महात्मा गांधी के पोते की 30 एकड़ जमीन से अमेरिकी अदालत ने अवैध कब्जा हटाने का दिया आदेश, 20 महीने की कानूनी लड़ाई के बाद ट्रस्ट को मिली जीत

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AI की मदद से तैयार की कानूनी रणनीति – 30 एकड़ जमीन पर कब्जे का दावा करने वाले ग्रेगरी ब्लैक को कब्जा हटाने का आदेश

अमेरिका की वर्जीनिया अदालत ने महात्मा गांधी के पोते कनु रामदास गांधी और उनकी पत्नी शिवा गांधी की 30 एकड़ जमीन पर कब्जे का दावा करने वाले ग्रेगरी ब्लैक को कब्जा हटाने का आदेश दिया है। अदालत ने 30 दिनों के भीतर जमीन खाली कर ट्रस्ट को सौंपने का निर्देश दिया।

अमेरिका की एक अदालत ने महात्मा गांधी के पोते स्वर्गीय कनु रामदास गांधी और उनकी पत्नी शिवा गांधी की 30 एकड़ जमीन पर कथित अवैध कब्जे के मामले में अहम फैसला सुनाया है। वर्जीनिया के वॉरेन काउंटी सर्किट कोर्ट ने स्थानीय निवासी ग्रेगरी ब्लैक को जमीन से अपना कब्जा हटाने और उसे संबंधित चैरिटेबल ट्रस्ट को सौंपने का आदेश दिया है।

यह फैसला सूरत के परिमल देसाई के नेतृत्व में करीब 20 महीने तक चली कानूनी लड़ाई के बाद आया है। अदालत ने ग्रेगरी ब्लैक को जमीन पर बने केबिन, शिकार के मचान और अन्य निर्माण हटाने के लिए 30 दिन का समय दिया है। साथ ही उन्हें भविष्य में जमीन पर प्रवेश करने या उस पर मालिकाना हक जताने से भी रोक दिया गया है।

विवाद वर्जीनिया के वॉरेन काउंटी में शेनानडोआ नेशनल पार्क के पास स्थित 30 एकड़ जमीन से जुड़ा है। कनु गांधी और शिवा गांधी ने वर्ष 1987 में यह जमीन खरीदी थी।

कैसे शुरू हुआ जमीन का विवाद?

परिमल देसाई ने मीडिया को बताया कि विवाद की शुरुआत 10 जनवरी 2025 को हुई, जब अमेरिकी नागरिक ग्रेगरी ब्लैक ने उनके घर के पते पर कानूनी नोटिस भेजा।

ब्लैक ने वर्जीनिया के एडवर्स पजेशन (Adverse Possession) यानी प्रतिकूल कब्जे से जुड़े कानून के तहत जमीन पर अपना मालिकाना हक होने का दावा किया था।

इस कानून के तहत निर्धारित कानूनी शर्तों को पूरा करते हुए किसी जमीन पर लगातार 15 वर्षों तक कब्जा रखने वाला व्यक्ति उसके स्वामित्व का दावा कर सकता है।

हालांकि, ग्रेगरी ब्लैक अदालत में अपने दावे के समर्थन में एक्सक्लूसिव एंड एक्चुअल पजेशन (Exclusive and Actual Possession) तथा होस्टाइल क्लेम (Hostile Claim) से जुड़ी आवश्यक शर्तें साबित नहीं कर सके।

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गांधी परिवार ने कैसे बनाया था चैरिटेबल ट्रस्ट?

कनु गांधी और उनकी पत्नी शिवा गांधी वर्ष 2013 में भारत लौट आए थे और दक्षिण गुजरात में रहने लगे थे। नवंबर 2016 में कनु गांधी का सूरत में निधन हो गया। उनकी वसीयत के अनुसार, उनकी संपत्तियां पत्नी शिवा गांधी को प्राप्त हुईं।

इसके बाद वर्ष 2018 में शिवा गांधी ने ‘द डॉ. शिवा एंड कनु रामदास मोहनदास गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट’ की स्थापना की और अपनी वसीयत भी पंजीकृत कराई।

वर्ष 2020 में शिवा गांधी के निधन के बाद उनकी वसीयत लागू हुई। इसके बाद परिमल देसाई ने ट्रस्ट के प्रबंध न्यासी की जिम्मेदारी संभाली।

