इलाहाबाद हाईकोर्ट: बाल विवाह पर रोक सभी धर्मों पर लागू, मुस्लिम पर्सनल लॉ भी PCMA और POCSO से ऊपर नहीं

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 और POCSO कानून सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ भी बाल विवाह की अनुमति नहीं दे सकता और इस संबंध में दर्ज FIR रद्द करने से इनकार कर दिया।


इलाहाबाद हाईकोर्ट: बाल विवाह पर प्रतिबंध सभी धर्मों पर लागू, मुस्लिम पर्सनल लॉ भी PCMA और POCSO से ऊपर नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 (Prohibition of Child Marriage Act-PCMA) के तहत बाल विवाह पर लगाया गया प्रतिबंध सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होता है। अदालत ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ सहित कोई भी व्यक्तिगत कानून न तो बाल विवाह निषेध कानून का उल्लंघन कर सकता है और न ही यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) को निष्प्रभावी बना सकता है।

जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने यह टिप्पणी 16 वर्षीय मुस्लिम लड़की के विवाह को रोकने गई पुलिस और चाइल्डलाइन टीम को कथित रूप से बाधित करने के आरोप में दर्ज एफआईआर रद्द करने से इनकार करते हुए की।

बालिग होने से पहले विवाह की अनुमति कानून के विपरीत

हाईकोर्ट ने कहा कि शरिया कानून के तहत यौवन (Puberty) प्राप्त होने के बाद विवाह की अनुमति देने की अवधारणा बाल विवाह निषेध अधिनियम और POCSO कानून के प्रावधानों के विपरीत है।

अदालत ने कहा कि यदि किसी लड़की का विवाह 18 वर्ष की आयु से पहले कराया जाता है, तो यह न केवल PCMA का उल्लंघन होगा, बल्कि नाबालिग के साथ यौन संबंधों पर रोक लगाने वाले POCSO अधिनियम के भी विपरीत होगा।

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केरल हाईकोर्ट के फैसले से जताई सहमति

पीठ ने कहा कि इस मुद्दे पर विभिन्न हाईकोर्टों के अलग-अलग दृष्टिकोण रहे हैं। हालांकि, उसने केरल हाईकोर्ट के 2024 के फैसले से सहमति व्यक्त की, जिसमें कहा गया था कि बाल विवाह पर प्रतिबंध सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होता है।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि यह मुद्दा पहले सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी पहुंचा था, लेकिन शीर्ष अदालत ने अब तक इस विषय पर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है।

क्या था मामला?

मामला उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के ककोड़ थाना में 15 फरवरी 2026 को दर्ज एफआईआर से जुड़ा है।

एफआईआर के अनुसार, पुलिस और चाइल्डलाइन अधिकारियों को सूचना मिली थी कि एक 16 वर्षीय नाबालिग लड़की का विवाह कराया जा रहा है। सूचना मिलने पर अधिकारी विवाह रोकने के लिए लड़की के घर पहुंचे।

अभियोजन के मुताबिक, जब अधिकारियों ने बच्ची को बाल कल्याण समिति (Child Welfare Committee) के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास किया, तब याचिकाकर्ताओं और अन्य लोगों ने पुलिस एवं चाइल्डलाइन टीम के साथ अभद्र व्यवहार किया, उन्हें धमकाया और कथित रूप से बच्ची को टीम की अभिरक्षा से जबरन छुड़ा लिया।

मुस्लिम पर्सनल लॉ का तर्क अदालत ने किया खारिज

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार यौवन प्राप्त कर चुकी लड़की, जिसे सामान्यतः 15 वर्ष माना जाता है, विवाह के लिए सक्षम होती है। इसलिए बाल विवाह निषेध अधिनियम उनके मामले में लागू नहीं होना चाहिए।

हाईकोर्ट ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि भारत में विवाह की न्यूनतम आयु सभी नागरिकों के लिए PCMA द्वारा निर्धारित होगी, चाहे उनका धर्म कोई भी हो।

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18 वर्ष से कम उम्र में विवाह POCSO का भी उल्लंघन

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि 18 वर्ष से कम आयु की लड़की का विवाह कराया जाता है, तो इससे POCSO अधिनियम के उल्लंघन की भी संभावना उत्पन्न होती है।

कोर्ट ने कहा कि पुलिस और चाइल्डलाइन टीम PCMA के तहत अपने वैधानिक कर्तव्यों का पालन कर रही थी और साथ ही संभावित POCSO अपराध को रोकने के लिए भी कार्रवाई कर रही थी।

एफआईआर रद्द करने से किया इनकार

हाईकोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया रिकॉर्ड से यह प्रतीत होता है कि याचिकाकर्ताओं ने लोक सेवकों को उनके वैधानिक कर्तव्यों के निर्वहन से रोकने का प्रयास किया।

अदालत ने माना कि मामले में विस्तृत जांच आवश्यक है और इस स्तर पर एफआईआर रद्द करना उचित नहीं होगा। इसलिए याचिका खारिज कर दी गई।


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