गैर-हस्ताक्षरकर्ता पक्षकारों का प्रश्न न्यायाधिकरण ही तय करेगा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता न्यायाधिकरण द्वारा धारा 16 आवेदन खारिज किए जाने के आदेश में हाई कोर्ट Article 227 के तहत केवल असाधारण परिस्थितियों में ही हस्तक्षेप कर सकता है। गौहाटी हाई कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए कोर्ट ने मध्यस्थता कार्यवाही जारी रखने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट: धारा 16 के आदेश में Article 227 के तहत हाई कोर्ट का हस्तक्षेप सीमित, गौहाटी हाई कोर्ट का आदेश रद्द
मामले की पृष्ठभूमि
सुप्रीम कोर्ट ने गौहाटी हाई कोर्ट के उस अंतरिम आदेश और बाद के आदेश के खिलाफ दायर अपीलों पर फैसला सुनाया, जिनमें हाई कोर्ट ने मध्यस्थता न्यायाधिकरण (Arbitral Tribunal) द्वारा प्रतिवादियों को जारी नोटिस पर रोक लगा दी थी तथा संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दायर याचिका को सुनवाई योग्य (Maintainable) माना था।
न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की खंडपीठ ने कहा कि मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 16 के तहत क्षेत्राधिकार संबंधी आपत्तियों को खारिज करने वाले मध्यस्थता न्यायाधिकरण के आदेश के विरुद्ध अनुच्छेद 227 के तहत हाई कोर्ट का हस्तक्षेप उचित नहीं था।
अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 227 के तहत हस्तक्षेप केवल उन असाधारण मामलों में किया जा सकता है, जहां प्रथम दृष्टया न्यायाधिकरण के पास अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) का स्पष्ट अभाव हो। यदि धारा 16 के तहत दायर आवेदन खारिज हो जाता है, तो उसके विरुद्ध उचित कानूनी उपाय अंतिम मध्यस्थता निर्णय (Arbitral Award) के बाद धारा 34 के तहत उपलब्ध है।
क्या था विवाद?
यह विवाद एक पुराने पारिवारिक साझेदारी (Family Partnership) से जुड़ा था, जो चाय व्यवसाय संचालित करती थी।
अपीलकर्ता ने साझेदारी फर्म और उससे संबंधित कंपनियों के खिलाफ कथित वित्तीय अनियमितताओं, कुप्रबंधन तथा लेखा-जोखा प्रस्तुत करने (Rendition of Accounts) की मांग करते हुए दीवानी वाद दायर किया था।
इससे पहले मध्यस्थता अधिनियम की धारा 8 के तहत विवाद को मध्यस्थता में भेजने का आवेदन ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों ने खारिज कर दिया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने पक्षकारों की सहमति से विवाद मध्यस्थता के लिए भेज दिया और एकमात्र मध्यस्थ (Sole Arbitrator) की नियुक्ति की।
मध्यस्थता की कार्यवाही के दौरान कुछ ऐसी कंपनियों, जो साझेदारी समझौते की हस्ताक्षरकर्ता (Non-signatories) नहीं थीं, ने यह कहते हुए अपना नाम कार्यवाही से हटाने की मांग की कि उन पर मध्यस्थता समझौता लागू नहीं होता।
मध्यस्थता न्यायाधिकरण का फैसला
मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने इन आवेदनों को धारा 16 के तहत क्षेत्राधिकार संबंधी आपत्ति मानते हुए खारिज कर दिया।
न्यायाधिकरण ने कहा कि गैर-हस्ताक्षरकर्ता कंपनियों की मध्यस्थता में भागीदारी का प्रश्न कार्यवाही के दौरान तय किया जाएगा।
इसके बाद संबंधित कंपनियों ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत गौहाटी हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाई कोर्ट ने न्यायाधिकरण द्वारा जारी नोटिस पर रोक लगा दी और याचिका को सुनवाई योग्य माना।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 एक स्वायत्त (Self-contained) कानून है, जिसका उद्देश्य विवादों का त्वरित समाधान और न्यायालयों के न्यूनतम हस्तक्षेप को सुनिश्चित करना है।
अदालत ने SBP & Co. v. Patel Engineering Ltd., Deep Industries Ltd. v. ONGC तथा Punjab State Power Corporation Ltd. v. Emta Coal Ltd. जैसे पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि यद्यपि अनुच्छेद 227 के तहत हाई कोर्ट की संवैधानिक शक्ति समाप्त नहीं की जा सकती, लेकिन मध्यस्थता मामलों में इसका प्रयोग अत्यंत सीमित और असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए।
केवल असाधारण मामलों में ही होगा हस्तक्षेप
पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 227 के तहत हस्तक्षेप तभी किया जा सकता है जब मध्यस्थता न्यायाधिकरण के आदेश में अधिकार क्षेत्र का स्पष्ट और प्रथम दृष्टया अभाव दिखाई दे।
वर्तमान मामले में हाई कोर्ट ने ऐसा कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं किया कि न्यायाधिकरण के पास अधिकार क्षेत्र नहीं था या उसके आदेश में कोई स्पष्ट कानूनी त्रुटि थी।
गैर-हस्ताक्षरकर्ता पक्षकारों का प्रश्न न्यायाधिकरण ही तय करेगा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी गैर-हस्ताक्षरकर्ता (Non-signatory) के मध्यस्थता समझौते से बंधे होने का प्रश्न तथ्य और कानून दोनों से जुड़ा जटिल मुद्दा है।
संविधान पीठ के निर्णय Cox and Kings Ltd. v. SAP India Pvt. Ltd. (2024) के अनुसार, ऐसे प्रश्नों पर निर्णय लेने का अधिकार मध्यस्थता न्यायाधिकरण को ही है और वह धारा 16 के तहत इस मुद्दे पर विचार करेगा।
धारा 16 के आदेश को कब चुनौती दी जा सकती है?
अदालत ने दोहराया कि यदि मध्यस्थता न्यायाधिकरण धारा 16 के तहत क्षेत्राधिकार संबंधी आपत्ति खारिज कर देता है, तो उस आदेश को तत्काल हाई कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती।
ऐसे आदेश के विरुद्ध उचित उपाय अंतिम मध्यस्थता निर्णय (Final Arbitral Award) पारित होने के बाद धारा 34 के तहत उपलब्ध होता है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने गौहाटी हाई कोर्ट के दोनों आदेश रद्द कर दिए।
अदालत ने अनुच्छेद 227 के तहत दायर याचिका को खारिज करते हुए मध्यस्थता न्यायाधिकरण को निर्देश दिया कि वह गैर-हस्ताक्षरकर्ता कंपनियों की स्थिति पर स्वतंत्र रूप से विचार करते हुए मध्यस्थता कार्यवाही को शीघ्र पूरा करे।
मामला
Manash Kamal Bezboruah v. Bokahola Tea Company Private Limited,
Civil Appeal No. 8845-8846 of 2026,
निर्णय दिनांक: 14 जुलाई 2026
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