ट्यूबेक्टॉमी के बाद महिला की मौत, अस्पताल और डॉक्टर पर 37.25 लाख रुपये का मुआवजा

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विशाखापत्तनम जिला उपभोक्ता आयोग ने ट्यूबेक्टॉमी ऑपरेशन के बाद महिला की मौत के मामले में अस्पताल और डॉक्टर को कुल 37.25 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। आयोग ने इलाज में गंभीर लापरवाही को मौत का कारण माना।

विशाखापत्तनम जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने ट्यूबेक्टॉमी ऑपरेशन के बाद 43 वर्षीय महिला की मौत के मामले में अस्पताल और संबंधित स्त्री रोग विशेषज्ञ को कुल 37.25 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। आयोग ने माना कि ऑपरेशन के दौरान महिला की बड़ी आंत में चोट लगने और उसके बाद पैदा हुई गंभीर जटिलताओं के उपचार में चिकित्सा लापरवाही हुई, जिसके परिणामस्वरूप उसकी मौत हो गई।

आयोग के अध्यक्ष गुडला तनुजा और सदस्य वरी कृष्ण मूर्ति की पीठ ने मृत महिला की मां, भाई और बहन की ओर से दाखिल शिकायत पर यह आदेश पारित किया।

ट्यूबेक्टॉमी के बाद बिगड़ी महिला की हालत

परिवार के अनुसार, महिला 12 अगस्त 2019 को ट्यूबेक्टॉमी कराने अस्पताल गई थी। आरोप था कि ऑपरेशन के दौरान डॉक्टर की लापरवाही से उसकी बड़ी आंत में चोट लग गई।

इसके बाद महिला को मल संक्रमण, गंभीर सेप्सिस और अंततः कई अंगों के काम करना बंद करने जैसी गंभीर जटिलताओं का सामना करना पड़ा। परिवार का आरोप था कि प्रारंभिक अस्पताल में डॉक्टर समस्या की सही पहचान नहीं कर सके, जिसके बाद महिला को बेहतर उपचार के लिए दूसरे अस्पताल ले जाना पड़ा।

इलाज का खर्च अधिक होने के कारण बाद में उसे तीसरे अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहां इलाज के बाद उसे सरकारी अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे बचाने का प्रयास किया, लेकिन 4 सितंबर 2019 को उसकी मौत हो गई।

दूसरे अस्पताल में सामने आई ऑपरेशन की जटिलता

परिवार के मुताबिक, दूसरे अस्पताल में उपचार के दौरान महिला की स्थिति के वास्तविक कारण का पता चला। इसके बाद 17 अगस्त 2019 को पहले अस्पताल और संबंधित डॉक्टर के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई।

परिवार ने आरोप लगाया कि ऑपरेशन के दौरान हुई आंत की चोट का समय पर पता नहीं चल सका और इसके कारण संक्रमण बढ़ता गया। महिला की हालत बिगड़ने के बाद उसे अलग-अलग अस्पतालों में इलाज के लिए ले जाना पड़ा।

मौत के बाद परिवार ने इलाज में हुए खर्च और अन्य नुकसान के लिए अस्पताल तथा डॉक्टर से मुआवजे की मांग की, लेकिन राहत नहीं मिलने पर उपभोक्ता आयोग का रुख किया।

अस्पताल ने कहा- मृतका अस्पताल की मरीज नहीं थी

अस्पताल की ओर से पेश अधिवक्ता ओ. श्रीनिवास ने शिकायत की स्वीकार्यता पर सवाल उठाते हुए कहा कि मृत महिला के परिवार के सदस्य उसके उचित कानूनी वारिस नहीं हैं और इसलिए वे उपभोक्ता शिकायत दाखिल करने के हकदार नहीं हैं।

अस्पताल की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि संबंधित डॉक्टर स्वतंत्र रूप से प्रैक्टिस करने वाली निजी चिकित्सक थीं और आवश्यकता पड़ने पर मरीजों की सर्जरी के लिए अस्पताल की सुविधाओं का उपयोग करती थीं। इसके लिए वह अस्पताल को भुगतान करती थीं।

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अस्पताल ने खुद को एक धर्मार्थ संस्था बताते हुए कहा कि वह गरीब और जरूरतमंद मरीजों को ओपीडी तथा भर्ती उपचार की सुविधाएं उपलब्ध कराता है और मरीजों से केवल संचालन खर्च के अनुरूप शुल्क लिया जाता है।

अस्पताल ने यह भी दावा किया कि मृत महिला उसकी प्रत्यक्ष मरीज नहीं थी।

डॉक्टर ने लापरवाही से किया इनकार

संबंधित डॉक्टर की ओर से अधिवक्ता कंचरला रवि कुमार ने दलील दी कि महिला की उम्र और मोटापे को ध्यान में रखते हुए ट्यूबेक्टॉमी के दौरान आवश्यक सावधानियां बरती गई थीं।

डॉक्टर की ओर से कहा गया कि ऑपरेशन के लगभग 24 घंटे बाद महिला को स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं शुरू हुईं। बचाव पक्ष ने यह तर्क भी दिया कि सामने आए लक्षण किडनी संबंधी बीमारी से जुड़े हो सकते थे।

डॉक्टर की ओर से सरकार द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया। दावा किया गया कि विशेषज्ञ समिति ने डॉक्टर की ओर से चिकित्सा लापरवाही नहीं मानी थी।

बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि बाद के अस्पतालों में इलाज के दौरान हुई किसी कथित लापरवाही के लिए संबंधित डॉक्टर को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

आयोग ने विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को क्यों नहीं माना?

