जांच में यह भी सामने आया कि स्कूल में लगे लगभग 64 CCTV कैमरे बंद थे
दिल्ली हाईकोर्ट ने 3 वर्षीय बच्ची से जुड़े POCSO मामले में आरोपी की जमानत रद्द करते हुए कहा कि इतनी कम उम्र के बच्चे का बयान पूरी तरह क्रमबद्ध न हो, फिर भी उसे अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जांच के महत्वपूर्ण चरण में पीड़ित के बयान और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को उचित महत्व दिया जाना चाहिए।
दिल्ली हाईकोर्ट ने तीन वर्षीय बच्ची के साथ कथित गंभीर यौन उत्पीड़न (Aggravated Penetrative Sexual Assault) के मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी की जमानत रद्द कर दी है। अदालत ने कहा कि POCSO मामलों में जब जांच महत्वपूर्ण चरण में हो, तब अदालतों को पीड़ित बच्चे के तत्काल खुलासे, आरोपी की पहचान, परिस्थितिजन्य साक्ष्यों और POCSO अधिनियम के उद्देश्य को विशेष महत्व देना चाहिए।
न्यायमूर्ति विनोद कुमार की एकल पीठ ने राज्य सरकार और पीड़िता की मां की ओर से दायर याचिकाओं को स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को दी गई नियमित जमानत को निरस्त कर दिया। अदालत ने आरोपी को संबंधित POCSO कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।
क्या था पूरा मामला?
मामला तीन वर्षीय नर्सरी छात्रा से जुड़ा है। बच्ची ने स्कूल से घर लौटने के बाद अपनी मां को निजी अंग में दर्द और रक्तस्राव की शिकायत करते हुए बताया कि स्कूल का एक “बड़ा लड़का” उसे नीचे ले गया और उसके साथ गलत हरकत की। अगले दिन पुलिस में FIR दर्ज कराई गई।
जांच के दौरान बच्ची ने पुलिस स्टेशन में आरोपी की पहचान की। उसने अपनी शिक्षिका की भी पहचान की, जिसके बारे में उसने बताया कि घटना के बाद उसे बेसमेंट ले जाकर खून साफ किया गया।
जांच में क्या सामने आया?
जांच एजेंसी ने घटनास्थल से खून से सने टिश्यू पेपर और बेडशीट का हिस्सा जब्त किया तथा DVR को फोरेंसिक जांच के लिए कब्जे में लिया। जांच में यह भी सामने आया कि स्कूल में लगे लगभग 64 CCTV कैमरे बंद थे। केवल एक पोर्टेबल कैमरा कार्यरत था, जिसमें आरोपी घटना के समय जूनियर विंग की ओर जाता दिखाई दिया।
ट्रायल कोर्ट ने क्यों दी थी जमानत?
ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए आरोपी को नियमित जमानत दे दी थी कि मेडिकल रिपोर्ट में गंभीर चोट का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, CCTV फुटेज आरोपी के पक्ष में संदेह पैदा करता है तथा उसकी आगे की पुलिस हिरासत आवश्यक नहीं है।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की टिप्पणी को क्यों माना गलत?
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण तथ्यों को नजरअंदाज कर दिया। अदालत ने माना कि:
- बच्ची ने घटना के तुरंत बाद दर्द और रक्तस्राव की शिकायत की।
- उसने आरोपी की स्पष्ट पहचान की।
- आरोपी घटना के समय उसी विंग में मौजूद था।
- रिकॉर्ड पर ऐसा कोई तथ्य नहीं है जिससे यह लगे कि परिवार ने झूठा आरोप लगाया हो।
कोर्ट ने कहा कि तीन वर्ष का बच्चा किसी वयस्क की तरह घटनाओं का क्रम और समय नहीं बता सकता, इसलिए उसके बयान को उसी दृष्टिकोण से परखा जाना चाहिए।
महत्वपूर्ण टिप्पणी
अदालत ने अपने फैसले में कहा:
“इतनी कम उम्र का बच्चा कभी-कभी असंगत या अतार्किक तरीके से बातें कर सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह गलत कह रहा है।”
कोर्ट ने कहा कि इतनी कम उम्र के बच्चे का व्यवहार और बयान वयस्कों से अलग होता है। इसलिए केवल इस आधार पर उसकी विश्वसनीयता पर संदेह नहीं किया जा सकता।
मेडिकल रिपोर्ट पर भी कोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मेडिकल रिपोर्ट में तत्काल गंभीर चोट का उल्लेख न होना या फोरेंसिक रिपोर्ट का लंबित होना अभियोजन के मामले को इस स्तर पर कमजोर नहीं बनाता। अदालत ने कहा कि जांच पूरी होने से पहले ऐसे निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय X v. State of U.P. (2026 SCC OnLine SC 43) का हवाला देते हुए कहा कि POCSO मामलों में जमानत पर विचार करते समय अपराध की गंभीरता, पीड़ित बच्चे की संवेदनशीलता और POCSO अधिनियम के उद्देश्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
हाईकोर्ट का फैसला
अदालत ने राज्य सरकार और पीड़िता की मां की दोनों याचिकाएं स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट का जमानत आदेश निरस्त कर दिया और आरोपी को संबंधित POCSO अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।
केस डिटेल
Case: State v. Lalit Kumar
Citation: 2026 SCC OnLine Del 4827
Court: Delhi High Court
Judge: Justice Vinod Kumar
Decision Date: 29 June 2026
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