इलाहाबाद हाई कोर्ट: इलेक्ट्रो होम्योपैथी प्रमाणपत्र से एलोपैथी की प्रैक्टिस नहीं कर सकते, ‘झोलाछाप’ डॉक्टर पर सख्त टिप्पणी
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इलेक्ट्रो होम्योपैथी प्रमाणपत्र के आधार पर एलोपैथी की प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टर की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि मान्यता प्राप्त योग्यता के बिना आधुनिक चिकित्सा करना कानूनन गलत है और ऐसा व्यक्ति झोलाछाप (Quack) माना जाएगा।
इलाहाबाद हाई कोर्ट: इलेक्ट्रो होम्योपैथी प्रमाणपत्र से एलोपैथी की प्रैक्टिस नहीं कर सकते, बिना योग्यता आधुनिक चिकित्सा करने वाला ‘झोलाछाप’
मामले की पृष्ठभूमि
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इलेक्ट्रो होम्योपैथी (Electro Homeopathy) का प्रमाणपत्र रखने वाले एक चिकित्सक द्वारा अपने क्लीनिक को सील किए जाने के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी।
न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि केवल इलेक्ट्रो होम्योपैथी का प्रमाणपत्र होने से किसी व्यक्ति को आधुनिक चिकित्सा पद्धति (एलोपैथी) का अभ्यास करने का अधिकार नहीं मिल जाता।
अदालत ने यह भी पाया कि संबंधित क्लीनिक विभिन्न सरकारी आदेशों और राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा पद्धति आयोग अधिनियम, 2020 (NCISM Act) के तहत निर्धारित मानकों का भी पालन नहीं कर रहा था।
‘बिना ज्ञान के चिकित्सा करने वाला झोलाछाप’
अदालत ने अपने फैसले में कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा—
“जो व्यक्ति किसी चिकित्सा पद्धति का आवश्यक ज्ञान नहीं रखता, फिर भी उसी पद्धति से इलाज करता है, वह झोलाछाप (Quack) है। उसे चिकित्सा ज्ञान या कौशल का केवल दिखावा करने वाला व्यक्ति अथवा अधिक से अधिक एक ढोंगी (Charlatan) कहा जा सकता है।”
क्या था मामला?
याचिकाकर्ता ने बताया कि उसने वर्ष 2005 में कम्युनिटी हेल्थ का व्यावसायिक (Vocational) प्रमाणपत्र प्राप्त किया था।
वर्ष 2019 में मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) ने उससे चिकित्सा अभ्यास के लिए आवश्यक डिग्री एवं शैक्षणिक प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने को कहा।
याचिकाकर्ता ने नोटिस का उत्तर दिया और 2024 में विस्तृत स्पष्टीकरण के साथ अपने सभी शैक्षणिक दस्तावेज प्रस्तुत किए तथा नोटिस वापस लेने का अनुरोध किया।
इसके बावजूद 2025 में उसे क्लीनिक बंद करने के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया गया।
पहली याचिका और CMO का फैसला
पहले दौर में हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता को CMO के समक्ष विस्तृत आपत्ति दाखिल करने की अनुमति दी थी।
CMO ने सुनवाई के बाद पाया कि डॉक्टर एलोपैथिक दवाओं से मरीजों का उपचार कर रहा था, जबकि उसके पास न तो एलोपैथी की मान्यता प्राप्त योग्यता थी और न ही आवश्यक पंजीकरण।
CMO ने यह भी स्पष्ट किया कि इलेक्ट्रो होम्योपैथी की डिग्री या डिप्लोमा रखने वाले व्यक्ति को एलोपैथी का अभ्यास करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि यह सरकारी आदेशों के विरुद्ध है।
क्लीनिक में कई गंभीर कमियां मिलीं
जांच में यह भी पाया गया कि संबंधित क्लीनिक निर्धारित सरकारी मानकों का पालन नहीं कर रहा था।
