उमर खालिद जमानत याचिका
दिल्ली की एक अदालत ने दिल्ली दंगा साजिश मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की नई जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं। अदालत ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के जनवरी 2026 के आदेश से बंधी है और निर्धारित शर्तें पूरी हुए बिना जमानत पर विचार नहीं कर सकती।
उमर खालिद और शरजील इमाम को राहत नहीं
दिल्ली की एक अदालत ने शनिवार को दिल्ली दंगा साजिश मामले में आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की नई जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (Additional Sessions Judge) समीर बाजपेयी ने कहा कि ट्रायल कोर्ट सुप्रीम कोर्ट के 5 जनवरी 2026 के आदेश से बंधी हुई है, जिसमें दोनों आरोपियों की जमानत याचिकाएं पहले ही खारिज की जा चुकी हैं।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करना अनिवार्य
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि उसके पास सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पालन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में यह भी निर्धारित किया था कि दोनों आरोपी किन परिस्थितियों में दोबारा जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं। ऐसे में ट्रायल कोर्ट इन नई याचिकाओं पर विचार नहीं कर सकती।
कब दोबारा जमानत आवेदन की अनुमति थी?
अदालत ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने 5 जनवरी 2026 के आदेश में कहा था कि अभियोजन पक्ष के संरक्षित गवाहों (Protected Witnesses) की गवाही पूरी होने के बाद अथवा आदेश की तारीख से एक वर्ष पूरा होने पर आरोपी संबंधित अदालत में नई जमानत याचिका दायर कर सकते हैं।
ट्रायल कोर्ट ने कहा कि जब तक इन शर्तों का पालन नहीं होता, वह जमानत देने का अधिकार नहीं रखती।
कोर्ट ने याचिकाओं को बताया विचारणीय नहीं
अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के मद्देनज़र वर्तमान जमानत याचिकाएं विचारणीय (Maintainable) नहीं हैं।
इसी आधार पर दोनों आरोपियों की जमानत अर्जियां खारिज कर दी गईं।
याचिका में क्या कहा गया था?
उमर खालिद और शरजील इमाम ने सेशंस कोर्ट का रुख उस समय किया, जब हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य पीठ ने जनवरी 2026 में पारित जमानत आदेश पर कुछ प्रश्न उठाए थे।
याचिका में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के छह महीने से अधिक समय बीत जाने के बावजूद ट्रायल में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई है। आरोप तय करने पर बहस अभी भी पूरी नहीं हुई है और दोनों आरोपी लगभग छह वर्षों से न्यायिक हिरासत में हैं।
उमर खालिद की ओर से क्या दलील दी गई?
उमर खालिद की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता त्रिदीप पेस ने दलील दी कि अंद्राबी मामले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद उनके मुवक्किल को जमानत मिलनी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि एक वर्ष तक नई जमानत याचिका दाखिल न करने संबंधी रोक वर्तमान परिस्थितियों में लागू नहीं होती।
शरजील इमाम की ओर से क्या कहा गया?
शरजील इमाम की ओर से अधिवक्ता तालिब मुस्तफा ने तर्क दिया कि किसी आरोपी को एक वर्ष तक जमानत याचिका दाखिल करने से रोकने की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ को विचार करना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि इसी मामले के कुछ अन्य आरोपियों को बड़ी पीठ के समक्ष लंबित मुद्दों का लाभ मिला है।
दिल्ली पुलिस का पक्ष
दिल्ली पुलिस की ओर से पेश अधिवक्ता ने कहा कि जब तक सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ कोई अलग आदेश या स्पष्टीकरण नहीं देती, तब तक शीर्ष अदालत के मौजूदा आदेश और उसमें लगाए गए प्रतिबंध पूरी तरह बाध्यकारी हैं।
उन्होंने कहा कि यदि आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर कोई आपत्ति थी, तो उन्हें स्पष्टीकरण के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट का रुख करना चाहिए था।
अदालत का निष्कर्ष
ट्रायल कोर्ट ने माना कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित शर्तें अभी पूरी नहीं हुई हैं। इसलिए अदालत के पास दोनों आरोपियों की नई जमानत याचिकाओं पर विचार करने अथवा उन्हें राहत देने का कोई अधिकार नहीं है।
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