड मंगाने का निर्देश दिया था।
इसलिए उस महिला या उसकी नाबालिग बेटी की निजता के अधिकार के उल्लंघन का प्रश्न ही नहीं उठता।
फैमिली कोर्ट को व्यापक अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की इस टिप्पणी को भी स्वीकार किया कि फैमिली कोर्ट अधिनियम की धारा 14 फैमिली कोर्ट को साक्ष्य स्वीकार करने के व्यापक अधिकार देती है।
यदि कोई दस्तावेज या रिकॉर्ड विवाद के प्रभावी समाधान में सहायक हो सकता है, तो फैमिली कोर्ट उसे मंगाने का आदेश दे सकता है, भले ही उसकी ग्राह्यता (Admissibility) का प्रश्न बाद में तय किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए पति की अपील खारिज कर दी।
अदालत ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसके तहत होटल रिकॉर्ड और कॉल डिटेल रिकॉर्ड को सुरक्षित रखकर सीलबंद लिफाफे में अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया था।
मामला: Sachin Arora v. Manju Arora, सिविल अपील संख्या 400/2024, निर्णय दिनांक 2 जुलाई 2026।
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