पति के खिलाफ आरोप क्यों बरकरार रहे?
दिल्ली हाईकोर्ट ने स्कूल प्रिंसिपल के खिलाफ SC-ST Act की धारा 3(1)(x) के तहत तय आरोप रद्द कर दिए। कोर्ट ने कहा कि बंद परिसर में कथित जातिसूचक गालियां ‘public view’ में नहीं थीं, जबकि पति के खिलाफ प्रथमदृष्टया मामला बनता है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक स्कूल प्रिंसिपल के खिलाफ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1)(x) के तहत तय आरोपों को रद्द कर दिया है। हालांकि, अदालत ने उनके पति के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए ट्रायल कोर्ट को आगे कार्यवाही जारी रखने का निर्देश दिया।
जस्टिस सौरभ बनर्जी ने 25 अगस्त 2026 को दिए फैसले में कहा कि कथित जातिसूचक अपशब्द यदि निजी परिसर या बंद कमरे में कहे गए हों और वहां आम लोगों की प्रत्यक्ष मौजूदगी या दृश्यता न हो, तो उन्हें SC-ST Act के तहत आवश्यक “within public view” की शर्त के अंतर्गत नहीं माना जा सकता।
‘Public View’ की शर्त पूरी नहीं हुई
मामले में दिल्ली पुलिस के एक इंस्पेक्टर ने स्कूल की प्रिंसिपल और उनके पति के खिलाफ SC-ST Act सहित IPC की विभिन्न धाराओं में शिकायत दर्ज कराई थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 3(1)(x) के तहत अपराध के लिए केवल यह आरोप पर्याप्त नहीं है कि जातिसूचक शब्द कहे गए। यह भी दिखाना आवश्यक है कि कथित अपमान ऐसी जगह पर हुआ जहां वह ‘public view’ में था।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:
निजी परिसर, बंद कमरे या ऐसी जगह जहां आम लोगों की प्रत्यक्ष दृश्यता नहीं हो, वहां हुई कथित घटना को सामान्यतः “within public view” नहीं कहा जा सकता।
इसी आधार पर अदालत ने प्रिंसिपल के खिलाफ स्पेशल कोर्ट द्वारा तय किए गए आरोप को रद्द करने के लिए CrPC की धारा 482 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्ति का इस्तेमाल किया।
मामला कैसे शुरू हुआ?
मामला वर्ष 2014 की एक घटना से जुड़ा है। 25 जून 2014 को स्कूल में आग लगने की सूचना संबंधित पुलिस इंस्पेक्टर को मिली थी। इंस्पेक्टर ने स्कूल की प्रिंसिपल को इसकी जानकारी दी।
अगले दिन, 26 जून 2014 को प्रिंसिपल अपने पति के साथ स्कूल की पहली और दूसरी मंजिल पर स्थित कक्षाओं में गईं। प्रिंसिपल के अनुसार, इसी दौरान एक कमरे में पुलिस इंस्पेक्टर ने उनके साथ कथित तौर पर दुर्व्यवहार किया, उनका हाथ पकड़ा, चुप रहने की धमकी दी और नीचे जाने से रोका।
इसके बाद प्रिंसिपल की शिकायत पर इंस्पेक्टर के खिलाफ IPC की धाराओं 341, 354A और 354 के तहत FIR दर्ज हुई।
इंस्पेक्टर ने बाद में दर्ज कराया SC-ST Act का मामला
इसके बाद पुलिस इंस्पेक्टर की ओर से प्रिंसिपल और उनके पति के खिलाफ शिकायत की गई। इसमें SC-ST Act की धारा 3(1)(x) के साथ IPC की धाराएं 323, 427, 500, 506, 186, 353 और 34 लगाई गईं।
प्रिंसिपल और उनके पति ने दिल्ली हाईकोर्ट में दलील दी कि यह शिकायत उनके द्वारा इंस्पेक्टर के खिलाफ दर्ज कराई गई FIR का counterblast थी।
उनका कहना था कि कथित घटना के लगभग एक साल बाद, 30 जून 2015 को शिकायत दर्ज कराई गई, जिससे इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठता है। पति ने यह भी कहा कि उन्हें केवल इसलिए मामले में फंसाया गया क्योंकि वे आग लगने की घटना के बाद संकट की स्थिति में अपनी पत्नी के साथ स्कूल पहुंचे थे।
पति के खिलाफ आरोप क्यों बरकरार रहे?
हाईकोर्ट ने प्रिंसिपल और उनके पति के मामले को अलग-अलग देखा। अदालत ने माना कि प्रिंसिपल के खिलाफ SC-ST Act की धारा 3(1)(x) के लिए आवश्यक ‘public view’ का तत्व स्थापित नहीं होता।
लेकिन पति के खिलाफ लगाए गए अन्य आरोपों और उपलब्ध सामग्री को देखते हुए अदालत ने कहा कि उसके खिलाफ अपराध prima facie बनता है।
इसलिए पति के संबंध में आरोपों को रद्द करने का कोई आधार नहीं पाया गया और ट्रायल कोर्ट को कार्यवाही आगे बढ़ाने की अनुमति दी गई।
हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत
इस फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने SC-ST Act के तहत “public view” की वैधानिक आवश्यकता को दोहराया। यानी कथित जातिगत अपमान के मामले में केवल जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल का आरोप पर्याप्त नहीं है; घटना की परिस्थितियां और स्थान भी कानून की कसौटी पर खरे उतरने चाहिए।
हालांकि, हाईकोर्ट का यह निर्णय SC-ST Act की संवैधानिक वैधता या धारा 3(1)(x) की व्यापक व्याख्या पर कोई अंतिम फैसला नहीं है। अदालत ने इस मामले के उपलब्ध तथ्यों के आधार पर प्रिंसिपल के खिलाफ आरोप को रद्द किया है।
फैसला
- स्कूल प्रिंसिपल के खिलाफ SC-ST Act की धारा 3(1)(x) का आरोप रद्द।
- कथित घटना के निजी/बंद परिसर में होने के कारण “within public view” की शर्त पूरी नहीं मानी गई।
- पति के खिलाफ प्रथमदृष्टया मामला बरकरार।
- ट्रायल कोर्ट को पति के खिलाफ कार्यवाही आगे बढ़ाने का निर्देश।
- प्रिंसिपल को राहत CrPC की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्ति के प्रयोग से मिली।
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