लिव-इन रिलेशनशिप में लंबे समय तक बने शारीरिक संबंध को माना जाएगा सहमति से बना संबंध, बाद में शादी से इनकार करना अपने आप में बलात्कार नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा है कि लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले वयस्कों के बीच बने शारीरिक संबंध सामान्यतः सहमति से माने जाएंगे। केवल बाद में शादी से इनकार करने मात्र से बलात्कार का अपराध सिद्ध नहीं होता। अदालत ने आरोपी की बरी होने के फैसले को बरकरार रखा।


छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि यदि दो वयस्क लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहते हैं, तो उनके बीच स्थापित शारीरिक संबंध सामान्यतः सहमति से बने संबंध माने जाएंगे। ऐसी स्थिति में यदि पुरुष बाद में विवाह करने से इनकार कर देता है, तो केवल इसी आधार पर उसके विरुद्ध बलात्कार का अपराध नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति संजय एस. अग्रवाल और न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की खंडपीठ ने यह फैसला एक महिला द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए सुनाया।


अदालत ने सहमति के सिद्धांत को स्पष्ट किया

हाईकोर्ट ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़े विवाह की इच्छा व्यक्त कर सकते हैं, लेकिन केवल यह तथ्य कि भविष्य में शादी की बात हुई थी, यह साबित नहीं करता कि शारीरिक संबंध केवल विवाह के वादे के आधार पर बनाए गए थे।

पीठ ने कहा कि यदि संबंध लंबे समय तक चला है, तो यह अनुमान लगाया जाएगा कि दोनों पक्षों ने अपनी स्वतंत्र इच्छा से संबंध स्वीकार किया था और उसके संभावित परिणामों से भी वे पूरी तरह परिचित थे।


बदलते सामाजिक परिवेश पर हाईकोर्ट की टिप्पणी

अदालत ने कहा कि वर्तमान समय में महिलाएं आर्थिक और सामाजिक रूप से अधिक स्वतंत्र हो रही हैं। ऐसे में अदालतों को इस प्रकार के मामलों का मूल्यांकन संकीर्ण दृष्टिकोण से नहीं करना चाहिए।

पीठ ने कहा कि यह देखना आवश्यक है कि संबंध कितने समय तक चला, दोनों पक्षों का आचरण कैसा रहा तथा परिस्थितियां क्या थीं। इन्हीं तथ्यों के आधार पर यह निर्धारित किया जाना चाहिए कि शारीरिक संबंध सहमति से थे या नहीं।

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क्या था पूरा मामला?

40 वर्षीय महिला भिलाई नगर निगम में परियोजना प्रबंधक के पद पर कार्यरत है। महिला ने आरोप लगाया कि वर्ष 2019 में आईआईएम रायपुर में एमबीए की पढ़ाई के दौरान उसकी मुलाकात आरोपी से हुई थी।

उसके अनुसार आरोपी ने विवाह का आश्वासन दिया, जिसके बाद दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने और लगभग दो वर्षों तक वे लिव-इन रिलेशनशिप में साथ रहे।

महिला का आरोप था कि एमबीए पूरा होने के बाद आरोपी विवाह की बात टालने लगा और बाद में यह कहकर मना कर दिया कि उसके माता-पिता महिला के अधिक उम्र की, तलाकशुदा और ईसाई होने के कारण विवाह के लिए तैयार नहीं हैं।

महिला ने यह भी आरोप लगाया कि 28 नवंबर 2021 को आरोपी ने उसकी इच्छा के विरुद्ध अप्राकृतिक यौन संबंध बनाया। इसके बाद दिसंबर 2022 में भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और 377 के तहत एफआईआर दर्ज कराई गई।


निचली अदालत ने क्यों किया था आरोपी को बरी?

ट्रायल कोर्ट ने पाया था कि अभियोजन पक्ष आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में असफल रहा। इसलिए आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।

इसी फैसले को महिला ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।


हाईकोर्ट ने किन साक्ष्यों पर भरोसा किया?

हाईकोर्ट ने पाया कि जिरह के दौरान महिला ने स्वीकार किया था कि वह महिला आयोग के समक्ष 30 लाख रुपये लेकर विवाद समाप्त करने के लिए तैयार थी।

अदालत ने यह भी नोट किया कि आरोपी ने समझौते के तहत 15 लाख रुपये का चेक दिया था, लेकिन समझौता अंतिम रूप नहीं लेने के कारण बाद में उस चेक का भुगतान रोक दिया गया।

पीठ ने महिला के इस बयान को भी महत्वपूर्ण माना कि दोनों परिवारों की सहमति मिलने पर ही विवाह करने पर सहमत हुए थे।

इसके अतिरिक्त महिला के भाई ने भी गवाही दी कि दोनों के बीच प्रेम संबंध था और उसी के कारण शारीरिक संबंध विकसित हुए।

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मेडिकल साक्ष्य ने भी नहीं किया आरोपों का समर्थन

हाईकोर्ट ने महिला की चिकित्सकीय जांच करने वाले डॉक्टर की गवाही पर भी भरोसा किया।

डॉक्टर ने अदालत को बताया कि मेडिकल परीक्षण के दौरान महिला ने न तो जबरन शारीरिक संबंध बनाए जाने की शिकायत की थी और न ही अप्राकृतिक यौन संबंध की पुष्टि करने वाली कोई चोट उसके शरीर पर पाई गई थी।

अदालत ने माना कि चिकित्सा साक्ष्य भी अभियोजन के आरोपों का समर्थन नहीं करते।


हाईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों से स्पष्ट है कि दोनों पक्ष लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहे थे और उनके बीच स्थापित शारीरिक संबंध सहमति से थे।

अदालत ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में केवल इस आधार पर कि बाद में विवाह नहीं हुआ, आरोपी को बलात्कार के अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यह निष्कर्ष सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित विधिक सिद्धांतों के अनुरूप है।

इन्हीं कारणों से हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखते हुए महिला की अपील खारिज कर दी।


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