मद्रास हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति समुदाय के दावे से जुड़े मामले में तिरुवन्नामलाई जिला स्तरीय विजिलेंस कमेटी का आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जाति की पहचान तय करने में व्यक्ति के रंग-रूप और भाषा जैसी विशेषताओं को आधार नहीं बनाया जा सकता।
मद्रास हाईकोर्ट ने तिरुवन्नामलाई जिला स्तरीय विजिलेंस कमेटी के उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें चेन्नई कस्टम्स विभाग में असिस्टेंट कमिश्नर एम. रविकुमार के अनुसूचित जाति समुदाय से संबंधित होने के दावे और उनके कम्युनिटी सर्टिफिकेट पर सवाल उठाए गए थे।
जस्टिस डी. भरथा चक्रवर्ती ने 11 सितंबर 2026 के आदेश में कमेटी को मामले पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया। हालांकि, कोर्ट ने स्वयं रविकुमार के अनुसूचित जाति समुदाय से होने के दावे पर अंतिम फैसला नहीं दिया है।
रंग-रूप और भाषा को जांच का आधार बनाने पर कोर्ट की आपत्ति
मामले की जांच के दौरान कमेटी ने रविकुमार के परिवार के धार्मिक इतिहास और उपलब्ध दस्तावेजों के अलावा उनकी शारीरिक एवं भाषाई विशेषताओं का भी उल्लेख किया था।
कमेटी ने उनके गोरे रंग, लंबे कद, अच्छी कद-काठी, तमिल और अंग्रेजी बोलने तथा घुंघराले बाल जैसी विशेषताओं को अपने निष्कर्ष में शामिल किया था।
Madras High Court ने इन टिप्पणियों पर कड़ी आपत्ति जताई। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के रंग-रूप, कद-काठी, बालों की बनावट या भाषा का जाति संबंधी जांच से कोई प्रासंगिक संबंध नहीं हो सकता, विशेष रूप से तब जब इन निष्कर्षों के समर्थन में ठोस साक्ष्य भी प्रस्तुत न किए गए हों।
1986 में जारी हुआ था हिंदू आदि द्रविड़ समुदाय का प्रमाणपत्र
रविकुमार ने दिसंबर 1986 में हिंदू आदि द्रविड़ समुदाय से संबंधित कम्युनिटी सर्टिफिकेट प्राप्त किया था और इसी प्रमाणपत्र के आधार पर उन्होंने सरकारी नौकरी हासिल की थी।
वह चेन्नई कस्टम्स विभाग में असिस्टेंट कमिश्नर के पद पर कार्यरत हैं। उनकी सेवानिवृत्ति 30 मई 2026 को निर्धारित थी और इससे कुछ समय पहले ही उनके कम्युनिटी सर्टिफिकेट का सत्यापन शुरू किया गया था। जिला स्तरीय विजिलेंस कमेटी ने 4 मई को उनके दावे के खिलाफ फैसला सुनाया था।
धर्म परिवर्तन और पुनः हिंदू धर्म अपनाने का विवाद
मामले का मुख्य विवाद यह था कि रविकुमार और उनके परिवार द्वारा ईसाई धर्म से दोबारा हिंदू धर्म अपनाने का दावा वास्तविक था या नहीं और क्या उन्हें संबंधित अनुसूचित जाति समुदाय ने स्वीकार किया था।
रविकुमार के पिता मूल रूप से हिंदू आदि द्रविड़ समुदाय से थे। उन्होंने 1960 में ईसाई धर्म अपना लिया था। रविकुमार का जन्म 1966 में ईसाई परिवार में हुआ।
रविकुमार के अनुसार, उन्होंने और उनके पिता ने 1983 में चेन्नई के आर्य समाज केंद्र में आयोजित समारोहों के माध्यम से दोबारा हिंदू धर्म अपनाया था।
धर्म परिवर्तन के बाद उनके पिता का नाम R. Ayyavoo James से बदलकर R. Munusamy और रविकुमार का नाम A. Soundararajan से बदलकर M. Ravikumar किया गया। 1986 में जारी कम्युनिटी सर्टिफिकेट में उनके धर्म परिवर्तन और पुनः धर्म अपनाने के इतिहास का भी उल्लेख था।
हिंदू रीति-रिवाजों के पालन का दिया गया हवाला
रविकुमार ने कमेटी के सामने कहा था कि वह और उनकी पत्नी हिंदू धर्म का पालन करते हैं तथा उन्होंने अपने बच्चों का पालन-पोषण भी हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार किया।
उनके अनुसार, परिवार हिंदू देवी-देवताओं की पूजा करता रहा है। उनके वकील ने हाईकोर्ट को यह भी बताया कि एक मानवविज्ञानी (Anthropologist) ने उनके घर का दौरा किया था और वहां स्थित पूजा-स्थल को देखा था।
रविकुमार की ओर से परिवार की शादी, बच्चों के मुंडन और कान छिदवाने की रस्मों तथा उनकी बेटी की शादी से संबंधित तस्वीरें भी पेश की गईं, जिनमें हिंदू रीति-रिवाजों का पालन किए जाने का दावा किया गया।
पिता को ईसाई कब्रिस्तान में दफनाने का भी मुद्दा उठा
राज्य की ओर से पेश सरकारी वकील ने रविकुमार के दावे पर सवाल उठाते हुए कहा कि परिवार ने नौकरी और आरक्षण का लाभ लेने के लिए हिंदू पहचान का दावा किया, जबकि उनके व्यवहार में ईसाई धार्मिक परंपराओं का पालन जारी रहा।
