मद्रास हाईकोर्ट ने POCSO मामले में 20 वर्षीय इंजीनियरिंग छात्र को जमानत दी। आरोपी ने हलफनामा देकर कहा कि वह पीड़िता के कानूनी रूप से विवाह योग्य उम्र हासिल करने से पहले उससे शादी के लिए दबाव या प्रभाव नहीं डालेगा।
मद्रास हाईकोर्ट ने POCSO मामले में आरोपी 20 वर्षीय इंजीनियरिंग छात्र को जमानत देते हुए उसके समक्ष एक महत्वपूर्ण शर्त रखी है। कोर्ट ने आरोपी से हलफनामा और अंडरटेकिंग लिया कि वह पीड़िता के कानूनी रूप से विवाह योग्य उम्र हासिल करने से पहले उससे शादी करने के लिए कोई दबाव नहीं बनाएगा और न ही उसे प्रभावित करेगा।
जस्टिस एम. निर्मल कुमार ने 9 सितंबर को आरोपी की आपराधिक याचिका पर यह आदेश पारित किया। आरोपी ने निचली अदालत द्वारा 9 जुलाई को उसकी जमानत याचिका खारिज किए जाने को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
आरोपी ने हलफनामे में क्या कहा?
हाईकोर्ट के समक्ष दाखिल हलफनामे में आरोपी ने कहा कि वह लड़की के कानूनी रूप से विवाह योग्य होने तक उससे शादी करने के लिए उसे मजबूर, प्रेरित या प्रभावित नहीं करेगा।
आरोपी ने यह भी कहा कि यदि भविष्य में लड़की कानूनी उम्र हासिल करने के बाद अपनी स्वतंत्र इच्छा से उससे शादी करना चाहती है, तो उसके अलग जाति या समुदाय से होने के कारण वह इस विवाह में कोई बाधा नहीं डालेगा।
उसने कोर्ट को दिए अंडरटेकिंग में कहा कि वह लड़की के निर्णय का सम्मान करेगा और उसकी कानूनी रूप से वैध शादी में जाति या समुदाय के आधार पर कोई रुकावट पैदा नहीं करेगा।
पीड़िता ने जमानत का विरोध नहीं किया
जमानत पर सुनवाई के दौरान पीड़िता के पक्ष को भी कोर्ट के समक्ष रखा गया। उपलब्ध विवरण के अनुसार, पीड़िता की ओर से आरोपी को जमानत दिए जाने पर विशेष आपत्ति नहीं जताई गई।
कोर्ट ने आरोपी के हलफनामे और अंडरटेकिंग के साथ मामले की परिस्थितियों पर विचार करने के बाद जमानत प्रदान की।
हालांकि, हाईकोर्ट ने मामले में लगाए गए आरोपों के गुण-दोष या पक्षकारों के परस्पर विरोधी दावों की सत्यता पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया।
27 जून को हुई थी आरोपी की गिरफ्तारी
आरोपी छात्र को 27 जून को गिरफ्तार किया गया था। उसके खिलाफ POCSO Act, IPC और SC/ST Act के तहत मामला दर्ज किया गया था।
उस पर नाबालिग के साथ यौन अपराध, चोट पहुंचाने, आपराधिक धमकी देने और जातिगत अपराधों से संबंधित आरोप लगाए गए थे।
निचली अदालत ने 9 जुलाई को उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद आरोपी ने हाईकोर्ट का रुख किया।
मामले में सामने आए दो अलग-अलग दावे
मामले की सुनवाई के दौरान आरोपी और पीड़िता की ओर से घटना को लेकर अलग-अलग दावे कोर्ट के सामने रखे गए।
बचाव पक्ष का दावा
बचाव पक्ष और पीड़िता की ओर से पेश किए गए एक पक्ष के अनुसार, आरोपी और लड़की एक ही गांव के रहने वाले थे और दोनों के बीच प्रेम संबंध था।
दावा किया गया कि दोनों के बीच सहमति से शारीरिक संबंध बने थे और आरोपी ने लड़की से शादी करने का वादा किया था।
आरोपी का कथित तौर पर कहना था कि वह पहले अपनी पढ़ाई पूरी कर नौकरी हासिल करना चाहता था और लड़की के कानूनी रूप से विवाह योग्य होने के बाद उसके परिवार से शादी के संबंध में बात करेगा।
यह भी दावा किया गया कि लड़की के गर्भवती होने की जानकारी आरोपी को दी गई थी और इसके बावजूद उसने उचित समय आने पर उसके माता-पिता से शादी की बात करने की बात कही थी।
पीड़िता की ओर से अलग दावा
वहीं, पीड़िता की ओर से पेश वकील ने घटना का अलग विवरण कोर्ट के सामने रखा।
पीड़िता के वकील ने आरोप लगाया कि आरोपी ने उसके साथ जबरन penetrative sexual assault किया था। वकील के अनुसार, जब लड़की ने आरोपी को अपनी गर्भावस्था के बारे में बताया तो उसने उससे दूरी बना ली और गर्भावस्था की जानकारी से इनकार करने लगा।
पीड़िता की ओर से कहा गया कि ऐसी स्थिति में उसके पास शिकायत दर्ज कराने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।
हाईकोर्ट ने दावों की सत्यता पर कोई निष्कर्ष नहीं दिया
महत्वपूर्ण बात यह है कि जमानत देते समय हाईकोर्ट ने पक्षकारों की ओर से प्रस्तुत इन परस्पर विरोधी दावों में से किसी को सही या गलत नहीं ठहराया।
कोर्ट का आदेश मुख्य रूप से आरोपी की जमानत याचिका, मामले की परिस्थितियों और उसके द्वारा दिए गए हलफनामे एवं अंडरटेकिंग पर आधारित रहा।
आरोपी ने स्पष्ट रूप से कोर्ट को आश्वासन दिया कि पीड़िता के कानूनी रूप से विवाह योग्य उम्र हासिल करने से पहले वह उस पर शादी के लिए कोई दबाव नहीं बनाएगा और न ही उसे प्रभावित करेगा।
साथ ही, भविष्य में पीड़िता अपनी कानूनी उम्र हासिल करने के बाद अपनी इच्छा से विवाह करना चाहे तो आरोपी उसके अलग जाति या समुदाय से होने के आधार पर विवाह में बाधा नहीं डालेगा।
इस आधार पर हाईकोर्ट ने आरोपी को जमानत प्रदान की, जबकि मामले में लगाए गए आपराधिक आरोपों और दोनों पक्षों के दावों पर अंतिम निर्णय ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर होना है।
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