POCSO केस में धारा 29-30 की धारणा ‘अटल’ नहीं, अभियोजन को पहले साबित करने होंगे अपराध के बुनियादी तथ्य: सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को किया बरी

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि POCSO Act की धाराएं 29 और 30 के तहत कानूनी धारणा rebuttable है। अभियोजन को पहले अपराध के foundational facts साबित करने होंगे। विरोधाभासी और चिकित्सा-फोरेंसिक साक्ष्यों से मेल न खाने के कारण कोर्ट ने आरोपी को बरी किया।

सुप्रीम कोर्ट ने POCSO Act के तहत आपराधिक मामलों में लागू होने वाली वैधानिक धारणा (Statutory Presumption) को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने स्पष्ट किया कि POCSO Act की धारा 29 और 30 के तहत बनी धारणा rebuttable यानी खंडनीय है और इसे अभियोजन की ओर से अपराध के मूलभूत तथ्यों (Foundational Facts) को साबित करने की जिम्मेदारी का विकल्प नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि केवल इसलिए कि किसी आरोपी पर POCSO Act के तहत मुकदमा चल रहा है, अभियोजन की कहानी को स्वतः सही नहीं मान लिया जा सकता। अभियोजन को पहले विश्वसनीय साक्ष्यों के माध्यम से उन तथ्यों को स्थापित करना होगा, जिनके आधार पर वैधानिक धारणा लागू हो सके।

2.5 साल की बच्ची से यौन अपराध का आरोप

मामला 9 दिसंबर 2015 की घटना से जुड़ा था। अभियोजन के अनुसार करीब ढाई साल की बच्ची खेलते हुए आरोपी की झुग्गी में गई थी, जिसके बाद आरोपी उसे हंस राज सिटी पार्क ले गया।

बच्ची के घर लौटने के बाद उसकी मां ने आरोप लगाया कि बच्ची ने पेशाब करते समय दर्द की शिकायत की और उसकी पायजामी पर खून दिखाई दिया। मां के अनुसार बच्ची ने आरोपी पर penetrative sexual act करने का आरोप लगाया था।

11 दिसंबर 2015 को शिकायत दर्ज होने के बाद FIR दर्ज की गई। बच्ची की बेहद कम उम्र के कारण उसका धारा 161 CrPC के तहत बयान दर्ज नहीं किया जा सका। अभियोजन ने कुल 13 गवाह पेश किए।

ट्रायल कोर्ट ने 10 साल की सजा सुनाई थी

ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को IPC की धारा 363 और POCSO Act की धारा 6 के तहत दोषी ठहराया था। उसे POCSO Act की धारा 6 के तहत 10 साल के कठोर कारावास और ₹5,000 जुर्माने तथा IPC की धारा 363 के तहत एक साल के कठोर कारावास और ₹3,000 जुर्माने की सजा दी गई।

हालांकि, IPC की धारा 506 के तहत आरोपी को बरी कर दिया गया।

दिल्ली हाईकोर्ट ने 3 जुलाई 2025 को ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि को बरकरार रखा, जिसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

मां और डॉक्टर के बयानों में मिला महत्वपूर्ण विरोधाभास

SUPREME COURT ने पीड़िता की मां, निजी डॉक्टर, मेडिकल रिपोर्ट और FSL रिपोर्ट समेत पूरे साक्ष्य का बारीकी से परीक्षण किया।

कोर्ट ने पाया कि बच्ची को डॉक्टर के पास ले जाने के समय को लेकर मां और डॉक्टर के बयानों में महत्वपूर्ण अंतर था। मां ने कहा था कि वह बच्ची को रात करीब 9:30 बजे डॉक्टर के पास ले गई थी, जबकि डॉक्टर के अनुसार बच्ची शाम करीब 4-5 बजे उसके पास लाई गई थी।

कोर्ट ने इसे महज मामूली विरोधाभास मानने से इनकार किया और कहा कि अन्य साक्ष्यों के साथ देखने पर यह अंतर महत्वपूर्ण हो जाता है।