इस संदर्भ में रविकुमार के पिता को ईसाई कब्रिस्तान में दफनाए जाने का भी उल्लेख किया गया।
सरकार की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि रविकुमार चेन्नई और बेंगलुरु में रहे थे, जबकि उनकी मां आदि द्रविड़ कॉलोनी से बाहर रहती थीं और समुदाय द्वारा उन्हें स्वीकार नहीं किया गया था।
कस्टम्स कमिश्नर की ओर से पेश वकील ने उन दस्तावेजों का भी हवाला दिया, जिनमें दोबारा हिंदू धर्म अपनाने के दावे के बाद भी रविकुमार के पिता के पुराने नाम का इस्तेमाल किया गया था।
पिता के अंतिम संस्कार से रविकुमार के धर्म का निर्धारण नहीं किया जा सकता
रविकुमार की ओर से उनके वकील ने स्पष्ट किया कि उनके छोटे भाई ईसाई धर्म का पालन करते हैं और उन्होंने ही पिता की देखभाल तथा उनकी मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार की व्यवस्था की थी, जबकि रविकुमार उस समय चेन्नई में नौकरी कर रहे थे।
इसलिए केवल पिता को ईसाई कब्रिस्तान में दफनाए जाने के आधार पर रविकुमार के व्यक्तिगत धार्मिक विश्वास और आचरण का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
हाईकोर्ट ने माना कि अंतिम संस्कार का तरीका परिस्थितियों में प्रासंगिक हो सकता है, लेकिन कमेटी के अन्य कई निष्कर्ष पर्याप्त साक्ष्यों पर आधारित नहीं थे।
राशन कार्ड और अन्य दस्तावेजों पर भी उठे सवाल
कमेटी की ओर से 1994 के राशन कार्ड में रविकुमार की बेटी का नाम ईसाई धर्म के तहत दर्ज होने का भी उल्लेख किया गया था।
रविकुमार ने इस निष्कर्ष पर आपत्ति जताते हुए कहा कि उनकी पहली बेटी का जन्म ही 10 नवंबर 1998 को हुआ था।
हाईकोर्ट ने पाया कि कमेटी के निष्कर्षों में पर्याप्त तथ्यात्मक आधार नहीं था और कुछ निष्कर्ष ऐसे थे जिन्हें उपलब्ध सामग्री के आधार पर न्यायिक जांच में कायम नहीं रखा जा सकता।
समुदाय द्वारा स्वीकार किए जाने के निष्कर्ष पर भी सवाल
कोर्ट ने समुदाय द्वारा रविकुमार को स्वीकार किए जाने के संबंध में कमेटी के निष्कर्ष की भी जांच की।
हाईकोर्ट ने पाया कि इस निष्कर्ष के समर्थन में पर्याप्त कारण और ठोस तथ्य नहीं बताए गए थे। इसी तरह, रविकुमार के रंग-रूप और भाषा को लेकर की गई टिप्पणियों को भी कोर्ट ने अस्वीकार्य माना, क्योंकि उन्हें किसी मानवविज्ञानी के वैज्ञानिक या विशेषज्ञ मूल्यांकन के आधार पर प्रस्तुत नहीं किया गया था।
कोर्ट ने कहा कि कमेटी की कार्यवाही में कुछ कारण प्रासंगिक हो सकते हैं, लेकिन उनके समर्थन में पर्याप्त विस्तृत कारण नहीं दिए गए हैं, जबकि कुछ अन्य आधार स्वीकार किए जाने योग्य नहीं हैं।
पुनः धर्म परिवर्तन के बाद समुदाय की स्वीकृति महत्वपूर्ण
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि पुनः धर्म परिवर्तन और संबंधित जाति समुदाय के सदस्यों द्वारा व्यक्ति को स्वीकार किया जाना, परिस्थितियों के आधार पर, कम्युनिटी सर्टिफिकेट के दावे के समर्थन में प्रासंगिक हो सकता है।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल औपचारिक रूप से धर्म परिवर्तन कर लेना पर्याप्त नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि संबंधित व्यक्ति वास्तव में उस धर्म का स्पष्ट और निरंतर पालन करता हो तथा उसमें विश्वास रखता हो।
चार सप्ताह में कमेटी के सामने पेश होने का निर्देश
हाईकोर्ट ने रविकुमार को आदेश की वेब कॉपी प्राप्त होने के चार सप्ताह के भीतर जिला स्तरीय विजिलेंस कमेटी के सामने पेश होने का निर्देश दिया है।
उन्हें अपनी धार्मिक प्रथाओं से संबंधित तस्वीरें और अन्य साक्ष्य पेश करने की अनुमति दी गई है। इसके अलावा, वह संबंधित समुदाय द्वारा स्वीकार किए जाने के प्रमाण भी प्रस्तुत कर सकते हैं।
कोर्ट ने कमेटी को निर्देश दिया कि वह रविकुमार को व्यक्तिगत रूप से सुने और उनके सामने पेश होने की तारीख से आठ सप्ताह के भीतर नया निर्णय पारित करे।
यदि कमेटी को किसी अतिरिक्त तथ्य या साक्ष्य की आवश्यकता महसूस होती है, तो वह उसके लिए भी निर्देश दे सकती है।
इस प्रकार, हाईकोर्ट ने फिलहाल रविकुमार के अनुसूचित जाति समुदाय से संबंधित दावे को अंतिम रूप से स्वीकार या खारिज नहीं किया है, बल्कि विजिलेंस कमेटी के पहले निर्णय को रद्द करते हुए मामले की कानूनसम्मत और साक्ष्य-आधारित तरीके से नए सिरे से जांच का निर्देश दिया है।
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