LandlordTenantDispute: किरायेदार की अपनी दलील ही कई बार उसके किरायेदारी अधिकारों के विरुद्ध जा सकती है
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि जो किरायेदार मकान-मालिक-किरायेदार संबंध से स्पष्ट इनकार कर स्वतंत्र स्वामित्व का दावा करता है, वह Transfer of Property Act की धारा 111(g) के तहत किरायेदारी की स्थिति खो सकता है और Delhi Rent Control Act की सुरक्षा का दावा नहीं कर सकता। धारा 100 CPC की दूसरी अपील में साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन भी नहीं किया जा सकता।
किरायेदार ने स्वामित्व का दावा किया तो किरायेदारी की सुरक्षा भी गई
Delhi High Court ने कहा है कि यदि कोई किरायेदार स्पष्ट रूप से मकान-मालिक और किरायेदार के बीच संबंध से इनकार करते हुए संपत्ति पर स्वतंत्र स्वामित्व का दावा करता है, तो यह किरायेदारी के परित्याग (renunciation) के रूप में माना जा सकता है। ऐसी स्थिति में वह किराया नियंत्रण कानून के तहत मिलने वाली विशेष सुरक्षा का लाभ नहीं उठा सकता।
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने 6 अक्टूबर 2026 को Ramesh v. Geeta, RSA 69/2019 में यह फैसला सुनाया।
मामले में कब्जाधारी ने स्वयं को किरायेदार मानने के बजाय संपत्ति पर स्वतंत्र अधिकार का दावा किया था और इसके समर्थन में इकरारनामा (Ikrarnama) जैसे दस्तावेज का सहारा लिया था।
मकान-मालिक के शीर्षक से इनकार का क्या प्रभाव?
हाईकोर्ट ने Transfer of Property Act, 1882 की धारा 111(g) के तहत किरायेदारी के forfeiture के सिद्धांत को लागू किया।
इस प्रावधान के तहत, यदि किरायेदार मकान-मालिक के शीर्षक से स्पष्ट रूप से इनकार करता है या संपत्ति पर अपना स्वतंत्र स्वामित्व स्थापित करने का दावा करता है, तो यह उसके किरायेदारी अधिकारों के परित्याग का आधार बन सकता है।
अर्थात, कोई व्यक्ति एक ही समय में अदालत के समक्ष यह नहीं कह सकता कि वह मकान-मालिक का किरायेदार नहीं है और दूसरी ओर किरायेदार के रूप में मिलने वाली वैधानिक सुरक्षा का दावा भी करे।
दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट की सुरक्षा भी समाप्त
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब किरायेदार अपने आचरण या दावे के माध्यम से किरायेदारी की स्थिति को ही अस्वीकार कर देता है और इससे किरायेदारी forfeited हो जाती है, तो वह Delhi Rent Control Act जैसे विशेष किराया संरक्षण कानूनों के तहत उपलब्ध सुरक्षा का दावा नहीं कर सकता।
ऐसी स्थिति में कब्जे की वापसी या बेदखली से संबंधित मकान-मालिक के दावे पर सामान्य संपत्ति कानून के सिद्धांत लागू हो सकते हैं।
इसका मूल आधार यह है कि जिस व्यक्ति ने स्वयं किरायेदार के रूप में अपने अधिकार को नकार दिया है, वह उसी किरायेदारी के आधार पर मिलने वाली वैधानिक सुरक्षा का लाभ नहीं मांग सकता।
धारा 100 CPC की दूसरी अपील में साक्ष्यों की दोबारा जांच नहीं
हाईकोर्ट ने CPC की धारा 100 के तहत दायर Regular Second Appeal (RSA) के सीमित दायरे को भी रेखांकित किया।
अदालत ने कहा कि दूसरी अपील सामान्य रूप से केवल “substantial question of law” यानी महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न तक सीमित होती है।
इसलिए, यदि निचली अदालतों ने उपलब्ध साक्ष्यों का मूल्यांकन करने के बाद तथ्यात्मक निष्कर्ष दर्ज किए हैं, तो दूसरी अपील को उन निष्कर्षों के दोबारा परीक्षण या साक्ष्यों के पुनर्मूल्यांकन के माध्यम के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
दूसरी अपील में क्या नहीं किया जा सकता?
धारा 100 CPC के तहत हाईकोर्ट:
- केवल इसलिए साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता कि पक्षकार किसी अन्य निष्कर्ष की मांग कर रहा है;
- निचली अदालतों द्वारा समान रूप से दर्ज किए गए तथ्यात्मक निष्कर्षों में सामान्यतः हस्तक्षेप नहीं करता;
- हस्तक्षेप तभी किया जा सकता है जब मामला किसी महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न को जन्म देता हो।
फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?
दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला किरायेदारी विवादों में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को दोहराता है—किरायेदार की अपनी दलील ही कई बार उसके किरायेदारी अधिकारों के विरुद्ध जा सकती है।
यदि कब्जाधारी मकान-मालिक के स्वामित्व को ही नकारकर स्वयं को स्वतंत्र मालिक बताता है, तो बाद में उसी व्यक्ति के लिए किरायेदार के रूप में मिलने वाली वैधानिक सुरक्षा का दावा करना मुश्किल हो सकता है।
साथ ही, फैसला यह भी स्पष्ट करता है कि Regular Second Appeal कोई तीसरा तथ्यात्मक अपील मंच नहीं है। धारा 100 CPC के तहत हाईकोर्ट का हस्तक्षेप महत्वपूर्ण विधिक प्रश्नों तक सीमित रहता है।
Ramesh v. Geeta, RSA 69/2019
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