संभल हिंसा मामला: केवल न्यायेतर स्वीकारोक्ति पर NSA के तहत निवारक हिरासत नहीं हो सकती, सुप्रीम कोर्ट ने UP सरकार पर ₹10 लाख का जुर्माना लगाया

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सुप्रीम कोर्ट ने मुल्ला अफरोज की हिरासत रद्द की

सुप्रीम कोर्ट ने संभल हिंसा मामले में मुल्ला अफरोज की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत रद्द करते हुए कहा कि केवल न्यायेतर स्वीकारोक्ति निवारक हिरासत का आधार नहीं बन सकती। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹10 लाख का जुर्माना भी लगाया।

Supreme Court ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल न्यायेतर स्वीकारोक्ति (Extra-Judicial Confession) के आधार पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 (NSA) के तहत किसी व्यक्ति को निवारक हिरासत (Preventive Detention) में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने संभल हिंसा मामले में मुल्ला अफरोज की हिरासत को रद्द करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹10 लाख का जुर्माना लगाया है।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने मंगलवार को अफरोज की अपील स्वीकार करते हुए कहा कि न्यायेतर स्वीकारोक्ति प्रासंगिक सामग्री हो सकती है, लेकिन निवारक हिरासत का आदेश पारित करने से पहले हिरासत प्राधिकारी (Detaining Authority) को अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों और ठोस तथ्यों पर भी विचार करना आवश्यक है।

अदालत ने पाया कि अफरोज के मामले में हिरासत प्राधिकारी ने अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों पर उचित विचार नहीं किया और इस प्रकार निवारक हिरासत की शक्ति का अनुचित प्रयोग किया।

नवंबर 2024 की संभल हिंसा से जुड़ा है मामला

यह मामला नवंबर 2024 में संभल की शाही जामा मस्जिद के न्यायालय के आदेश पर किए गए सर्वेक्षण के दौरान हुई हिंसा से संबंधित है। इस हिंसा के सिलसिले में संभल पुलिस ने 17 जनवरी 2025 को मुल्ला अफरोज को गिरफ्तार किया था।

इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट ने 13 अक्टूबर 2025 को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम की धारा 3(2) के तहत उनकी निवारक हिरासत का आदेश पारित किया था। बाद में राज्य सरकार ने भी हिरासत की पुष्टि कर दी थी।

अफरोज ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में हिरासत आदेश को चुनौती देते हुए दलील दी थी कि अधिकारियों द्वारा भरोसा की गई सामग्री अपर्याप्त थी और मामला मुख्य रूप से कथित न्यायेतर स्वीकारोक्ति पर आधारित था।

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राज्य सरकार ने सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने का लगाया था आरोप

उत्तर प्रदेश सरकार ने हिरासत का बचाव करते हुए जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री पर भरोसा किया था। राज्य का आरोप था कि अफरोज हिंसा के दौरान भीड़ को उकसाने में शामिल थे और उनकी गतिविधियों से सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका थी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पहले हिरासत आदेश को बरकरार रखा था। हाईकोर्ट ने कहा था कि हिरासत प्राधिकारी ने उसके समक्ष प्रस्तुत सामग्री पर विचार किया था और हिरासत के लिए जिन दस्तावेजों पर भरोसा किया गया, वे अफरोज को उपलब्ध कराए गए थे।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि निवारक हिरासत के आदेश की न्यायिक समीक्षा करते समय अदालत को यह देखना चाहिए कि हिरासत प्राधिकारी ने प्रासंगिक सामग्री पर अपना विवेक लगाया है या नहीं। अदालत को इस स्तर पर प्राधिकारी के निर्णय की पर्याप्तता पर अपीलीय अदालत की तरह विचार नहीं करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायेतर स्वीकारोक्ति को अकेले पर्याप्त आधार मानने से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य रूप से इस प्रश्न पर विचार किया कि क्या न्यायेतर स्वीकारोक्ति के आधार पर निवारक हिरासत का आदेश पारित किया जा सकता है और क्या अफरोज के मामले में हिरासत प्राधिकारी द्वारा विचार की गई सामग्री कानूनी रूप से पर्याप्त थी।

पीठ ने स्पष्ट किया कि न्यायेतर स्वीकारोक्ति को प्रासंगिक सामग्री के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन केवल इसी आधार पर निवारक हिरासत का आदेश उचित नहीं ठहराया जा सकता। हिरासत प्राधिकारी को अन्य प्रासंगिक और ठोस परिस्थितियों पर भी विचार करना अनिवार्य है।

अफरोज के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हिरासत प्राधिकारी ने ऐसी अन्य परिस्थितियों पर उचित विचार नहीं किया था। परिणामस्वरूप, हिरासत की शक्ति का प्रयोग उपलब्ध सामग्री से समर्थित नहीं था।

हिरासत आदेश रद्द, उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹10 लाख का जुर्माना

सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत आदेश को निरस्त करते हुए मुल्ला अफरोज की अपील स्वीकार कर ली। साथ ही, उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹10 लाख का जुर्माना लगाया।

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फैसले के प्रमुख बिंदु

  • न्यायेतर स्वीकारोक्ति: अकेले निवारक हिरासत का पर्याप्त आधार नहीं।
  • प्राधिकारी का दायित्व: अन्य प्रासंगिक और ठोस परिस्थितियों पर विचार करना अनिवार्य।
  • हिरासत आदेश: मुल्ला अफरोज के खिलाफ NSA के तहत पारित आदेश रद्द।
  • सरकार पर जुर्माना: उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹10 लाख की लागत।
  • पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू।

फैसले का कानूनी महत्व

यह निर्णय निवारक हिरासत के मामलों में हिरासत प्राधिकारी द्वारा सामग्री के समुचित मूल्यांकन और न्यायिक समीक्षा के महत्व को रेखांकित करता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की कथित न्यायेतर स्वीकारोक्ति को अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों के मूल्यांकन का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।

इस फैसले के अनुसार, NSA के तहत निवारक हिरासत का आदेश पारित करते समय प्राधिकारी को उपलब्ध सामग्री और संबंधित परिस्थितियों पर स्वतंत्र रूप से विचार करना होगा। केवल स्वीकारोक्ति के आधार पर हिरासत को उचित नहीं ठहराया जा सकता।

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