50 हजार का कर्ज बना ₹3.5 लाख, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सहकारी बैंकों की वसूली पर लगाई रोक

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हाईकोर्ट – छोटा कृषि ऋण कई गुना बढ़ना चिंता का विषय

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सहकारी बैंकों द्वारा किसानों से अत्यधिक ब्याज वसूली पर गंभीर चिंता जताते हुए अंतरिम आदेश दिया है कि अगली रिपोर्ट तक मूलधन की दोगुनी राशि से अधिक वसूली न की जाए। साथ ही सहकारी बैंकिंग व्यवस्था में सुधार के लिए विशेष समिति गठित करने का निर्देश दिया।


50 हजार का कर्ज बढ़कर ₹3.5 लाख पहुंचा, हाईकोर्ट ने जताई चिंता

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सहकारी ग्राम विकास बैंक द्वारा एक किसान से लिए गए ₹50,000 के ऋण के बढ़कर लगभग ₹3.5 लाख हो जाने पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। अदालत ने कहा कि सहकारी बैंक किसानों को साहूकारों के शोषण से बचाने के उद्देश्य से बनाए गए थे, लेकिन यदि वही बैंक किसानों पर असहनीय आर्थिक बोझ डालने लगें तो यह अत्यंत चिंताजनक स्थिति है।


मूलधन की दोगुनी राशि से अधिक वसूली पर अंतरिम रोक

न्यायालय ने अंतरिम आदेश देते हुए कहा कि विशेष समिति की रिपोर्ट आने तक संबंधित बैंक किसी भी ऋणी से मूलधन की दोगुनी राशि से अधिक की वसूली नहीं करेगा।

यह आदेश न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने किसान बैजनाथ तथा अन्य याचिकाकर्ताओं की याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया।


सहकारी बैंकिंग व्यवस्था की समीक्षा के लिए बनेगी विशेष समिति

हाईकोर्ट ने सहकारी बैंकिंग प्रणाली में सुधार के उद्देश्य से एक विशेष समिति गठित करने का निर्देश दिया है।

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समिति निम्नलिखित विषयों की समीक्षा करेगी—

  • सहकारी बैंकों की ब्याज दरें।
  • ऋण वसूली की प्रक्रिया।
  • किसानों की ऋण चुकाने की क्षमता।
  • भूमि अभिलेखों की स्थिति।
  • सहकारी बैंकिंग व्यवस्था की व्यावहारिक कमियां और सुधार के उपाय।

क्या है पूरा मामला?

महोबा जिले के निवासी किसान बैजनाथ ने वर्ष 2009 में दो भैंस खरीदने के लिए उत्तर प्रदेश सहकारी ग्राम विकास बैंक से 13 प्रतिशत वार्षिक ब्याज पर ₹50,000 का ऋण लिया था।

ऋण के लिए उन्होंने अपनी जमीन बैंक के पास गिरवी रखी थी। कुछ किश्तें जमा करने के बाद आर्थिक कारणों से वह शेष ऋण समय पर नहीं चुका सके।

इसके बाद ब्याज और अन्य देयों के कारण बकाया राशि बढ़कर ₹3,49,862 हो गई। बैंक ने वसूली के लिए गिरवी रखी जमीन की नीलामी की प्रक्रिया शुरू कर दी, जिसके खिलाफ किसान ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की।


14 प्रतिशत तक ब्याज वसूली पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि सहकारी बैंक किसानों से लगभग 14 प्रतिशत वार्षिक ब्याज तक वसूल रहे हैं।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि राष्ट्रीयकृत बैंकों में किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) और कृषि ऋण पर सामान्यतः करीब 7 प्रतिशत ब्याज लिया जाता है तथा समय पर ऋण चुकाने वाले किसानों को ब्याज में अतिरिक्त राहत भी मिलती है।

ऐसे में सहकारी बैंकों द्वारा अत्यधिक ब्याज वसूली न्यायसंगत प्रतीत नहीं होती।


छोटा कृषि ऋण कई गुना बढ़ना चिंता का विषय

अदालत ने कहा कि यदि एक छोटा कृषि ऋण ब्याज और अन्य देयों के कारण कई गुना बढ़ जाए और परिणामस्वरूप किसानों की जमीन नीलाम होने की स्थिति पैदा हो जाए, तो यह अत्यंत गंभीर चिंता का विषय है।

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कोर्ट ने यह भी कहा कि ऋण की किस्तों के भुगतान के लिए किसानों के अनुरोधों पर बैंक को संवेदनशील और सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।


फैसले का महत्व

यह आदेश स्पष्ट संकेत देता है कि न्यायपालिका सहकारी बैंकों द्वारा किसानों से अत्यधिक ब्याज वसूली और कठोर ऋण वसूली प्रक्रिया पर गंभीर नजर रख रही है।

साथ ही, सहकारी बैंकिंग व्यवस्था में पारदर्शिता, न्यायसंगत ब्याज दरें और किसान हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए संस्थागत सुधार की आवश्यकता पर भी हाईकोर्ट ने जोर दिया।


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