₹1,200 worth of Liquor, a death in custody
छत्तीसगढ़ में 6 लीटर कच्ची महुआ शराब रखने के आरोप में गिरफ्तार व्यक्ति की हिरासत में मौत पर सुप्रीम कोर्ट ने CBI जांच का आदेश दिया और परिजनों को ₹25 लाख अंतरिम मुआवजा देने का निर्देश दिया।
6 लीटर महुआ शराब के मामले में गिरफ्तारी, हिरासत में मौत
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ में हिरासत में हुई एक व्यक्ति की मौत के मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को नियमित आपराधिक मामला दर्ज कर जांच करने का निर्देश दिया है। व्यक्ति को कथित तौर पर 6 लीटर कच्ची महुआ शराब रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने छत्तीसगढ़ सरकार को मृतक के कानूनी उत्तराधिकारियों को अंतरिम मुआवजे के तौर पर ₹25 लाख का भुगतान करने का भी निर्देश दिया।
पुलिस ने FIR दर्ज नहीं करने के लिए न्यायिक जांच रिपोर्ट का दिया हवाला
मामले में राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों, विशेष रूप से DGP, DG (जेल) और गृह विभाग के प्रमुख सचिव की ओर से यह दलील दी गई कि CrPC की धारा 176 के तहत हुई न्यायिक जांच की रिपोर्ट पुलिस को प्राप्त नहीं हुई थी, इसलिए FIR दर्ज नहीं की जा सकी।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य की इस दलील पर गंभीर आपत्ति जताई और इसे “कवर-अप स्टोरी” बताते हुए कहा कि अदालत को गुमराह करने का प्रयास किया गया।
कोर्ट ने कहा कि राज्य को न्यायिक जांच और उसकी रिपोर्ट के बारे में जानकारी थी तथा 22 जुलाई 2024 की रिपोर्ट रिकॉर्ड पर उपलब्ध थी।
जेल मेडिकल रिपोर्ट और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बड़ा अंतर
सुप्रीम कोर्ट ने जेल की मेडिकल रिपोर्ट और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बीच महत्वपूर्ण अंतर को भी गंभीरता से लिया।
जेल मेडिकल रिपोर्ट में मौत का कारण कार्डियोपल्मोनरी अरेस्ट, एस्पिरेशन न्यूमोनाइटिस और अल्कोहल विदड्रॉल/डिलीरियम ट्रेमेन्स से जोड़ा गया था। वहीं पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतक के शरीर पर कई जीवित अवस्था में लगी चोटें (antemortem injuries) दर्ज थीं।
मेडिकल बोर्ड ने मौत का कारण सिर पर किसी कठोर और कुंद वस्तु से लगी चोट के कारण उत्पन्न जटिलताओं को बताया था।
हिरासत के दौरान चोट लगने की संभावना से इनकार नहीं
कोर्ट ने चोटों की उम्र से जुड़े पोस्टमार्टम निष्कर्षों पर भी गौर किया। रिपोर्ट के अनुसार सिर के पिछले हिस्से की चोट एक दिन के भीतर, दाहिनी कलाई के ऊपर की सूजन दो दिन के भीतर और जांघ तथा गर्दन के पिछले हिस्से की चोटें लगभग 2 से 6 दिन पुरानी थीं।
इन परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि मृतक को हिरासत के दौरान कई चोटें लगी हों। कोर्ट के अनुसार ऐसी परिस्थितियां तत्काल FIR दर्ज कर निष्पक्ष और विस्तृत जांच की मांग करती थीं।
न्यायिक जांच में भी सिर की चोट से मौत की बात
मृतक की हिरासत में मौत के बाद CrPC की धारा 176 के तहत न्यायिक जांच शुरू की गई थी। बिलासपुर के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ने जांच कर 22 जुलाई 2024 को रिपोर्ट प्रस्तुत की।
रिपोर्ट में भी यह राय व्यक्त की गई थी कि मौत सिर की चोट से उत्पन्न जटिलताओं के कारण हुई प्रतीत होती है।
इसके बावजूद जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई और मृतक के परिवार को उचित मुआवजा भी नहीं मिला।
मृतक पर क्या था आरोप?