FIR में महत्वपूर्ण बातें नहीं थीं

सुप्रीम कोर्ट ने पीड़िता की मां के बयान में महत्वपूर्ण सुधार (Material Improvements) भी पाए।

बाद की गवाही में मां ने कहा कि आरोपी ने बच्ची को पार्क में आग जलाने के लिए ले जाने की बात कही थी और बच्ची ने उसके साथ penetrative sexual act की जानकारी दी थी। लेकिन ये महत्वपूर्ण बातें FIR में नहीं थीं।

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कोर्ट ने माना कि FIR घटना का पहला विवरण होने के कारण इन महत्वपूर्ण तथ्यों का उसमें न होना मां की गवाही की विश्वसनीयता पर असर डालता है।

डॉक्टर की गवाही पर भी कोर्ट ने उठाए सवाल

डॉक्टर ने दावा किया था कि उसने बच्ची की पायजामी पर खून के निशान देखे थे और पुलिस को कथित यौन हमले की जानकारी दी थी।

लेकिन डॉक्टर ने न तो मेडिकल पेपर तैयार किया और न ही कोई उपचार किया। इसके अलावा, किसी पुलिस गवाह ने डॉक्टर के उस दावे की पुष्टि नहीं की कि उसने फोन पर पुलिस को घटना की जानकारी दी थी।

मेडिकल और फोरेंसिक साक्ष्य अभियोजन के दावे के अनुरूप नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि बच्ची की शारीरिक जांच करने वाले डॉक्टर को वल्वा क्षेत्र में कोई चोट या खून के निशान नहीं मिले। हाइमन भी सामान्य और अक्षत पाया गया।

FSL जांच में संबंधित नमूनों पर न तो वीर्य और न ही पुरुष DNA मिला। FSL विशेषज्ञ ने यह भी बताया कि बच्ची की पायजामी पर खून का पता नहीं चला।

कोर्ट ने कहा कि इस मामले की परिस्थितियों में मेडिकल और फोरेंसिक साक्ष्य केवल अभियोजन के आरोप की पुष्टि करने में विफल नहीं रहे, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर penetrative act के आरोप से भी मेल नहीं खाते थे।

हालांकि, कोर्ट ने महत्वपूर्ण रूप से स्पष्ट किया कि केवल चोट या वीर्य की अनुपस्थिति को अपने आप में बलात्कार के आरोप को खारिज करने का आधार नहीं माना जा सकता। इस मामले में मेडिकल, फोरेंसिक और प्रत्यक्ष साक्ष्य के बीच मौजूद व्यापक विरोधाभासों के संयुक्त प्रभाव को देखते हुए निष्कर्ष निकाला गया।

‘Sterling Witness’ के मानक पर भी मां की गवाही खरी नहीं उतरी

सुप्रीम कोर्ट ने Rai Sandeep v. State (NCT of Delhi) के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि जब अभियोजन किसी गवाह की गवाही को मुख्य साक्ष्य के रूप में पेश करता है, तो उस गवाही में ऐसा आवश्यक स्तर का गुण और निरंतरता होनी चाहिए जिससे अदालत का विश्वास कायम हो सके।

कोर्ट ने पाया कि पीड़िता की मां की गवाही में महत्वपूर्ण विरोधाभास थे और वह मेडिकल तथा फोरेंसिक साक्ष्य के अनुरूप भी नहीं थी। इसलिए वह ‘sterling witness’ के आवश्यक मानक पर खरी नहीं उतरी।

पानी के कनेक्शन को लेकर पुरानी रंजिश का भी जिक्र

बचाव पक्ष ने दावा किया था कि शिकायत दोनों परिवारों के बीच पहले से चली आ रही रंजिश का परिणाम थी। विवाद एक साझा पानी के कनेक्शन को लेकर था।

साक्ष्यों से यह सामने आया कि आरोपी की झुग्गी शिकायतकर्ता की झुग्गी से सटी हुई थी और पानी के बंटवारे तथा कलेक्शन को लेकर दोनों परिवारों में विवाद हुआ था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन साक्ष्यों में मौजूद विरोधाभासों और मेडिकल-फोरेंसिक समर्थन के अभाव की पृष्ठभूमि में बचाव पक्ष का यह संस्करण evidentiary significance रखता है।

