85 साल की उम्र में मिली इंस्पेक्टर पदोन्नति की जीत, 25 साल की कानूनी लड़ाई के बाद हाई कोर्ट का बड़ा आदेश

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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पूर्व पुलिस उपनिरीक्षक राम अवतार सिंह यादव को 16 मार्च 1980 से इंस्पेक्टर पद के वेतन और सभी संबंधित लाभ देने का आदेश दिया। 85 वर्षीय यादव ने करीब 25 साल तक कानूनी लड़ाई लड़ी।

25 साल तक प्रमोशन के लिए कानूनी लड़ाई

उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस उपनिरीक्षक राम अवतार सिंह यादव ने प्रमोशन के अपने अधिकार के लिए करीब 25 वर्षों तक कानूनी संघर्ष किया। सेवा के दौरान प्रमोशन से वंचित किए जाने के बाद उन्होंने पहले पुलिस विभाग, फिर राज्य लोक सेवा अधिकरण और अंततः इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

अब 85 वर्ष की उम्र में उनकी लंबी कानूनी लड़ाई का परिणाम उनके पक्ष में आया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उन्हें इंस्पेक्टर पद से जुड़े वेतन और अन्य सभी संबंधित लाभ देने का निर्देश दिया है।

1980 से इंस्पेक्टर पद का लाभ देने का आदेश

इलाहाबाद हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया कि राम अवतार सिंह यादव को 16 मार्च 1980 से इंस्पेक्टर पद का वेतन और उससे जुड़े अन्य लाभ प्रदान किए जाएं।

कोर्ट ने उनकी सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले संबंधित लाभों को भी इसी आधार पर संशोधित करने का निर्देश दिया है। आदेश के अनुसार, सभी संबंधित लाभों का भुगतान चार सप्ताह के भीतर किया जाना है।

न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्य वीर सिंह की पीठ ने माना कि याचिकाकर्ता के साथ अनुचित व्यवहार हुआ और उन्होंने अपने मामले को आगे बढ़ाने में असाधारण दृढ़ता दिखाई।

प्रमोशन रोकने के लिए प्रतिकूल प्रविष्टियों का हवाला

यादव ने अपने बैच के अन्य अधिकारियों को प्रमोशन मिलने के बाद अपने दावे को लेकर विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और DGP के समक्ष अभ्यावेदन किया था।

हालांकि, अप्रैल 2010 में DGP ने उनके दावे को खारिज कर दिया। इस आदेश में यादव की गोपनीय चरित्र प्रविष्टियों (ACRs) में कथित प्रतिकूल टिप्पणियों और पूर्व में मिली सजा का हवाला दिया गया।

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विभागीय आदेश के अनुसार, यादव को पांच बार दंडित किया गया था और उनके सेवा रिकॉर्ड में सात बार प्रतिकूल टिप्पणियां दर्ज थीं।

राज्य लोक सेवा अधिकरण से हाई कोर्ट तक पहुंचा मामला

DGP के फैसले को चुनौती देते हुए यादव ने राज्य लोक सेवा अधिकरण, लखनऊ का रुख किया। नवंबर 2012 में अधिकरण ने उनका दावा खारिज कर दिया।

इसके बाद दाखिल पुनर्विचार याचिका भी अगले वर्ष खारिज हो गई। यादव ने फिर अधिकरण के फैसले को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी।

हाई कोर्ट में भी जारी रहा संघर्ष

फरवरी 2015 में हाई कोर्ट ने उनकी याचिका गैर-प्रॉसिक्यूशन (non-prosecution) के आधार पर खारिज कर दी।

यादव ने इसके बाद याचिका बहाल करने के लिए आवेदन किया, लेकिन दिसंबर 2025 में एक अन्य पीठ ने भी इसे गैर-प्रॉसिक्यूशन के आधार पर खारिज कर दिया।

इसके बाद उन्होंने दिसंबर के आदेश को वापस लेने के लिए वर्तमान आवेदन दाखिल किया और कोर्ट के समक्ष DGP के 2010 के आदेश से जुड़ा महत्वपूर्ण तथ्य रखा।

प्रतिकूल प्रविष्टियों की जानकारी देने की जिम्मेदारी विभाग की

यादव ने हाई कोर्ट के सामने कहा कि DGP के 2010 के आदेश में जिन प्रतिकूल प्रविष्टियों का उल्लेख किया गया था, उनके बारे में उन्हें कभी जानकारी नहीं दी गई थी।

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने इस पहलू पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति से यह साबित करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती कि उसे कोई बात बताई ही नहीं गई।

पीठ के अनुसार, यदि विभाग प्रतिकूल प्रविष्टियों पर भरोसा कर रहा था तो उसे यह साबित करना था कि वे प्रविष्टियां याचिकाकर्ता को विधिवत बताई गई थीं।

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‘नकारात्मक बात साबित करने का बोझ कर्मचारी पर नहीं’

हाई कोर्ट ने माना कि यादव के इस दावे पर उनसे यह साबित करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती कि उन्हें वर्षों की प्रतिकूल प्रविष्टियों की जानकारी नहीं दी गई थी।

कोर्ट ने पाया कि राज्य लोक सेवा अधिकरण ने इस महत्वपूर्ण पहलू पर उचित ध्यान नहीं दिया।

पीठ ने यह भी कहा कि केवल प्रतिकूल प्रविष्टियों का हवाला देना इस बात का पर्याप्त प्रमाण नहीं है कि यादव के प्रमोशन के दावे पर नियमों के अनुसार उचित और निष्पक्ष तरीके से विचार किया गया था।

85 साल की उम्र में मिला न्याय

हाई कोर्ट ने अंततः निष्कर्ष निकाला कि राम अवतार सिंह यादव के साथ अन्याय हुआ था।

अब उन्हें 16 मार्च 1980 से इंस्पेक्टर पद का वेतन और अन्य सेवा लाभ दिए जाएंगे तथा उनकी सेवानिवृत्ति से संबंधित लाभों को भी उसी आधार पर संशोधित किया जाएगा।

करीब ढाई दशक तक चली यह कानूनी लड़ाई केवल पदोन्नति पाने का मामला नहीं रही, बल्कि अपने अधिकार के लिए लंबे संघर्ष, धैर्य और दृढ़ता का उदाहरण बन गई है।

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