Reserved Judgments में देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, हाई कोर्टों के लिए 3 महीने की समयसीमा तय
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्टों में आरक्षित फैसलों Reserved Judgments के लंबित रहने पर चिंता जताते हुए फैसला सुनाने के लिए अधिकतम 3 महीने की समयसीमा तय की। अदालत ने पारदर्शिता, जवाबदेही और न्यायिक दक्षता सुनिश्चित करने के लिए व्यापक दिशानिर्देश जारी किए।
देशभर के उच्च न्यायालयों में आरक्षित फैसलों के अनिश्चितकाल तक लंबित रहने की समस्या पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए व्यापक दिशानिर्देश जारी किए हैं। मुख्य न्यायाधीश Surya Kant और न्यायमूर्ति Joymalya Bagchi की पीठ ने कहा कि न्याय केवल सुनवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि समयबद्ध निर्णय भी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हिस्सा है।
अदालत ने निर्देश दिया कि जहां किसी मामले में फैसला सुरक्षित (Reserved) रखा जाता है, वहां उच्च न्यायालयों को यथासंभव तीन महीने के भीतर कारणयुक्त (Reasoned) निर्णय सुनाना होगा।
झारखंड के चार दोषियों की याचिकाओं से शुरू हुआ मामला
मामले की शुरुआत झारखंड के चार दोषियों की याचिकाओं से हुई। इनमें से तीन को हत्या के मामलों में और एक को बलात्कार एवं अपहरण के मामले में दोषी ठहराया गया था। उनकी अपीलों पर झारखंड हाई कोर्ट ने 2022 में सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया था, लेकिन वर्षों तक निर्णय नहीं सुनाया गया।
लंबी प्रतीक्षा से परेशान याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने मामले के दायरे का विस्तार करते हुए सभी हाई कोर्टों से ऐसे मामलों की जानकारी मांगी, जिनमें 31 जनवरी 2025 तक फैसले सुरक्षित रखे गए थे लेकिन सुनाए नहीं गए थे।
“हर लंबित फैसला एक अनिश्चित भविष्य का प्रतीक”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरक्षित फैसलों में देरी केवल प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि मानवीय और संवैधानिक चिंता का विषय है।
पीठ ने कहा:
“प्रत्येक लंबित फैसला उस व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है जिसकी सुनवाई पूरी हो चुकी है, लेकिन जिसका भविष्य अब भी अनिश्चितता में लटका हुआ है।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार केवल त्वरित सुनवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि समय पर निर्णय सुनाए जाने का अधिकार भी इसका अभिन्न हिस्सा है।
फैसले में देरी से न्याय की गुणवत्ता भी प्रभावित
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सुनवाई और निर्णय के बीच अत्यधिक अंतराल न्यायिक गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है। निर्णय उन दलीलों की छाप लिए होता है जो अदालत के समक्ष प्रस्तुत की गई थीं और वह तभी सबसे प्रभावी ढंग से परिलक्षित होता है जब फैसला शीघ्र सुनाया जाए।
पीठ ने कहा कि अदालतें विश्वास की संस्थाएं हैं और आरक्षित फैसलों को समय पर सुनाना जनता के विश्वास को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
तीन महीने की समयसीमा तय
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि:
- आरक्षित फैसले अधिकतम तीन महीने के भीतर सुनाए जाएं।
- जमानत, अग्रिम जमानत, हिरासत में बंद दोषियों की आपराधिक अपीलों और मृत्यु दंड संदर्भों जैसे मामलों में विशेष प्राथमिकता दी जाए।
- जमानत याचिका पर सुनवाई पूरी होने के बाद आदेश उसी दिन या अगले दिन सुनाया जाए।
- जमानत, सजा निलंबन या दोषमुक्ति के आदेश तुरंत जेल प्रशासन और ट्रायल कोर्ट को भेजे जाएं।
जेल से रिहाई में देरी पर भी चिंता
अदालत ने निर्देश दिया कि यदि किसी बंदी को जमानत या राहत मिलती है तो उसे उसी दिन या अधिकतम अगले दिन रिहा किया जाए, बशर्ते किसी अन्य मामले में उसकी हिरासत आवश्यक न हो।
ट्रायल कोर्ट को ऐसे आदेशों के अनुपालन की रिपोर्ट संबंधित हाई कोर्ट पीठ को भेजनी होगी।
जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए नई व्यवस्था
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्टों के मुख्य न्यायाधीशों को निर्देश दिया कि वेबसाइटों पर ऐसी व्यवस्था विकसित की जाए जिससे हर महीने आरक्षित फैसलों की सूची स्वतः तैयार होकर मुख्य न्यायाधीश और संबंधित पीठ को भेजी जा सके।
यदि कोई फैसला दो महीने से अधिक लंबित रहता है तो उसकी जानकारी गोपनीय रूप से सभी न्यायाधीशों के बीच साझा की जा सकती है।
यदि तीन महीने के भीतर फैसला नहीं सुनाया जाता है, तो रजिस्ट्रार जनरल मामले को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखेंगे, जो संबंधित पीठ को दो सप्ताह के भीतर निर्णय सुनाने का निर्देश देंगे।
दूसरी पीठ को सौंपा जा सकेगा मामला
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था करते हुए कहा कि यदि अतिरिक्त दो सप्ताह के बाद भी फैसला नहीं सुनाया जाता, तो मुख्य न्यायाधीश मामला दूसरी पीठ को सौंप सकते हैं।
नई पीठ मामले की पुनः सुनवाई करेगी और शीघ्र निर्णय सुनाएगी।
पक्षकारों को भी दिया गया अधिकार
अदालत ने कहा कि यदि फैसला सुरक्षित रखने के तीन महीने बाद भी निर्णय नहीं आता, तो कोई भी पक्षकार शीघ्र निर्णय के लिए आवेदन दायर कर सकता है।
यदि साढ़े तीन महीने बाद भी फैसला लंबित रहता है, तो पक्षकार मुख्य न्यायाधीश से मामले को दूसरी पीठ को हस्तांतरित करने की मांग कर सकता है।
वेबसाइट पर बढ़ेगी पारदर्शिता
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि:
- प्रत्येक फैसले में निर्णय सुरक्षित रखने, निर्णय सुनाने और वेबसाइट पर अपलोड करने की तारीख दर्ज हो।
- वेबसाइट पर यह जानकारी उपलब्ध रहे कि फैसला कब सुरक्षित रखा गया।
- निर्णय अपलोड होने पर पक्षकारों के वकीलों को ईमेल या एसएमएस के माध्यम से स्वतः सूचना भेजी जाए।
न्यायपालिका में भरोसा मजबूत करने की पहल
फैसले के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाई कोर्टों पर मामलों का अत्यधिक बोझ है, लेकिन समयबद्ध निर्णय न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए अनिवार्य है।
अदालत ने विश्वास जताया कि सभी उच्च न्यायालय इन दिशानिर्देशों का पूरी निष्ठा से पालन करेंगे और न्याय वितरण प्रणाली को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और प्रभावी बनाने में योगदान देंगे।
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