POCSO की धारा 29 और 30 पर सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने POCSO Act की धारा 29 और 30 के प्रभाव की विस्तार से व्याख्या की।

धारा 29 कुछ निर्दिष्ट POCSO अपराधों के किए जाने के संबंध में वैधानिक धारणा बनाती है, जबकि धारा 30 आरोपी की culpable mental state के संबंध में धारणा से जुड़ी है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोनों धाराएं rebuttable presumptions यानी खंडनीय कानूनी धारणा हैं। इन्हें पूर्ण या अटल धारणा नहीं माना जा सकता।

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पहले ‘Foundational Facts’ साबित करना जरूरी

कोर्ट ने कहा कि धारा 29 के लागू होने से पहले अभियोजन को कथित अपराध के आवश्यक बुनियादी तथ्यों को विश्वसनीय साक्ष्यों से स्थापित करना होगा।

सिर्फ POCSO Act के तहत मुकदमा दर्ज होने से अभियोजन की कहानी स्वतः ‘गॉस्पेल ट्रुथ’ नहीं बन जाती। वैधानिक धारणा को इस तरह नहीं पढ़ा जा सकता कि वह अभियोजन को अपराध के मूलभूत तथ्यों को साबित करने की जिम्मेदारी से मुक्त कर दे।

आरोपी को अपनी बेगुनाही ‘बियॉन्ड रीजनेबल डाउट’ साबित करने की जरूरत नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब वैधानिक धारणा लागू होती है और evidential burden आरोपी पर आता है, तब आरोपी को अपनी बेगुनाही beyond reasonable doubt साबित करने की जरूरत नहीं होती।

वह अभियोजन के साक्ष्यों में विरोधाभास, कमियां या असंभावनाएं दिखाकर, मेडिकल और प्रत्यक्ष साक्ष्य के बीच असंगति सामने रखकर अथवा ऐसा बचाव प्रस्तुत करके धारणा को rebut कर सकता है, जो संभावनाओं के संतुलन (preponderance of probabilities) के आधार पर उचित रूप से संभावित हो।

वहीं, अभियोजन पर दोषसिद्धि के लिए आरोपी का अपराध beyond reasonable doubt साबित करने की मूल जिम्मेदारी बनी रहती है।

Article 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई की गारंटी प्रभावित नहीं हो सकती

कोर्ट ने कहा कि POCSO की धारा 29 और 30 का reverse burden, संविधान के Article 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) की आवश्यकता को खत्म नहीं करता।

अदालतों को वैधानिक धारणा के बावजूद पूरे साक्ष्य का निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन करना होगा। Reverse burden को आपराधिक मुकदमे के सामान्य सिद्धांतों पर हावी नहीं होने दिया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी दोहराया कि यदि साक्ष्यों के आधार पर दो दृष्टिकोण उचित रूप से संभव हों, तो आरोपी के पक्ष में जाने वाला दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि रद्द कर आरोपी को किया बरी

पूरे साक्ष्य का मूल्यांकन करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अभियोजन की कहानी में महत्वपूर्ण विरोधाभास और असंभावनाएं थीं तथा मेडिकल और फोरेंसिक साक्ष्य भी उसका समर्थन नहीं करते थे।

कोर्ट ने माना कि आरोपी वैधानिक धारणा का सफलतापूर्वक खंडन करने में सक्षम रहा और केवल POCSO Act की धाराओं 29 और 30 की presumption के आधार पर उसकी दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने 3 जुलाई 2025 के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले और 21 अगस्त 2023 के ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया तथा आरोपी को IPC की धारा 363 और POCSO Act की धारा 6 के आरोपों से बरी कर दिया।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि आरोपी किसी अन्य मामले में आवश्यक नहीं है तो उसे तत्काल रिहा किया जाए। दोनों अपीलें स्वीकार कर ली गईं।

मामला: Deepak in JC v. State (NCT of Delhi), 2026, निर्णय दिनांक 17 सितंबर 2026

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