अदालत के अनुसार क्लीनिक में—
- CMO कार्यालय में आवश्यक पंजीकरण नहीं था।
- बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट की व्यवस्था नहीं थी।
- फायर एनओसी (Fire NOC) उपलब्ध नहीं थी।
- संक्रमण नियंत्रण (Infection Prevention and Control) की अनिवार्य व्यवस्था नहीं थी।
- परिसर में ऐसे लोग भी आधुनिक चिकित्सा कर रहे थे जो आवश्यक योग्यता नहीं रखते थे।
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य सरकार ने अदालत में कहा कि कोई भी चिकित्सक जिस चिकित्सा पद्धति में पंजीकृत है, वह दूसरी चिकित्सा पद्धति का अभ्यास नहीं कर सकता।
विशेष रूप से एलोपैथी का अभ्यास बिना आवश्यक योग्यता और पंजीकरण के करना न केवल कानून का उल्लंघन है बल्कि इससे मरीजों का जीवन भी खतरे में पड़ सकता है।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
अदालत ने कहा कि आधुनिक चिकित्सा (एलोपैथी) का अभ्यास केवल वही व्यक्ति कर सकता है जिसके पास कानून द्वारा मान्यता प्राप्त मेडिकल योग्यता और वैध पंजीकरण हो।
ऐसे व्यक्ति को एलोपैथी की अनुमति देना जिसके पास मान्यता प्राप्त योग्यता नहीं है, संबंधित कानूनों का सीधा उल्लंघन होगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
हाई कोर्ट ने Mukhtiar Chand v. State of Punjab (1998) के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय चिकित्सा पद्धति (AYUSH) में पंजीकृत व्यक्ति आधुनिक वैज्ञानिक चिकित्सा (एलोपैथी) का अभ्यास तब तक नहीं कर सकता, जब तक वह संबंधित मेडिकल रजिस्टर में विधिवत पंजीकृत न हो।
अदालत ने Chintamanrao v. State of M.P. तथा State of Gujarat v. Mirzapur Moti Kureshi Kassab Jamat के फैसलों का भी हवाला देते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत व्यवसाय करने का अधिकार पूर्ण (Absolute) नहीं है और सार्वजनिक स्वास्थ्य के हित में उस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
Article 226 के तहत हस्तक्षेप से इनकार
अदालत ने कहा कि विशेषज्ञ प्राधिकारियों द्वारा तथ्यात्मक जांच के बाद पारित आदेशों में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट अपना दृष्टिकोण नहीं थोप सकता।
चूंकि याचिकाकर्ता के पास एलोपैथी का वैध अधिकार नहीं था और उसका क्लीनिक भी कानूनी मानकों का पालन नहीं कर रहा था, इसलिए CMO द्वारा क्लीनिक सील करने का आदेश पूरी तरह उचित था।
हाई कोर्ट का फैसला
हाई कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि—
- इलेक्ट्रो होम्योपैथी प्रमाणपत्र के आधार पर एलोपैथी की प्रैक्टिस नहीं की जा सकती।
- बिना मान्यता प्राप्त योग्यता के आधुनिक चिकित्सा करने वाला व्यक्ति ‘झोलाछाप (Quack)’ माना जाएगा।
- क्लीनिक सरकारी मानकों और NCISM Act, 2020 के अनुरूप भी नहीं था।
- इसलिए क्लीनिक सील करने के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है।
मामला
Santosh Kumar Sharma v. State of Uttar Pradesh
Writ-C No. 21019 of 2026
निर्णय दिनांक: 10 जुलाई 2026
Tags
#AllahabadHighCourt #Allopathy #ElectroHomeopathy #QuackDoctor #MedicalLaw #NCISM #Healthcare #LegalNews #CourtJudgment #इलाहाबादहाईकोर्ट #एलोपैथी #होम्योपैथी #झोलाछाप #चिकित्साकानून #NCISMAct #कानूनीसमाचार #स्वास्थ्यकानून
