परिवहन विभाग विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकारी कर्मचारियों को पुराने सेवा नियमों के तहत पदोन्नति पाने का कोई निहित अधिकार नहीं है। सरकार भर्ती और प्रमोशन नियम बदल सकती है, बशर्ते फैसला मनमाना न हो।
सरकारी कर्मचारी पुराने नियमों के तहत प्रमोशन नहीं मांग सकते: सुप्रीम कोर्ट
ओडिशा परिवहन विभाग विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
सुप्रीम Court ने सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी सरकारी कर्मचारी को पुराने सेवा नियमों के तहत पदोन्नति पाने का कोई “निहित” या स्वतः लागू होने वाला अधिकार नहीं होता।
न्यायालय ने कहा कि सरकारें समय-समय पर सेवा नियमों, भर्ती प्रक्रिया और पदोन्नति के तरीकों में बदलाव कर सकती हैं, बशर्ते ऐसे बदलाव मनमाने या भेदभावपूर्ण न हों।
यह फैसला जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने ओडिशा सरकार द्वारा दायर अपीलों पर सुनाया।
क्या था पूरा विवाद?
मामला ओडिशा परिवहन विभाग के दो कर्मचारियों से जुड़ा था, जिन्होंने सहायक क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी (ARTO) पद पर पदोन्नति की मांग की थी।
कर्मचारियों का कहना था कि वर्ष 1981 के पुराने कार्यकारी निर्देश लागू रहने के दौरान विभाग में ARTO के कई पद खाली हुए थे। उन निर्देशों के अनुसार वरिष्ठ कर्मचारियों को मेरिट के आधार पर पदोन्नति दी जा सकती थी।
हालांकि, कर्मचारियों की पदोन्नति से पहले ही राज्य सरकार ने वर्ष 2017 में परिवहन कैडर का पुनर्गठन कर दिया। इसके बाद वर्ष 2021 में संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत नए ओडिशा ट्रांसपोर्ट सर्विस नियम लागू किए गए।
नए नियमों के तहत भर्ती और चयन की प्रक्रिया पूरी तरह बदल गई। अब पदोन्नति आधारित चयन के बजाय ओडिशा लोक सेवा आयोग (OPSC) द्वारा आयोजित प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से नियुक्ति का प्रावधान किया गया।
हाई कोर्ट ने दिया था पुराने नियमों के तहत विचार का आदेश
नियम बदलने के बावजूद ओडिशा हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि कर्मचारियों के मामलों पर पुराने 1981 के निर्देशों के तहत विचार किया जाए।
हाई कोर्ट के इसी आदेश को ओडिशा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का फैसला पलटा
सर्वोच्च न्यायालय ने हाई कोर्ट का फैसला रद्द करते हुए कहा कि केवल इस वजह से कि कोई पद पुराने नियमों के दौरान खाली हुआ था, सरकार उस पद को उन्हीं नियमों के तहत भरने के लिए बाध्य नहीं हो जाती।
पीठ ने कहा:
“रिक्तियों को उस समय लागू नियमों के अनुसार भरना अनिवार्य नहीं है, जब वे उत्पन्न हुई थीं।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकारों को भर्ती नीतियों में बदलाव करने, कैडर का पुनर्गठन करने और चयन प्रक्रिया बदलने का पूरा अधिकार है।
सरकारी कर्मचारियों को प्रमोशन का स्वतः अधिकार नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में दोहराया कि सरकारी कर्मचारियों को पदोन्नति का कोई अंतर्निहित या स्वचालित अधिकार प्राप्त नहीं होता।
अदालत ने कहा कि किसी कर्मचारी का अधिकार केवल इतना है कि उसे पदोन्नति के लिए “विचार” किया जाए। इसका अर्थ यह नहीं कि उसे पदोन्नति मिलना ही चाहिए।
पीठ ने कहा कि पुराने कार्यकारी निर्देशों के तहत पात्रता मात्र से किसी कर्मचारी को पदोन्नति का लागू करने योग्य कानूनी दावा प्राप्त नहीं हो जाता।
सरकार नीति बदल सकती है, अदालत हस्तक्षेप नहीं करेगी
अदालत ने माना कि ओडिशा सरकार ने कैडर पुनर्गठन और 2021 के नए नियम लागू होने के बाद ARTO पदों को पुराने तरीके से न भरने का फैसला लिया, जो पूरी तरह वैध था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि सरकार प्रशासनिक या नीतिगत कारणों से पदोन्नति के जरिए रिक्तियां न भरने का निर्णय लेती है, तो अदालतें सरकार को पुराने नियमों के तहत नियुक्तियां करने के लिए बाध्य नहीं कर सकतीं।
पीठ ने कहा कि जब तक नई नीति मनमानी साबित नहीं होती, तब तक कर्मचारी पुराने नियमों के आधार पर पदोन्नति का दावा नहीं कर सकते।
सेवा कानून में फैसले का व्यापक असर
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला सरकारी सेवा कानून और पदोन्नति विवादों में महत्वपूर्ण मिसाल माना जाएगा। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि भर्ती और पदोन्नति नीतियों को बदलने का अधिकार सरकार के पास है और कर्मचारी केवल विचार किए जाने का सीमित अधिकार ही रखते हैं।
यह निर्णय भविष्य में उन मामलों पर भी प्रभाव डाल सकता है, जहां कर्मचारी पुराने नियमों के आधार पर पदोन्नति की मांग करते हैं।
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