रेल दुर्घटना मुआवजा, टिकट नहीं मिला तब भी रोका नहीं जा सकता – सुप्रीम कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट ने विधवा को दिलाए ₹8 लाख

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रेल दुर्घटना में मृत यात्री के पास से टिकट न मिलने मात्र से उसे ‘बोना फाइड यात्री’ मानने से इनकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश रद्द कर विधवा को ₹8 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया।

सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि रेल दुर्घटना में मृत यात्री के शव से ट्रेन का टिकट बरामद न होने मात्र के आधार पर उसके परिजनों को मुआवजा देने से इनकार नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल (RCT) और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के आदेशों को रद्द करते हुए मृतक की पत्नी को ₹8 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया।


क्या था मामला?

मामला चंद्रकांत ठक्कर की मृत्यु से जुड़ा है, जिनकी नवंबर 2015 में रायपुर से अहमदाबाद की यात्रा के दौरान अहमदाबाद-हावड़ा मेल से गिरने के कारण मौत हो गई थी।

दुर्घटना के बाद उनका यात्रा बैग, जिसमें कथित रूप से ट्रेन का टिकट रखा था, नहीं मिला।

मृतक की पत्नी ने रेलवे दुर्घटना एवं अप्रिय घटनाएं (मुआवजा) नियमों के तहत मुआवजे का दावा किया था, लेकिन रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल और बाद में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि टिकट बरामद नहीं होने से यह साबित नहीं हुआ कि मृतक वास्तविक (बोना फाइड) यात्री था।


‘रेलवे अधिनियम एक कल्याणकारी कानून है’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रेलवे अधिनियम एक कल्याणकारी (Beneficial Welfare) कानून है, इसलिए इसकी व्याख्या संकीर्ण नहीं बल्कि उदार और उद्देश्यपूर्ण (Liberal and Purposive) तरीके से की जानी चाहिए।

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पीठ ने कहा कि ऐसे कानूनों की व्याख्या इस प्रकार होनी चाहिए जिससे विधायिका की मंशा और कानून का उद्देश्य पूरा हो सके, न कि तकनीकी आधारों पर पीड़ितों को राहत से वंचित किया जाए।


तकनीकी आधार पर नहीं छीनी जा सकती राहत

अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर कि दुर्घटना के बाद टिकट बरामद नहीं हुआ, मृतक को बोना फाइड यात्री मानने से इनकार नहीं किया जा सकता।

पीठ ने कहा कि तकनीकी कमियों या प्रक्रियागत त्रुटियों के कारण कल्याणकारी कानून के उद्देश्य को विफल नहीं किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि राज्य के एक अंग के रूप में रेलवे से इस प्रकार का संकीर्ण दृष्टिकोण अपेक्षित नहीं है।


‘नो-फॉल्ट लाइबिलिटी’ के सिद्धांत पर आधारित है मुआवजा

अदालत ने स्पष्ट किया कि रेलवे अधिनियम की धारा 124A के तहत रेल दुर्घटना मुआवजा ‘नो-फॉल्ट लाइबिलिटी’ (No-Fault Liability) के सिद्धांत पर आधारित है।

इसका उद्देश्य दुर्घटना के शिकार यात्रियों या उनके आश्रितों को बिना रेलवे की लापरवाही साबित किए शीघ्र मुआवजा उपलब्ध कराना है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए दोहराया कि टिकट न मिलने मात्र से मुआवजे का दावा अस्वीकार नहीं किया जा सकता।


रेलवे की जिम्मेदारी पर भी की अहम टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह विचार करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि यात्रियों की सुरक्षा के प्रति रेलवे की क्या जिम्मेदारी है।

अदालत ने कहा कि किसी भी कारण से चलती ट्रेन से गिरकर यात्री का घायल होना या उसकी मृत्यु होना कोई असामान्य घटना नहीं है। ऐसे मामलों में रेलवे को अपने दायित्वों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

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चार सप्ताह में मुआवजा देने का आदेश

मृतक की विधवा द्वारा अधिवक्ता श्वेता प्रियदर्शिनी के माध्यम से दायर अपील स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को चार सप्ताह के भीतर ₹8 लाख का मुआवजा देने का निर्देश दिया।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं किया गया तो दावा याचिका दायर किए जाने की तारीख से 8 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।


फैसले का महत्व

यह फैसला स्पष्ट करता है कि रेल दुर्घटना मुआवजा मामलों में केवल टिकट का न मिलना राहत से इनकार करने का आधार नहीं हो सकता। यदि उपलब्ध परिस्थितिजन्य साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि मृतक यात्रा कर रहा था, तो अदालतें कल्याणकारी कानून की भावना के अनुरूप उदार दृष्टिकोण अपनाएंगी।

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