ट्रंप प्रशासन ने ट्रांसजेंडर सैनिकों को सेवा से हटाने के लिए US सुप्रीम कोर्ट का रुख किया

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28 ट्रांसजेंडर सैन्यकर्मियों ने दी चुनौती

ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट से निचली अदालतों के उस आदेश को हटाने की मांग की है, जिसने 28 ट्रांसजेंडर सैन्यकर्मियों को फिलहाल सेवा से हटाए जाने से सुरक्षा दी है। मामला ट्रंप की ट्रांसजेंडर मिलिट्री बैन नीति की संवैधानिकता से जुड़ा है।

ट्रंप प्रशासन ने करीब दो दर्जन ट्रांसजेंडर सैन्यकर्मियों को सेवा से हटाने की अनुमति पाने के लिए अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में आपात याचिका दायर की है। प्रशासन ने निचली अदालतों के उन आदेशों को हटाने की मांग की है, जिनके कारण मुकदमे के लंबित रहने तक संबंधित सैन्यकर्मियों को सेवा से डिस्चार्ज नहीं किया जा सका।

मामला राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस नीति से जुड़ा है, जिसके तहत ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की अमेरिकी सशस्त्र बलों में सेवा पर प्रतिबंध लगाया गया था। यह विवाद अब कार्यपालिका की सैन्य मामलों में शक्तियों और संवैधानिक समानता के सिद्धांतों के बीच एक महत्वपूर्ण कानूनी संघर्ष का रूप ले चुका है।

28 ट्रांसजेंडर सैन्यकर्मियों ने दी चुनौती

इस नीति को चुनौती देने वाले 28 ट्रांसजेंडर सैन्यकर्मियों के समूह का नेतृत्व आर्मी रिजर्व के सेकंड लेफ्टिनेंट निकोलस टैलबॉट कर रहे हैं। इन सैन्यकर्मियों ने संघीय अदालत में ट्रंप प्रशासन की नीति को चुनौती देते हुए कहा कि उन्हें सेवा से हटाया जाना अपूरणीय क्षति पहुंचाएगा।

उनकी ओर से यह भी तर्क दिया गया कि कई याचिकाकर्ता अनुभवी और सम्मानित सैन्यकर्मी हैं और मुकदमे का अंतिम फैसला आने से पहले उन्हें जबरन सेवा से हटाना न केवल उनके करियर को नुकसान पहुंचाएगा, बल्कि सैन्य तैयारी पर भी असर डाल सकता है।

जून में अपील अदालत ने सैनिकों के पक्ष में फैसला दिया

जून में यूएस कोर्ट ऑफ अपील्स फॉर द डिस्ट्रिक्ट ऑफ कोलंबिया सर्किट ने 2-1 के बहुमत से ट्रांसजेंडर सैन्यकर्मियों को राहत दी थी। बहुमत के अनुसार, प्रारंभिक स्तर पर यह आशंका दिखाई देती है कि नीति के पीछे किसी अलोकप्रिय समूह के प्रति पूर्वाग्रह की भूमिका हो सकती है।

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निचली अदालतों ने भी व्यापक रूप से प्रशासन की डिस्चार्ज नीति पर रोक लगाई थी। अदालतों के समक्ष यह सवाल महत्वपूर्ण रहा कि क्या ट्रांसजेंडर सैन्यकर्मियों को सेवा से बाहर करने की नीति वास्तविक सैन्य आवश्यकता पर आधारित है या यह संवैधानिक समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन करती है।

ट्रंप प्रशासन का तर्क: सैन्य मानकों में कार्यपालिका को व्यापक अधिकार

अमेरिकी न्याय विभाग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि सेना में सेवा के लिए योग्यता और मानक तय करना मुख्य रूप से कार्यपालिका और रक्षा विभाग के अधिकार क्षेत्र का विषय है।

सॉलिसिटर जनरल डी. जॉन सॉयर की ओर से दायर दस्तावेज में कहा गया कि अदालतों को सैन्य क्षमता, युद्धक प्रभावशीलता और सैन्य तैयारी जैसे विषयों पर रक्षा विभाग के पेशेवर आकलन को पर्याप्त सम्मान देना चाहिए।

प्रशासन चाहता है कि जनवरी में प्रस्तावित पूर्ण ट्रायल से पहले ही सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप करे और निचली अदालतों द्वारा दी गई सुरक्षा को हटाने की अनुमति दे।

फरवरी 2025 में लागू हुई थी रक्षा विभाग की नीति

ट्रंप के कार्यभार संभालने के बाद जारी कार्यकारी आदेश के आधार पर रक्षा विभाग ने फरवरी 2025 में ट्रांसजेंडर सैन्यकर्मियों से संबंधित नई नीति लागू की थी। उस समय अनुमान के अनुसार करीब 4,200 खुले तौर पर ट्रांसजेंडर सैन्यकर्मी अमेरिकी सेना में सेवा कर रहे थे।

इसके बाद कुछ सैन्यकर्मियों ने स्वेच्छा से सेवा छोड़ दी, जबकि अन्य को अनिवार्य डिस्चार्ज की प्रक्रिया का सामना करना पड़ा।

पहले भी सुप्रीम कोर्ट दे चुका है अंतरिम राहत

रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट की रूढ़िवादी बहुमत वाली पीठ पहले मई में एक अलग मामले में ट्रंप प्रशासन को अस्थायी रूप से डिस्चार्ज नीति लागू करने की अनुमति दे चुकी है। हालांकि मौजूदा विवाद अलग समूह के सैन्यकर्मियों और उनके खिलाफ लंबित कार्यवाही से संबंधित है।

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ट्रांसजेंडर सैन्यकर्मियों के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट से प्रशासन की आपात याचिका खारिज करने की मांग की है। उनका कहना है कि मामले को जनवरी में निर्धारित पूर्ण ट्रायल तक आगे बढ़ने दिया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला तय कर सकता है नीति का भविष्य

सुप्रीम कोर्ट के सामने अब दो महत्वपूर्ण प्रश्न हैं—क्या प्रशासन को अंतिम ट्रायल से पहले ही संबंधित सैन्यकर्मियों को डिस्चार्ज करने की अनुमति दी जाए और क्या अदालत इस मामले को आगामी कार्यकाल में पूर्ण सुनवाई के लिए स्वीकार करेगी।

यदि सुप्रीम कोर्ट मामले की विस्तृत सुनवाई करता है, तो उसका फैसला ट्रंप प्रशासन की ट्रांसजेंडर मिलिट्री बैन नीति की संवैधानिक वैधता पर निर्णायक प्रभाव डाल सकता है। यह मामला सैन्य मामलों में राष्ट्रपति और रक्षा विभाग की शक्तियों, न्यायिक समीक्षा की सीमा तथा ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के समानता और सेवा संबंधी अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्नों को केंद्र में ला सकता है।

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