Old Monk Rum Ban: मामला बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंचा, कंपनी को ₹500 करोड़ से ज्यादा का नुकसान होने का दावा

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Old Monk की बिक्री पर रोक का

Old Monk Rum Ban: ओल्ड मॉन्क की बिक्री पर रोक के खिलाफ मोहन रॉकी स्प्रिंगवाटर ने बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया। कंपनी ने ₹500 करोड़ से अधिक नुकसान और महाराष्ट्र सरकार को ₹350 करोड़ के आबकारी राजस्व की क्षति का दावा किया है।

मशहूर रम ब्रांड ‘ओल्ड मॉन्क रम Old Monk Rum’ की बिक्री पर रोक लगाने का मामला बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंच गया है। ओल्ड मॉन्क का उत्पादन करने वाली कंपनी मोहन रॉकी स्प्रिंगवाटर प्राइवेट लिमिटेड ने अदालत में दावा किया है कि बिक्री पर रोक के कारण उसे 500 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है। वहीं, महाराष्ट्र सरकार के आबकारी विभाग को भी करीब 350 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान होने का दावा किया गया है।

यह विवाद भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) के उस आदेश से जुड़ा है, जिसके तहत ठाणे जिले की उत्पादन इकाई से ओल्ड मॉन्क की बिक्री प्रभावित हुई। कंपनी ने इस आदेश को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी है।

हाई कोर्ट में कंपनी ने क्या दलील दी?

मुख्य न्यायाधीश महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति अद्वैत सेठना की खंडपीठ के समक्ष कंपनी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वेंकटेश धोंड ने पक्ष रखा।

कंपनी ने अदालत को बताया कि ठाणे जिले की इकाई से उत्पाद की बिक्री पर रोक के चलते उसे 500 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान उठाना पड़ा है। कंपनी के अनुसार, इस रोक से महाराष्ट्र सरकार के आबकारी विभाग को भी लगभग 350 करोड़ रुपये के राजस्व की क्षति हुई है।

कंपनी ने यह भी दलील दी कि महाराष्ट्र में उसकी दूसरी इकाई से इसी फॉर्मूले वाली रम की बिक्री जारी है, जबकि ठाणे की इकाई के उत्पादों पर प्रतिबंध लागू है। कंपनी ने इस अंतर को अपने पक्ष में उठाते हुए बिक्री पर रोक के औचित्य पर सवाल खड़े किए।

FSSAI ने Old Monk की बिक्री पर रोक क्यों लगाई?

विवाद का मुख्य मुद्दा ओल्ड मॉन्क के कुछ उत्पादों में इस्तेमाल किए जाने वाले फ्लेवर और उनकी लेबलिंग से संबंधित है।

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FSSAI का कहना है कि कुछ स्पिरिट उत्पादों में बाहर से रम का फ्लेवर मिलाया जाता है, लेकिन उन्हें सामान्य रम के नाम से बेचा जाता है। प्राधिकरण के अनुसार, ऐसी स्थिति में उत्पाद की वास्तविक प्रकृति और उसमें इस्तेमाल की गई सामग्री को लेकर उपभोक्ताओं के भ्रमित होने की आशंका रहती है।

प्राधिकरण का तर्क है कि उत्पादों की लेबलिंग इस तरह होनी चाहिए कि उपभोक्ताओं को उनकी वास्तविक संरचना और प्रकृति की स्पष्ट जानकारी मिल सके। इसी आधार पर ऐसे उत्पादों को केवल ‘रम’ बताने के बजाय ‘फ्लेवर्ड प्रोडक्ट’ या रम का फ्लेवर वाली स्पिरिट के रूप में दर्शाने की जरूरत पर जोर दिया गया है।

FSSAI ने उत्पादों के लेबल पर इस्तेमाल किए गए ‘7 इयर्स ओल्ड ब्लेंडेड’ और ‘वेरी ओल्ड वेटेड’ जैसे विवरणों पर भी आपत्ति जताई है। प्राधिकरण के अनुसार, ऐसे शब्द उत्पाद की उम्र, निर्माण प्रक्रिया और वास्तविक प्रकृति को लेकर उपभोक्ताओं के बीच भ्रम पैदा कर सकते हैं।

कंपनी का तर्क: दूसरी कंपनियां भी अपनाती हैं यही प्रक्रिया

कंपनी ने अदालत में दलील दी कि लागू नियमों के तहत अनुमत पदार्थों को मिलाकर न्यूट्रल स्पिरिट तैयार करने की प्रक्रिया स्वीकार्य है। उसने यह भी कहा कि अन्य कंपनियां भी इसी तरह की प्रक्रिया अपनाती हैं, लेकिन उनके उत्पादों पर समान प्रतिबंध नहीं लगाया गया है।

इस आधार पर कंपनी ने कार्रवाई की निष्पक्षता और अपने उत्पादों की बिक्री पर रोक के औचित्य को चुनौती दी है।

लेबल बदलने के प्रस्ताव पर भी नहीं बनी सहमति

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह ने कहा कि यदि कंपनी उत्पाद को ‘रम’ के बजाय ‘रम जैसा’ बताने के लिए लेबल में आवश्यक बदलाव करने पर सहमत होती है, तो अधिकारियों की ओर से बिक्री की अनुमति दिए जाने की संभावना हो सकती है।

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इससे पहले कंपनी ने विवाद सुलझाने के लिए संशोधित लेबल का मसौदा प्रस्तुत करने पर सहमति जताई थी। प्रस्तावित बदलावों में उत्पाद की उम्र से संबंधित विवादित विवरण हटाना और ‘ऐडेड फ्लेवर’ यानी अतिरिक्त फ्लेवर मिलाए जाने की जानकारी प्रमुखता से देना शामिल था।

हालांकि, FSSAI ने संशोधित लेबल को मंजूरी नहीं दी। इसके बाद कंपनी ने हाई कोर्ट से मामले की विस्तृत सुनवाई कर विवाद का फैसला गुण-दोष के आधार पर करने की मांग की।

अंतरिम राहत नहीं, अब मामले के गुण-दोष पर फैसला

बॉम्बे हाई कोर्ट इससे पहले बिक्री पर लगी रोक के खिलाफ तत्काल अंतरिम राहत देने से इनकार कर चुका है। अब कंपनी ने अदालत के समक्ष अपनी दलीलें रखते हुए प्रतिबंध की वैधता और उससे होने वाले नुकसान का मुद्दा उठाया है।

मामले की अगली सुनवाई 23 अक्टूबर को निर्धारित है। अंतिम निर्णय आने तक उत्पाद की बिक्री पर रोक से जुड़े विवाद का निपटारा होना बाकी है।

इस मामले का परिणाम केवल ओल्ड मॉन्क की बिक्री तक सीमित नहीं रहेगा। यह फ्लेवर्ड स्पिरिट उत्पादों की पहचान, उनकी लेबलिंग, उपभोक्ता संरक्षण और खाद्य सुरक्षा नियामक के अधिकारों से जुड़े व्यापक सवालों पर भी असर डाल सकता है।

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