केरल हाईकोर्ट: महिला को पहले से पता था कि आरोपी शादीशुदा है, तो शादी का वादा प्रथम दृष्टया ‘झूठा वादा’ नहीं; आरोपी को अग्रिम जमानत

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हाईकोर्ट ने धारा 69 बीएनएस की व्याख्या की

केरल हाईकोर्ट ने कहा कि यदि महिला को पहले से पता था कि आरोपी पहले से शादीशुदा है, तो उससे विवाह का वादा प्रथम दृष्टया भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 के तहत ‘झूठा विवाह का वादा’ नहीं माना जा सकता। अदालत ने एससी/एसटी एक्ट के मामले में आरोपी को अग्रिम जमानत दे दी।


केरल हाईकोर्ट ने आरोपी को दी अग्रिम जमानत

केरल हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत गठित विशेष अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी की अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) याचिका खारिज कर दी गई थी।

न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन ने कहा कि यदि शिकायतकर्ता को पहले से यह जानकारी थी कि आरोपी पहले से विवाहित है, तो ऐसी स्थिति में विवाह का वादा प्रथम दृष्टया भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 69 के तहत झूठा विवाह का वादा नहीं माना जा सकता।


क्या था मामला?

आरोपी Future Fly International Pvt. Ltd. में मैनेजर था, जबकि शिकायतकर्ता उसी कंपनी में कर्मचारी थी और अनुसूचित जाति समुदाय से संबंधित थी।

अभियोजन के अनुसार, 22 अगस्त 2025 को आरोपी शिकायतकर्ता को एक विला में ले गया, जहां उसने यह कहकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए कि वह अपनी पत्नी को तलाक देकर उससे विवाह करेगा।

शिकायतकर्ता का आरोप था कि उसने केवल इसी विवाह के आश्वासन पर शारीरिक संबंध के लिए सहमति दी थी।


जातिसूचक टिप्पणी और धमकी का भी आरोप

अभियोजन के अनुसार, 15 नवंबर 2025 को आरोपी के बेटे के जन्मदिन समारोह के दौरान आरोपी ने दोबारा शारीरिक संबंध बनाने की मांग की।

जब शिकायतकर्ता ने इनकार किया, तो आरोपी ने कथित रूप से कहा कि वह विवाह के योग्य नहीं है, लेकिन उसके साथ विवाहेतर संबंध बनाए रखने के योग्य है।

शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी ने उसके खिलाफ जातिसूचक अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया।

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इन आरोपों के आधार पर आरोपी के खिलाफ बीएनएस की धारा 69 तथा एससी/एसटी अधिनियम की धारा 3(1)(s) और 3(2)(va) के तहत एफआईआर दर्ज की गई।


विशेष अदालत ने क्यों खारिज की थी जमानत?

विशेष अदालत ने माना था कि रिकॉर्ड पर प्रथम दृष्टया मामला बनता है और एससी/एसटी अधिनियम की धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत पर वैधानिक रोक लागू होती है।

इसी आदेश को चुनौती देते हुए आरोपी ने केरल हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।


हाईकोर्ट ने धारा 69 बीएनएस की व्याख्या की

हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 69 बीएनएस उन मामलों को अपराध मानती है, जहां कोई व्यक्ति बिना विवाह करने के वास्तविक इरादे के, धोखे से विवाह का वादा कर किसी महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाता है।

अदालत ने कहा कि कानून की दृष्टि से विवाह का वैध वादा वही व्यक्ति कर सकता है, जो ऐसा वादा करने के लिए कानूनी रूप से सक्षम हो।


यदि महिला को आरोपी के विवाहित होने की जानकारी थी

अदालत ने कहा कि यदि महिला को पहले से यह पता था कि आरोपी पहले से शादीशुदा है, तो सामान्य परिस्थितियों में वह यह वैध अपेक्षा नहीं कर सकती कि आरोपी उससे तत्काल कानूनी रूप से विवाह कर सकता है।

कोर्ट ने कहा कि चूंकि पहली शादी के रहते दूसरी शादी करना कानूनन निषिद्ध है और यह द्विविवाह (Bigamy) का अपराध हो सकता है, इसलिए ऐसी स्थिति में प्रथम दृष्टया यह नहीं कहा जा सकता कि महिला की सहमति केवल धोखे से प्राप्त की गई थी।


एफआईआर दर्ज करने में देरी पर भी अदालत की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने पाया कि कथित पहली घटना अगस्त 2025 की थी, जबकि एफआईआर 23 अप्रैल 2026 को दर्ज कराई गई।

अदालत ने यह भी नोट किया कि एफआईआर दर्ज होने से पहले शिकायतकर्ता के खिलाफ एक अन्य आपराधिक मामला पहले ही दर्ज हो चुका था।

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इसके बावजूद उस दौरान शिकायतकर्ता ने कथित यौन अपराध के संबंध में कोई आरोप नहीं लगाया था।


शिकायत को ‘काउंटरब्लास्ट’ होने की संभावना पर टिप्पणी

अदालत ने कहा कि उपलब्ध परिस्थितियां प्रथम दृष्टया आरोपी के इस तर्क को कुछ हद तक समर्थन देती हैं कि वर्तमान शिकायत संभवतः पहले दर्ज मामले की प्रतिक्रिया (Counterblast) के रूप में दायर की गई हो।

हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि यह केवल जमानत याचिका पर विचार करते समय की गई प्रारंभिक टिप्पणी है और इसका मामले के अंतिम निर्णय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।


हाईकोर्ट का फैसला

हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर एससी/एसटी अधिनियम की धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत पर रोक लगाने के लिए आवश्यक प्रथम दृष्टया मामला पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं होता।

इसी आधार पर अदालत ने विशेष अदालत का आदेश रद्द करते हुए आरोपी को अग्रिम जमानत प्रदान कर दी।

साथ ही स्पष्ट किया कि आदेश में की गई सभी टिप्पणियां केवल जमानत याचिका के निस्तारण तक सीमित हैं और वे जांच या ट्रायल को किसी भी प्रकार प्रभावित नहीं करेंगी।


मामला

Akhil N.R. v. State of Kerala (2026)
निर्णय दिनांक: 12 जून 2026


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