दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि POCSO Act के तहत बच्चे के खिलाफ यौन अपराध को पीड़ित या उसके परिवार और आरोपी के बीच समझौते के आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता। ऐसे अपराध निजी विवाद नहीं हैं और इनका समाज पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
समझौते के आधार पर POCSO कार्यवाही खत्म करने से इनकार
Delhi High Court ने स्पष्ट किया है कि Protection of Children from Sexual Offences (POCSO) Act के तहत दर्ज आपराधिक कार्यवाही को बच्चे की पीड़ित पक्ष या उसके परिवार और आरोपी के बीच हुए समझौते के आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता।
जस्टिस सचिन दत्ता ने यह टिप्पणी उस याचिका को खारिज करते हुए की, जिसमें पीड़िता और उसके परिवार की ओर से कथित रूप से किए गए समझौते के आधार पर FIR तथा उससे संबंधित आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की गई थी।
आरोपी पर गंभीर यौन अपराध का आरोप
मामले में बच्चे के साथ गंभीर penetrative sexual assault के आरोप लगाए गए थे। आरोपी पर यह भी आरोप था कि वह पीड़ित बच्चे के प्रति विश्वास या अधिकार की स्थिति में था।
हाईकोर्ट ने अपराध की प्रकृति को देखते हुए कहा कि इस तरह के अपराध केवल पीड़ित और आरोपी के बीच का निजी विवाद नहीं हैं, बल्कि इनका व्यापक सामाजिक प्रभाव होता है।
गंभीर अपराधों में समझौता आधार नहीं बन सकता
हाईकोर्ट ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सिद्धांतों पर भरोसा किया। सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि हाईकोर्ट के पास संविधान के तहत प्राप्त अपनी अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल कर आपराधिक कार्यवाही को उचित मामलों में समाप्त करने का अधिकार है, लेकिन इस शक्ति का प्रयोग अपराध की प्रकृति और गंभीरता को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, बलात्कार जैसे जघन्य और गंभीर अपराधों को केवल इसलिए समाप्त नहीं किया जा सकता कि पीड़ित या उसके परिवार और आरोपी के बीच समझौता हो गया है। ऐसे अपराध निजी प्रकृति के नहीं होते और उनका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है।
POCSO अपराध को निजी विवाद नहीं माना जा सकता
इसी सिद्धांत को लागू करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि POCSO Act के तहत बच्चे के खिलाफ किए गए अपराध को पीड़ित या उसके परिवार द्वारा आरोपी के साथ समझौता करके समाप्त नहीं किया जा सकता।
अदालत ने माना कि इस स्तर पर समझौते के आधार पर FIR और आपराधिक कार्यवाही को रद्द करना POCSO कानून के उद्देश्य को विफल करने के साथ-साथ न्याय के हित के भी प्रतिकूल होगा।
ट्रायल कोर्ट तय करेगा मामले का मेरिट
हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कार्यवाही रद्द करने से इनकार करने का उसका आदेश मामले के मेरिट पर कोई राय नहीं माना जाएगा।
अदालत ने कहा कि मामले में लगाए गए आरोप सही हैं या नहीं, इसका निर्धारण ट्रायल कोर्ट द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा।
इस आधार पर दिल्ली हाईकोर्ट ने समझौते के आधार पर FIR और संबंधित कार्यवाही रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी।
कानूनी महत्व
यह निर्णय इस सिद्धांत को रेखांकित करता है कि POCSO Act के तहत बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों की प्रकृति सार्वजनिक और गंभीर है, इसलिए ऐसे मामलों में पक्षकारों के बीच निजी समझौता आपराधिक कार्यवाही समाप्त करने का स्वतः आधार नहीं बन सकता। हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल भी अपराध की गंभीरता और संबंधित विशेष कानून के उद्देश्य को ध्यान में रखकर किया जाना आवश्यक है।
#Tags
#POCSO #POCSOAct #DelhiHighCourt #DelhiHC #SexualOffences #ChildSexualAbuse #ChildProtection #FIRQuashing #CriminalLaw #LegalNews #दिल्लीहाईकोर्ट #पॉक्सो #पॉक्सोएक्ट #बालयौनअपराध #कानूनीसमाचार #आपराधिककानून