ट्रस्ट को शिवा गांधी की संपत्तियां और वित्तीय परिसंपत्तियां प्राप्त हुईं। इनका इस्तेमाल परोपकारी गतिविधियों और गांधीवादी विचारधारा के प्रचार-प्रसार के लिए किया जाना है।

जमीन का सर्वे कराने पर खर्च किए 4,500 डॉलर

परिमल देसाई के मुताबिक, उन्होंने वर्ष 2024 में पहली बार वर्जीनिया स्थित इस जमीन का दौरा किया था। जमीन की स्थिति और सीमाओं का पता लगाने के लिए उन्होंने करीब 4,500 डॉलर खर्च करके उसका सर्वे कराया।

उनका कहना था कि यदि ट्रस्ट भविष्य में इस जमीन का इस्तेमाल करना चाहता है, तो सबसे पहले उसका कानूनी स्वामित्व और कब्जा सुनिश्चित करना जरूरी था।

इसके बाद वर्ष 2025 में उन्होंने अमेरिकी अदालत से वसीयत का प्रोबेट (Probate) यानी कानूनी प्रमाणीकरण कराया और जमीन का मालिकाना हक ट्रस्ट के नाम दर्ज करवाने की प्रक्रिया पूरी की।

AI की मदद से तैयार की कानूनी रणनीति

ग्रेगरी ब्लैक का दावा था कि वह वर्ष 2008 से इस जमीन पर कब्जा किए हुए थे। अपने दावे के समर्थन में उन्होंने जमीन पर बने रास्तों, एक केबिन, पेड़ों पर बने शिकार के मचान, पुलिया और अन्य निर्माणों का हवाला दिया। उन्होंने अदालत में तस्वीरें भी पेश कीं।

परिमल देसाई ने अमेरिका में वकील नियुक्त किए और भारत में रहते हुए कानूनी लड़ाई की तैयारी की। इस दौरान उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की भी मदद ली, ताकि यह समझ सकें कि प्रतिकूल कब्जे के दावे को किन कानूनी आधारों पर चुनौती दी जा सकती है।

देसाई के अनुसार, 8 से 11 सितंबर के बीच हुई अंतिम सुनवाई में उन्होंने अदालत को बताया कि कनु गांधी महात्मा गांधी के पोते थे और उन्होंने अपनी पत्नी के साथ ऐसी संपत्ति ट्रस्ट को सौंपी थी, जिसका उद्देश्य गांधीवादी विचारधारा का प्रचार-प्रसार करना है।

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उन्होंने GIS मैपिंग के जरिए यह तर्क भी रखा कि जमीन पर बना केबिन 15 साल पुराना नहीं था। इसके अलावा, वर्ष 2020 के बाद उनके कई बार जमीन का दौरा करने से ग्रेगरी ब्लैक के लगातार वास्तविक कब्जे के दावे पर सवाल उठे।

जमीन पर एक अन्य महिला के रहने की जानकारी भी सामने आई। इससे ब्लैक के इस दावे को चुनौती मिली कि पूरी जमीन पर केवल उन्हीं का कब्जा था।

अदालत ने क्या फैसला सुनाया?

21 अक्टूबर को जारी आदेश में वॉरेन काउंटी सर्किट कोर्ट के जज डेरिल एल. फंक ने परिमल देसाई और चैरिटेबल ट्रस्ट के पक्ष में फैसला सुनाया।

अदालत ने ग्रेगरी ब्लैक को निम्नलिखित निर्देश दिए:

  1. जमीन पर बने केबिन, शिकार के मचान, शिकार के लिए बनाई गई झोपड़ियों और अपने निजी सामान को 30 दिनों के भीतर हटाएं।
  2. जमीन का वास्तविक और कानूनी कब्जा संबंधित चैरिटेबल ट्रस्ट को सौंपें।
  3. भविष्य में इस जमीन पर प्रवेश न करें।
  4. जमीन पर किसी भी प्रकार का मालिकाना अधिकार जताने से परहेज करें।
  5. अज्ञात उत्तराधिकारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले गार्जियन एड लाइटम के कानूनी खर्च के रूप में 11,375 डॉलर का भुगतान करें।

इस फैसले के साथ करीब 20 महीने से चल रहा कानूनी विवाद समाप्त हुआ और कनु गांधी तथा शिवा गांधी की संपत्ति पर ट्रस्ट के अधिकार को अदालत से राहत मिली।

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