सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: मनुस्मृति का हवाला देकर विधवा बहू को ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण का अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने मनुस्मृति का हवाला देते हुए विधवा बहू को ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण का अधिकार दिया। कोर्ट ने कहा कि पति की मृत्यु के समय के आधार पर भेदभाव असंवैधानिक है।

नई दिल्ली | न्यायिक निर्णय

सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: मनुस्मृति का हवाला देकर विधवा बहू को ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण का अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसले में प्राचीन मनुस्मृति के नैतिक सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए विधवा बहू को उसके ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण का अधिकार मान्यता दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत यह अधिकार पति की मृत्यु के समय पर निर्भर नहीं करता।

न्यायालय ने मनुस्मृति का हवाला देते हुए कहा कि उसमें साफ तौर पर उल्लेख है कि

“माता, पिता, पत्नी और पुत्र को कभी नहीं छोड़ा जाना चाहिए, और ऐसा करने वाले व्यक्ति को दंड का भागी होना चाहिए।”

इसी नैतिक सिद्धांत को आधुनिक कानून से जोड़ते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विधवा बहू को भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता।


मामले का मुख्य विवाद क्या था?

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में केंद्रीय प्रश्न यह था कि—

  • यदि बहू ससुर के जीवनकाल में विधवा हो जाती है, तो उसे भरण-पोषण का अधिकार है
  • लेकिन यदि वह ससुर की मृत्यु के बाद विधवा होती है, तो क्या यह अधिकार समाप्त हो जाता है?

याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि ससुर की मृत्यु के बाद विधवा बहू को भरण-पोषण का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

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कोर्ट का सख्त जवाब: भेदभाव मनमाना और असंवैधानिक

इस तर्क को जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की पीठ ने पूरी तरह खारिज कर दिया।
कोर्ट ने कहा—

  • पति की मृत्यु के समय के आधार पर विधवा बहुओं के बीच भेद करना
    तर्कहीन, मनमाना और असंवैधानिक है
  • चाहे बहू ससुर के जीवनकाल में विधवा हुई हो या उनकी मृत्यु के बाद,
    दोनों ही परिस्थितियों में उसे भरण-पोषण का समान अधिकार है

पीठ ने स्पष्ट किया कि कानून ऐसी कृत्रिम और तकनीकी विभाजन रेखा खींचने की अनुमति नहीं देता।


धारा 22 का हवाला: भरण-पोषण की वैधानिक जिम्मेदारी

कोर्ट ने हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 22 का उल्लेख करते हुए कहा कि—

  • यह प्रावधान मृतक हिंदू के निर्भर व्यक्तियों के भरण-पोषण से संबंधित है
  • मृतक की संपत्ति से उसके सभी वारिसों पर यह दायित्व बनता है कि वे निर्भर व्यक्तियों का भरण-पोषण करें
  • विधवा बहू भी स्पष्ट रूप से निर्भर व्यक्तियों की श्रेणी में आती है

न्यायालय ने कहा कि पुत्र या अन्य कानूनी वारिस, मृतक द्वारा जिन लोगों का भरण-पोषण कानूनी और नैतिक रूप से आवश्यक था, उन्हें संपत्ति से सहायता देने के लिए बाध्य हैं।


ससुर की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी

पीठ ने आगे कहा कि—

  • पुत्र की मृत्यु के बाद ससुर पर यह धार्मिक और नैतिक दायित्व बनता है कि वह अपनी विधवा बहू का भरण-पोषण करे
  • यह शर्त तभी लागू होगी जब
    • विधवा बहू स्वयं अपना निर्वाह न कर सके, और
    • मृत पति द्वारा छोड़ी गई संपत्ति से उसका गुजारा संभव न हो

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अधिनियम इस जिम्मेदारी को किसी भी स्थिति में सीमित या समाप्त नहीं करता, चाहे विधवा होने का समय कुछ भी हो।

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महिलाओं की गरिमा और सामाजिक न्याय पर जोर

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि विधवा बहू को भरण-पोषण से वंचित किया गया, तो—

  • वह गरीबी, असहायता और सामाजिक हाशिए की ओर धकेल दी जाएगी
  • इससे महिलाओं की गरिमा, सुरक्षा और समानता को गंभीर खतरा पैदा होगा

कोर्ट ने चेताया कि कानून की संकीर्ण या तकनीकी व्याख्या के आधार पर ऐसे अधिकारों से इनकार नहीं किया जा सकता।


क्यों है यह फैसला अहम?

  • यह निर्णय हिंदू परिवारों में विधवा महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करता है
  • अब विधवा बहुओं को ससुर की विरासत वाली संपत्ति से भरण-पोषण का स्पष्ट कानूनी संरक्षण मिलेगा
  • सुप्रीम कोर्ट ने प्राचीन मनुस्मृति के नैतिक मूल्यों को आधुनिक संवैधानिक कानून से जोड़ते हुए
    एक संवेदनशील, मानवीय और न्यायपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया है

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