22 साल जेल में रहने के बाद सुप्रीम कोर्ट से राहत, कहा- केवल अपराध की गंभीरता से नहीं रोकी जा सकती रिहाई

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सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि remission यानी दंड में राहत सुधारात्मक न्याय (Reformative Justice) का हिस्सा है।

सुप्रीम कोर्ट ने 22 साल से जेल में बंद दोषी की समयपूर्व रिहाई से इनकार करने वाले गृह मंत्रालय के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि remission सुधारात्मक प्रक्रिया है और केवल अपराध की गंभीरता के आधार पर रिहाई नहीं रोकी जा सकती।


सुप्रीम कोर्ट ने MHA का आदेश रद्द किया, कहा- ‘बिना कारण’ रिहाई ठुकराना मनमाना

गृह मंत्रालय के आदेश को बताया ‘Non-Speaking Order’

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा एक उम्रकैद कैदी की समयपूर्व रिहाई (Premature Release) की मांग ठुकराने वाले आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि यह आदेश “non-speaking” और “cryptic” था, जिसमें किसी भी प्रकार का कारण या न्यायिक विचार दिखाई नहीं देता।

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की खंडपीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाला हर प्रशासनिक निर्णय कारणों सहित होना चाहिए।

पीठ ने टिप्पणी की:

“कारण दर्ज करना मनमानी के खिलाफ सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा है और यह पारदर्शिता, निष्पक्षता तथा जवाबदेही सुनिश्चित करता है।”


22 वर्षों से जेल में बंद था दोषी

मामला रोहित चतुर्वेदी से जुड़ा था, जो वर्ष 2003 के एक हत्या मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद लगभग 22 वर्षों से जेल में बंद था।

यह मामला लखनऊ के महानगर थाने में दर्ज FIR से शुरू हुआ था। बाद में जांच CBCID और फिर CBI को सौंप दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मुकदमे का ट्रायल उत्तराखंड के देहरादून स्थानांतरित किया गया, जहां विशेष अदालत ने 2007 में आरोपी को IPC की धारा 302 और 120-B के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।


उत्तराखंड सरकार ने रिहाई की सिफारिश की थी

कैदी ने 2022 में समयपूर्व रिहाई की मांग की थी। लंबे समय तक निर्णय न होने पर मामला उत्तराखंड हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

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बाद में उत्तराखंड सरकार ने कैदी के अच्छे आचरण और सुधारात्मक व्यवहार को देखते हुए उसकी समयपूर्व रिहाई की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजी।

हालांकि, गृह मंत्रालय ने 9 जुलाई 2025 को एक संक्षिप्त पत्र जारी कर कहा कि वह रिहाई प्रस्ताव से “सहमत नहीं है”।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस पत्र में यह तक नहीं बताया गया कि असहमति किस आधार पर है।


‘सिर्फ अपराध की गंभीरता आधार नहीं बन सकती’

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि remission यानी दंड में राहत सुधारात्मक न्याय (Reformative Justice) का हिस्सा है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल अपराध की गंभीरता के आधार पर किसी व्यक्ति की रिहाई नहीं रोकी जा सकती।

पीठ ने कहा:

“अपराध की गंभीरता का मूल्यांकन सजा तय करते समय हो चुका होता है। उसके बाद केवल उसी आधार पर जेल में बनाए रखना संविधान की भावना के विपरीत होगा।”

कोर्ट ने कहा कि remission नीति का उद्देश्य यह देखना होता है कि कैदी का आचरण कैसा रहा, उसमें सुधार हुआ या नहीं, और क्या वह समाज में दोबारा शामिल होने योग्य है।


सह-आरोपी को पहले ही मिल चुकी थी रिहाई

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि उसी मामले के एक सह-आरोपी को पहले ही समयपूर्व रिहाई दी जा चुकी थी, जबकि उसने कम अवधि जेल में बिताई थी।

अदालत ने कहा कि बिना किसी ठोस अंतर के एक आरोपी को राहत देना और दूसरे को इनकार करना अनुचित और मनमाना है।


कोर्ट ने कहा- दोबारा जेल लौटने की जरूरत नहीं

मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मई 2025 में आरोपी को अंतरिम जमानत दी थी।

अंतिम फैसले में अदालत ने कहा कि चूंकि वह पहले से अंतरिम जमानत पर बाहर है, इसलिए उसे दोबारा जेल में आत्मसमर्पण करने की आवश्यकता नहीं होगी।

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कोर्ट ने सीधे आदेश दिया कि उसे समयपूर्व रिहा माना जाए।


‘कारण बताना संवैधानिक आवश्यकता’

फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासनिक और कार्यपालिका निर्णयों में कारण दर्ज करने की संवैधानिक आवश्यकता पर भी जोर दिया।

अदालत ने कहा कि जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता दांव पर हो, तब सरकार केवल एक पंक्ति लिखकर राहत से इनकार नहीं कर सकती।

कोर्ट ने कहा कि remission जैसे मामलों में कार्यपालिका को प्रासंगिक कारकों पर विचार करना अनिवार्य है, जैसे—

  • कैदी का जेल में व्यवहार
  • पुनर्वास की संभावना
  • अपराध दोहराने की आशंका
  • समाज के लिए उपयोगिता
  • सुधारात्मक प्रगति

सुधारात्मक न्याय सिद्धांत को मजबूत करता फैसला

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में सुधारात्मक न्याय (Reformative Theory of Punishment) को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय है।

फैसला स्पष्ट करता है कि सजा का उद्देश्य केवल प्रतिशोध नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्वास भी है।


मामले का नाम

यह फैसला Rohit Chaturvedi v. State of Uttarakhand मामले में 15 मई 2026 को सुनाया गया।


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