असम में नागरिकता साबित करने के लिए पारिवारिक संबंधों के दस्तावेज जरूरी: गुवाहाटी हाईकोर्ट ने विदेशी घोषित करने का आदेश बरकरार रखा

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फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने असम के एक व्यक्ति को विदेशी घोषित करने का फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल का आदेश बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि मतदाता सूचियों में विसंगतियां और माता-पिता व दादा-दादी से संबंध स्थापित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेजों का अभाव नागरिकता के दावे को कमजोर करता है।

विदेशी घोषित करने के आदेश के खिलाफ याचिका खारिज

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने असम के एक व्यक्ति को विदेशी घोषित करने के फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि नागरिकता के दावे के समर्थन में प्रस्तुत दस्तावेजों से पारिवारिक संबंधों और संबंधित व्यक्तियों के निवास की निरंतरता को स्थापित करना आवश्यक है।

न्यायमूर्ति कल्याण राय सुराना और न्यायमूर्ति सुस्मिता फुकन खौंद की पीठ ने 8 अक्टूबर को फैसला सुनाते हुए सितंबर 2018 में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल द्वारा पारित आदेश को बरकरार रखा। ट्रिब्यूनल ने याचिकाकर्ता को 25 मार्च 1971 के बाद की श्रेणी का विदेशी घोषित किया था।

दादा के निवास का निरंतर रिकॉर्ड नहीं मिला

हाईकोर्ट ने कहा कि वर्ष 1966 के बाद याचिकाकर्ता के दादा के निवास से संबंधित रिकॉर्ड में निरंतरता का अभाव महत्वपूर्ण है। अदालत ने मतदाता सूचियों में दर्ज नामों, उम्र और अलग-अलग गांवों के पते में मौजूद विसंगतियों पर भी ध्यान दिया।

पीठ के अनुसार, वर्ष 1977 और 1997 की मतदाता सूचियों के बीच 20 साल का अंतर था। याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज इस अंतर को संतोषजनक रूप से स्पष्ट करने और उसके माता-पिता तथा दादा-दादी के साथ आवश्यक पारिवारिक संबंध स्थापित करने में सफल नहीं रहे।

ब्रह्मपुत्र नदी के कटाव के कारण तीन गांवों में बदला निवास

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि उसका जन्म और पालन-पोषण निज-परुवा गांव में हुआ था। उसके अनुसार, जन्म के कुछ समय बाद ब्रह्मपुत्र नदी के कटाव के कारण परिवार चंपूपारा पाथर गांव चला गया।

उसने बताया कि वर्ष 1970 के बाद परिवार उजान दुरमारी में रहने लगा। वर्ष 1997 के बाद परिवार दुरमारी (दीघलचुरा) से भितर दुवार गांव आ गया, जहां वह तब से रह रहा था।

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हालांकि, हाईकोर्ट ने माना कि गांव बदलने के इस स्पष्टीकरण के बावजूद प्रस्तुत दस्तावेजों से परिवार के सदस्यों के बीच आवश्यक संबंध और निवास की निरंतरता पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं हुई।

मतदाता सूचियों में नाम अलग-अलग दर्ज

अदालत ने मतदाता सूचियों में नामों की विसंगतियों को भी महत्वपूर्ण माना।

पीठ के समक्ष रखे गए रिकॉर्ड के अनुसार, वर्ष 1966 की मतदाता सूची में याचिकाकर्ता के पिता का नाम ‘कुरफान अली’ और दादा का नाम ‘जान मामूद’ दर्ज था। बाद की मतदाता सूचियों में ये नाम क्रमशः ‘कुरपान अली’ और ‘जानू मियां’ के रूप में दर्ज मिले।

अदालत ने यह भी गौर किया कि याचिकाकर्ता का नाम पहली बार वर्ष 1997 की मतदाता सूची में दर्ज हुआ था, जिसमें उसकी उम्र 26 वर्ष बताई गई थी।

पीठ ने कहा कि यदि वर्ष 1997 में उसकी उम्र 26 वर्ष थी, तो वह लगभग 21 वर्ष की उम्र में मतदान के योग्य हो गया होता। ऐसे में वर्ष 1977 और 1997 के बीच का अंतर महत्वपूर्ण था और उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था।

फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने इसी आधार पर माना था कि वर्ष 1977 की मतदाता सूची किसी अन्य परिवार से संबंधित थी। हाईकोर्ट ने इस निष्कर्ष में हस्तक्षेप नहीं किया।

पिता की मौखिक गवाही पर्याप्त नहीं

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता एन. उद्दीन ने दलील दी कि ट्रिब्यूनल ने सार्वजनिक दस्तावेजों का उचित मूल्यांकन नहीं किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 1970 की मतदाता सूची में याचिकाकर्ता के माता-पिता और दादा-दादी के नाम दर्ज थे तथा उसके पिता ने भी गवाही दी थी।

दूसरी ओर, सरकार की ओर से अधिवक्ता जी. शर्मा ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता अपने पिता और दादा के बीच संबंध स्थापित करने में विफल रहा। सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि सहायक दस्तावेजों के अभाव में केवल पिता की मौखिक गवाही नागरिकता के दावे को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं थी।

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अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड और दस्तावेजों में मौजूद विसंगतियों को देखते हुए याचिकाकर्ता की दलीलों को स्वीकार नहीं किया।

जन्म और परिवार से जुड़ी जानकारी का भी अभाव

हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता ने अपनी जन्मतिथि, जन्मस्थान तथा अपनी मां और भाई-बहनों के नामों का खुलासा नहीं किया था।

अदालत के समक्ष प्रस्तुत दस्तावेजों में मौजूद कमियों और पारिवारिक संबंधों को स्थापित करने में विफलता को ध्यान में रखते हुए पीठ ने याचिका खारिज कर दी।

फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल का आदेश बरकरार, जमानत भी रद्द

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसके तहत याचिकाकर्ता को 25 मार्च 1971 के बाद की श्रेणी का विदेशी घोषित किया गया था। अदालत ने उसे पहले दी गई जमानत का आदेश भी रद्द कर दिया।

फैसले का महत्व

यह मामला असम में विदेशी नागरिकता निर्धारण की कार्यवाही में दस्तावेजी साक्ष्यों, मतदाता सूचियों की विश्वसनीयता और पारिवारिक संबंधों की पुष्टि के महत्व को रेखांकित करता है। अदालत ने याचिकाकर्ता के मामले में नाम, उम्र और निवास से जुड़े रिकॉर्ड में विसंगतियों तथा पर्याप्त दस्तावेजों के अभाव को महत्वपूर्ण माना।

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