जिला उपभोक्ता आयोग ने विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को निर्णायक नहीं माना। आयोग के अनुसार, समिति डॉक्टर के मौखिक बयान से प्रभावित हुई थी और उसके सामने उपलब्ध रिकॉर्ड से स्थिति का पूरा आकलन नहीं किया गया।

आयोग ने विशेष रूप से कहा कि डॉक्टर ने समिति के समक्ष ऐसा कोई रिकॉर्ड पेश नहीं किया, जिससे यह साबित हो कि महिला की लगभग सात वर्ष पहले गर्भाशय से संबंधित कोई सर्जरी हुई थी।

आयोग के अनुसार, इस तरह की पूर्व सर्जरी होने पर ट्यूबेक्टॉमी के दौरान जटिलताओं का जोखिम बढ़ सकता था और ऑपरेशन के दौरान आंत में चोट लगने की संभावना से संबंधित सावधानी आवश्यक थी।

सरकारी दिशानिर्देशों का पालन नहीं करने का आरोप

आयोग ने पाया कि अस्पताल ने सरकार द्वारा जारी ट्यूबेक्टॉमी संबंधी दिशानिर्देश रिकॉर्ड पर पेश किए थे। इन दिशानिर्देशों में ऑपरेशन के दौरान अपनाई जाने वाली विशेष तकनीकों और सावधानियों का उल्लेख था।

आयोग के अनुसार, उपलब्ध साक्ष्यों से संकेत मिला कि ऑपरेशन के दौरान आवश्यक सावधानियों का पालन नहीं किया गया और महिला की आंत में चोट लग गई।

आयोग ने यह भी माना कि आंत में चोट लगने के बाद डॉक्टर ने निर्धारित प्रक्रिया और दिशानिर्देशों के अनुरूप कार्रवाई नहीं की तथा ऑपरेशन वाली जगह को बंद कर दिया। इसके बाद संक्रमण और अन्य गंभीर जटिलताएं पैदा हुईं, जो अंततः महिला की मृत्यु का कारण बनीं।

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आयोग ने इस स्थिति को सीधी चिकित्सा लापरवाही माना।

अस्पताल की जिम्मेदारी से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल

आयोग ने कहा कि यदि अस्पताल को सरकार द्वारा निर्धारित उपचार संबंधी नियमों और दिशानिर्देशों की जानकारी थी, तो वह डॉक्टरों को उनका पालन किए बिना उपचार करने की अनुमति नहीं दे सकता।

आयोग ने स्पष्ट किया कि अस्पताल और नर्सिंग होम केवल यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते कि उन्होंने डॉक्टर को इलाज के लिए आवश्यक बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई थीं।

इस प्रकार आयोग ने अस्पताल और संबंधित डॉक्टर की जिम्मेदारी को उपलब्ध चिकित्सा रिकॉर्ड, विशेषज्ञ रिपोर्ट और सरकारी दिशानिर्देशों के आधार पर परखा।

परिवार को 37.25 लाख रुपये का मुआवजा

आयोग ने मृत महिला के परिवार की शिकायत को स्वीकार करते हुए अस्पताल और डॉक्टर को कुल 37.25 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया।

आदेश के अनुसार:

  • अस्पताल और डॉक्टर को परिवार को 12 लाख रुपये का मुआवजा देना होगा।
  • डॉक्टर को महिला की मौत से हुए नुकसान के लिए अतिरिक्त 25 लाख रुपये देने होंगे।
  • मुकदमे में हुए खर्च के लिए 25,000 रुपये का भुगतान भी करना होगा।

इस तरह कुल देय राशि 37.25 लाख रुपये निर्धारित की गई है।

कानूनी महत्व

यह मामला चिकित्सा लापरवाही के मामलों में अस्पताल की संस्थागत जिम्मेदारी और डॉक्टर द्वारा निर्धारित चिकित्सा दिशानिर्देशों के पालन के महत्व को रेखांकित करता है।

आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट अपने आप में अंतिम नहीं होती। उपभोक्ता आयोग उपलब्ध मेडिकल रिकॉर्ड, उपचार के क्रम, सरकारी दिशानिर्देशों और अन्य साक्ष्यों का स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन कर सकता है।

फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अस्पताल केवल यह तर्क देकर जिम्मेदारी से अलग नहीं हो सकता कि संबंधित डॉक्टर स्वतंत्र चिकित्सक थीं। जहां अस्पताल की सुविधाओं का उपयोग उपचार और सर्जरी के लिए किया गया हो, वहां उपलब्ध परिस्थितियों और साक्ष्यों के आधार पर संस्थागत जिम्मेदारी का भी परीक्षण किया जा सकता है।

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