पूर्व-गिरफ्तारी जमानत के बदले वैवाहिक संबंध बहाल करने की शर्त असंवैधानिक: सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड HC का आदेश रद्द किया

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Condition of restoration of marital relationship in exchange for pre-arrest bail unconstitutional: Supreme Court quashes Jharkhand High Court order


सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को झारखंड हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक आरोपी को इस शर्त पर अग्रिम जमानत दी गई थी कि वह अपनी पत्नी के साथ वैवाहिक जीवन फिर से शुरू करेगा और उसे “सम्मान व गरिमा” के साथ रखेगा। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता CrPC की धारा 438 के तहत अग्रिम जमानत देते समय इस प्रकार की शर्त लगाना विधिसम्मत नहीं है

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा:

“न्यायालय को यह मूल्यांकन करना चाहिए था कि क्या अपीलकर्ता द्वारा मांगी गई अग्रिम जमानत, स्थापित सिद्धांतों के अनुसार दी जा सकती है या नहीं। यदि हां, तो केवल धारा 438(2) के अंतर्गत आने वाली शर्तें ही लगाई जा सकती थीं। लेकिन वैवाहिक जीवन पुनः शुरू करने जैसी शर्त — जैसा कि इस मामले में लगाई गई — पूर्ववर्ती निर्णयों की रोशनी में स्वीकार्य नहीं है।”

⚖️ मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता पर भारतीय दंड संहिता IPC की धारा 498ए, 323, 313, 506, 307, 34 तथा दहेज निषेध अधिनियम, 1961 की धारा 3 और 4 के तहत गंभीर आरोप लगे थे। झारखंड हाईकोर्ट ने उसे अग्रिम जमानत तो दी, लेकिन यह शर्त जोड़ दी कि वह अपनी पत्नी के साथ फिर से वैवाहिक जीवन शुरू करे और उसे “सम्मान और गरिमा” के साथ रखे।

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अपीलकर्ता ने इस शर्त को अनुचित और अवैध मानते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।


📜 सुप्रीम कोर्ट की कानूनी विवेचना

न्यायालय ने माना कि अपीलकर्ता ने हाईकोर्ट में वैवाहिक जीवन बहाल करने की इच्छा ज़रूर जताई थी, लेकिन यह सहमति “सम्मान और गरिमा से पालन-पोषण” “Parenting with Respect and Dignity” की शर्त तक विस्तारित नहीं थी, जिसे शिकायतकर्ता ने जोड़ा था।

पीठ ने यह भी कहा कि:

“ऐसी शर्त लगाना खतरनाक साबित हो सकता है क्योंकि भविष्य में यदि शिकायत की जाए कि शर्त का पालन नहीं हुआ, तो जमानत रद्द करने का आवेदन दिया जा सकता है। इससे हाईकोर्ट को ऐसी विवादास्पद तथ्यों की जांच करनी पड़ेगी, जो अग्रिम जमानत के दायरे से बाहर है।”

पीठ ने ‘महेश चंद्र बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2006) का हवाला दिया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया था कि जमानत की शर्तें ऐसे दायित्व नहीं डाल सकतीं जो विवादास्पद तथ्यों पर आधारित हों


📌 न्यायिक निर्णय एवं निर्देश

  • सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया
  • अग्रिम जमानत याचिका को फिर से विचार हेतु झारखंड हाईकोर्ट को भेजा गया
  • निर्देश दिया गया कि मामले का शीघ्र निपटारा किया जाए
  • तब तक के लिए अंतरिम सुरक्षा जारी रहेगी

🧠 इस निर्णय का महत्व

  • यह फैसला न्यायालयों को यह याद दिलाता है कि अग्रिम जमानत के दायरे में पारिवारिक/वैवाहिक मुद्दों को न सुलझाया जाए
  • क्रिमिनल न्याय प्रक्रिया और पारिवारिक न्याय प्रक्रिया के बीच स्पष्ट सीमा रेखा खींचता है
  • भविष्य में यह फैसला अन्य न्यायालयों के लिए मूल्यवान मिसाल बनेगा, खासकर तब जब जमानत की शर्तें अनुचित या भावनात्मक दबाव वाली हों।
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मामला: अनिल कुमार बनाम झारखंड राज्य एवं अन्य
Special Leave to Appeal (Crl.) No. 4862/2025

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