घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005
सुप्रीम कोर्ट ने Reji Baby v. Subi Mary & Ors. में कहा कि पत्नी द्वारा स्वेच्छा से समझौते में छोड़े गए पुराने आर्थिक और भरण-पोषण संबंधी दावों को बाद में घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता। हालांकि, बेटी के स्वतंत्र आर्थिक अधिकार सुरक्षित रहेंगे।
समझौते के बाद पुराने भरण-पोषण दावों पर फिर से कार्यवाही नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवाद और घरेलू हिंसा से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि यदि पत्नी ने स्वेच्छा से आपसी समझौते के तहत अपने आर्थिक एवं भरण-पोषण संबंधी दावों को छोड़ दिया है और इसके बाद पति के साथ आपसी सहमति से तलाक भी ले लिया है, तो वह उन्हीं पुराने दावों को बाद में घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (DV Act) के तहत दोबारा नहीं उठा सकती।
न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने Reji Baby v. Subi Mary & Ors. मामले में यह टिप्पणी की।
23 जुलाई 2016 को हुआ था समझौता
मामले में पति और पत्नी के बीच 23 जुलाई 2016 को एक समझौता हुआ था। समझौते के तहत पत्नी ने पति के विरुद्ध भविष्य में किसी आर्थिक या भरण-पोषण संबंधी दावे को आगे नहीं बढ़ाने पर सहमति जताई थी।
इसके बाद दोनों ने आपसी सहमति से तलाक प्राप्त कर लिया।
हालांकि, बाद में पत्नी और बेटी ने पति के खिलाफ DV Act, 2005 के तहत कार्यवाही शुरू कर दी।
पति ने इन कार्यवाहियों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए दलील दी कि जिन दावों को पहले ही आपसी समझौते के जरिए समाप्त कर दिया गया था, उन्हें दोबारा उठाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
सुप्रीम कोर्ट: समझौते को चुनौती दिए बिना पुराने दावे फिर नहीं उठाए जा सकते
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पत्नी ने अपनी इच्छा से समझौते के माध्यम से आर्थिक और भरण-पोषण संबंधी दावों को छोड़ा था। इसके बाद उसने उस समझौते को चुनौती देने के लिए कोई कानूनी कार्यवाही भी नहीं की।
ऐसी परिस्थितियों में समझौते से पहले की घटनाओं और विवादों के आधार पर बाद में DV Act की कार्यवाही शुरू करके पुराने दावों को फिर से जीवित करना स्वीकार्य नहीं होगा।
अदालत ने माना कि इस तरह की कार्यवाही, परिस्थितियों के आधार पर, न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग के समान हो सकती है।
बेटी के अधिकार समझौते से खत्म नहीं होते
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी और बेटी के अधिकारों के बीच महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया।
अदालत ने कहा कि पति-पत्नी के बीच हुआ समझौता बेटी के स्वतंत्र आर्थिक अधिकारों को समाप्त नहीं करता, क्योंकि बेटी स्वयं उस समझौते की पक्षकार नहीं थी।
इसलिए बेटी को कानून के तहत अपने स्वतंत्र आर्थिक अधिकारों के लिए उचित कार्यवाही शुरू करने की स्वतंत्रता बनी रहेगी।
केरल हाईकोर्ट का आदेश रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने पति की अपील स्वीकार करते हुए केरल हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और पत्नी द्वारा शुरू की गई घरेलू हिंसा संबंधी कार्यवाही को निरस्त कर दिया।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि इससे बेटी के स्वतंत्र कानूनी और आर्थिक अधिकार प्रभावित नहीं होंगे।
फैसले का महत्व
यह फैसला इस सिद्धांत को रेखांकित करता है कि स्वेच्छा से किए गए और चुनौती न दिए गए वैवाहिक समझौते के जरिए समाप्त किए जा चुके पुराने आर्थिक दावों को बाद की कार्यवाही के माध्यम से स्वतः पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता।
साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित किया कि पति-पत्नी के बीच हुए समझौते का प्रभाव किसी ऐसे बच्चे के स्वतंत्र अधिकारों पर नहीं पड़ेगा, जो उस समझौते का पक्षकार नहीं था।
केस डिटेल
Case Name: Reji Baby v. Subi Mary & Ors.
पीठ: न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति मनमोहन
मुख्य कानून: Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005
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