कलकत्ता हाईकोर्ट ने रेलवे कर्मचारी के बेटे की 51 साल बाद अनुकंपा नियुक्ति की मांग खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति योजनाएं परिवार को अचानक आर्थिक संकट से उबारने के लिए हैं और 23 साल तक मामले की बहाली नहीं मांगने तथा अत्यधिक देरी के बाद अदालत पहुंचने पर राहत नहीं दी जा सकती।
कलकत्ता हाईकोर्ट ने रेलवे कर्मचारी के बेटे द्वारा अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) की मांग को अत्यधिक विलंब के आधार पर खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति योजनाएं कर्मचारी के परिवार को अचानक उत्पन्न आर्थिक संकट से तत्काल राहत प्रदान करने के लिए बनाई जाती हैं, न कि वर्षों बाद नियुक्ति का दावा करने के लिए।
चीफ जस्टिस रविंद्र घुगे और जस्टिस ओम नारायण राय की पीठ ने 29 सितंबर को पारित आदेश में रेलवे ट्रिब्यूनल के उस निष्कर्ष को बरकरार रखा, जिसमें याचिका को अत्यधिक विलंबित माना गया था।
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अपने मामले को आगे बढ़ाने में अनुचित लापरवाही बरती। उसकी पहली याचिका 1990 में अनुपस्थिति के कारण खारिज हो गई थी, लेकिन उसने 23 साल तक उसे बहाल कराने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। इसके बाद दूसरी याचिका खारिज होने के चार साल बाद वह हाईकोर्ट पहुंचा।
पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत ऐसे व्यक्ति की सहायता के लिए आगे नहीं आ सकती, जिसने अपने अधिकारों के लिए समय पर कदम नहीं उठाए, क्योंकि Delay defeats equity अर्थात विलंब न्यायसंगत राहत के दावे को कमजोर करता है।
1974 की रेलवे हड़ताल के दौरान पिता ने निभाई थी ड्यूटी
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता के पिता की नियुक्ति 19 जुलाई 1944 को पूर्वी रेलवे के हावड़ा मंडल में मंडल रेल प्रबंधक (Divisional Railway Manager) कार्यालय में हुई थी। वह 1 मार्च 1977 को सेवानिवृत्त हुए थे।
याचिकाकर्ता का दावा था कि उसके पिता ने 1974 की अखिल भारतीय रेलवे हड़ताल के दौरान भी अपनी ड्यूटी निभाई थी और उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें अग्रिम वेतन वृद्धि प्रदान की गई थी।
याचिकाकर्ता ने रेलवे अधिकारियों द्वारा जारी एक सर्कुलर का हवाला दिया, जिसके अनुसार अनुकंपा नियुक्ति की सुविधा कक्षा III और कक्षा IV के पदों पर मृतक, स्थायी रूप से दिव्यांग या गंभीर बीमारी से प्रभावित कर्मचारियों के अतिरिक्त वफादार कर्मचारियों (Loyal Staff) के लिए भी विस्तारित की जा सकती थी।
पिता की सेवानिवृत्ति के 9 साल बाद मां ने किया था आवेदन
रिकॉर्ड के अनुसार, याचिकाकर्ता की मां ने 4 अगस्त 1986 को अपने बेटे की अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था। आवेदन में बताया गया था कि उसके पति को खराब स्वास्थ्य के कारण सेवानिवृत्त किया गया था। इसके बाद 13 दिसंबर 1986 को बेटे ने भी इसी संबंध में आवेदन प्रस्तुत किया।
याचिकाकर्ता ने रेलवे ट्रिब्यूनल का रुख कर अनुकंपा नियुक्ति का निर्देश देने की मांग की। हालांकि, 12 जून 1990 को उसकी मूल याचिका अनुपस्थिति के कारण खारिज कर दी गई।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने 2013 में याचिका बहाल करने के लिए आवेदन किया, जिसे 6 मई 2013 को खारिज कर दिया गया। उसने हाईकोर्ट में अपील की, जहां याचिका खारिज करते हुए यह स्वतंत्रता दी गई कि सक्षम अधिकारी उसकी शिकायत पर गुण-दोष के आधार पर सहानुभूतिपूर्वक विचार कर सकते हैं।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने दोबारा रेलवे ट्रिब्यूनल में अनुकंपा नियुक्ति की मांग की, लेकिन 14 अक्टूबर 2015 को उसकी याचिका फिर खारिज कर दी गई। इसके बाद उसने रेलवे अधिकारियों के समक्ष कई अभ्यावेदन दिए और अंततः चार साल बाद हाईकोर्ट का रुख किया।
याचिकाकर्ता की दलील: नियुक्ति का दावा गलत तरीके से खारिज किया गया
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता शिव शंकर बनर्जी और राहुल देव ने दलील दी कि शुरुआत में रेलवे कर्मचारी संघ की राय के आधार पर उसका आवेदन खारिज किया गया था, जबकि बाद में उसका दावा सही पाया गया था।
उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता अपने मामले को लेकर सतर्क रहा था और नियुक्ति का दावा गलत तरीके से खारिज किए जाने के कारण हुई देरी के लिए उसे जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए।
वहीं, रेलवे प्रशासन की ओर से सरकारी अधिवक्ता धीरज कुमार त्रिवेदी और अधिवक्ता अजय गग्गर ने दलील दी कि याचिकाकर्ता के पिता की सेवानिवृत्ति के समय वह नाबालिग था और अनुकंपा नियुक्ति के लिए पहला आवेदन सेवानिवृत्ति के नौ साल बाद, 1986 में किया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता के पिता को उनकी सेवाओं के लिए पहले ही प्रोत्साहन दिया जा चुका था।
23 साल तक याचिका बहाली के लिए कदम नहीं उठाया
हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता की मूल याचिका 1990 में खारिज हुई थी, लेकिन उसने 2013 तक उसे बहाल कराने का प्रयास नहीं किया। अदालत ने इस लंबे अंतराल को मामले में गंभीर देरी और लापरवाही का आधार माना।
पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता के पिता की सेवानिवृत्ति के नौ साल बाद अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया गया था। अदालत के अनुसार, यदि परिवार सेवानिवृत्ति के बाद लगभग नौ वर्षों तक अपना भरण-पोषण करने में सक्षम रहा, तो इससे उचित रूप से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि परिवार तत्काल आर्थिक संकट में नहीं था।
अनुकंपा नियुक्ति तत्काल आर्थिक संकट से राहत के लिए है
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में अनुकंपा नियुक्ति योजनाओं के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा:
“अनुकंपा नियुक्ति की योजनाएं ऐसे कर्मचारी के परिवार की सहायता के लिए बनाई जाती हैं, जो परिवार के एकमात्र कमाने वाले व्यक्ति की सेवाकाल के दौरान मृत्यु, गंभीर बीमारी या योजना में निर्दिष्ट किसी अन्य आकस्मिक परिस्थिति के कारण अचानक गंभीर आर्थिक संकट में आ जाता है।”
अदालत ने आगे कहा कि ऐसी योजनाएं संबंधित कर्मचारी के परिवार को अचानक उत्पन्न निर्धनता से उबारने के लिए तत्काल सहायता प्रदान करने वाली रियायतें हैं।
पीठ ने यह भी ध्यान दिया कि याचिकाकर्ता के पिता 1974 की हड़ताल के दौरान काम करते रहे थे और इसके लिए उन्हें नियमित वेतन वृद्धि के अतिरिक्त एक और वेतन वृद्धि प्रोत्साहन के रूप में दी गई थी। ऐसे में 51 वर्ष बाद उनके बेटे द्वारा अनुकंपा नियुक्ति का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
देरी न्यायसंगत राहत के दावे को कमजोर करती है
हाईकोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य कर्मचारी के परिवार को तत्काल आर्थिक संकट से राहत देना है। याचिकाकर्ता के पिता की सेवानिवृत्ति के नौ साल बाद आवेदन किया जाना, मूल याचिका खारिज होने के बाद 23 साल तक बहाली के लिए कदम न उठाना और बाद की कार्यवाही में भी अत्यधिक देरी करना, राहत देने के विरुद्ध महत्वपूर्ण परिस्थितियां थीं।
अदालत ने रेलवे ट्रिब्यूनल के इस निष्कर्ष से सहमति जताई कि याचिकाकर्ता का मामला अत्यधिक विलंबित था। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति की मांग खारिज कर दी।
फैसले के प्रमुख कानूनी बिंदु
- अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य: परिवार को कर्मचारी की मृत्यु, गंभीर बीमारी या अन्य निर्दिष्ट आकस्मिक परिस्थितियों से उत्पन्न तत्काल आर्थिक संकट में सहायता देना।
- अत्यधिक विलंब: 23 साल तक खारिज याचिका की बहाली नहीं मांगना मामले में महत्वपूर्ण रहा।
- आर्थिक स्थिति: सेवानिवृत्ति के नौ साल बाद आवेदन किए जाने को अदालत ने परिवार के तत्काल निर्धनता में न होने का प्रासंगिक संकेत माना।
- सेवा का प्रोत्साहन: पिता को 1974 की हड़ताल के दौरान ड्यूटी करने के लिए अतिरिक्त वेतन वृद्धि मिली थी।
- न्यायिक सिद्धांत: Delay defeats equity — अत्यधिक विलंब न्यायसंगत राहत प्राप्त करने के दावे को कमजोर करता है।
कलकत्ता हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति कोई सामान्य रोजगार योजना या दीर्घकालिक उत्तराधिकार का अधिकार नहीं है। इसका उद्देश्य अचानक आर्थिक संकट से प्रभावित परिवार को शीघ्र सहायता देना है। अत्यधिक विलंब और मामले को समय पर आगे न बढ़ाने की स्थिति में अदालत अनुकंपा नियुक्ति की मांग पर राहत देने से इनकार कर सकती है।
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