किरायेदार को राहत तभी, जब दे बकाया और मासिक किराया: Allahabad High Court

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  • कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किराया एक सतत (continuous) दायित्व
  • किरायेदारी विवादों में अदालत संतुलन बनाए रखते हुए मकान मालिक के आर्थिक हितों की भी रक्षा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ किया—किरायेदार को स्थगन आदेश तभी मिलेगा जब वह बकाया और नियमित किराया जमा करे। मकान मालिक के अधिकारों पर जोर।


हाईकोर्ट का स्पष्ट निर्देश

Allahabad High Court ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि किसी भी किरायेदार को अदालत से स्थगन आदेश (stay) तभी मिल सकता है, जब वह बकाया किराया चुकाने के साथ-साथ हर महीने का किराया नियमित रूप से जमा करे।

याचिका खारिज

अदालत ने मकान मालिक के पक्ष में पारित आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया और स्पष्ट किया कि किरायेदार बिना भुगतान के कब्जा बनाए नहीं रख सकता।

क्या था मामला

मामला उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021 के तहत किराया निर्धारण और वृद्धि से जुड़ा था।

याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसने किराए पर लिया गया परिसर बाद में खरीद लिया है, जबकि वह पहले किरायेदार के रूप में रह रहा था।

कोर्ट की कानूनी व्याख्या

अदालत ने Uttar Pradesh Urban Premises Tenancy Regulation Act, 2021 की धारा 35(1) का हवाला देते हुए कहा कि इस प्रावधान का उद्देश्य मकान मालिक को किराए से वंचित होने से बचाना है।

‘भुगतान के बिना कब्जा नहीं’

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किराया एक सतत (continuous) दायित्व है और इसे चुकाए बिना किरायेदार संपत्ति पर कब्जा बनाए नहीं रख सकता।

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अंतरिम राहत की शर्तें

न्यायालय ने कहा कि यदि कोई किरायेदार अदालत से राहत चाहता है, तो उसे पहले बकाया राशि जमा करनी होगी और आगे भी हर महीने किराया जमा करना होगा।

अपील में भी यही शर्त

मामले में अपीलीय प्राधिकरण ने भी किरायेदार को निर्देश दिया था कि वह संशोधित किराए का 50 प्रतिशत (₹22,500 प्रति माह) नियमित रूप से जमा करे।

फैसले का महत्व

यह निर्णय स्पष्ट करता है कि किरायेदारी विवादों में अदालत संतुलन बनाए रखते हुए मकान मालिक के आर्थिक हितों की भी रक्षा करेगी।

निष्कर्ष

हाईकोर्ट का यह फैसला किरायेदारों को यह स्पष्ट संदेश देता है कि कानूनी राहत पाने के लिए वित्तीय दायित्वों का पालन अनिवार्य है।


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