मृतक को 18 जनवरी 2024 को बिलासपुर जिले के सीपत थाने में दर्ज FIR संख्या 47/2024 के तहत छत्तीसगढ़ आबकारी अधिनियम, 1915 की धारा 34(2) में गिरफ्तार किया गया था।
उस पर करीब 6 लीटर कच्ची महुआ शराब रखने का आरोप था, जिसकी अनुमानित कीमत लगभग ₹1,200 बताई गई थी। गिरफ्तारी के बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेजकर बिलासपुर सेंट्रल जेल में रखा गया।
21 जनवरी को स्वास्थ्य बिगड़ने पर उसे सेंट्रल जेल से CIMS अस्पताल, बिलासपुर ले जाया गया, जहां 22 जनवरी 2024 सुबह करीब 6 बजे उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई।
हाईकोर्ट ने माना था हिरासत में हिंसा, लेकिन दिया था ₹1 लाख
मृतक की पत्नी, बच्चों और अन्य कानूनी उत्तराधिकारियों ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का रुख किया था। उन्होंने ₹50 लाख मुआवजे और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी।
3 अक्टूबर 2024 को हाईकोर्ट ने माना कि मृतक को हिरासत में हिंसा का सामना करना पड़ा था और उसकी मौत हिरासत में हुई हिंसा के कारण हुई। हालांकि, हाईकोर्ट ने केवल ₹1 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया और FIR दर्ज करने या जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ जांच का कोई प्रभावी निर्देश नहीं दिया।
इसके बाद परिजनों ने अपर्याप्त मुआवजे और आपराधिक कार्रवाई के अभाव को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट हाईकोर्ट के सामने भी नहीं रखी गई थी
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण तथ्य दर्ज किया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट पहली बार राज्य की ओर से 28 जुलाई 2026 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दाखिल अतिरिक्त हलफनामे के माध्यम से रिकॉर्ड पर लाई गई।
यह रिपोर्ट पहले हाईकोर्ट के सामने पेश नहीं की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने भी बताया कि उन्हें यह रिपोर्ट पहली बार इसी चरण में उपलब्ध हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि रिपोर्ट को देर से सामने लाना राज्य अधिकारियों के विलंबकारी रवैये को और गंभीर बनाता है।
CBI को नियमित आपराधिक मामला दर्ज करने का निर्देश
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने CBI को नियमित आपराधिक मामला दर्ज कर जांच करने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने जांच एक वरिष्ठ अधिकारी को सौंपने और राज्य अधिकारियों के आचरण की भी जांच करने को कहा। साथ ही निर्देश दिया गया कि हिरासत में हिंसा के लिए जो भी अधिकारी जिम्मेदार पाए जाएं, उनके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए।
छत्तीसगढ़ के DGP को एक सप्ताह के भीतर सभी संबंधित रिकॉर्ड CBI निदेशक को सौंपने का निर्देश दिया गया।
परिवार को ₹25 लाख अंतरिम मुआवजा
मुआवजे के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने ध्यान दिया कि राज्य ने हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष पर विवाद नहीं किया था कि मृतक अपने परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य था और हिरासत में हुई हिंसा के कारण उसकी असामान्य मौत हुई।
इसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम राहत के तौर पर छत्तीसगढ़ सरकार को याचिकाकर्ताओं को चार सप्ताह के भीतर ₹25 लाख का भुगतान करने का निर्देश दिया।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अंतिम मुआवजे की राशि का निर्धारण मामले के अंतिम निर्णय के समय किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिरासत में मौत जैसे गंभीर मामलों में राज्य की ओर से केवल विभागीय या न्यायिक जांच का हवाला देकर आपराधिक कार्रवाई से बचा नहीं जा सकता। खासकर तब, जब मेडिकल और पोस्टमार्टम साक्ष्यों में गंभीर विसंगतियां मौजूद हों और हिरासत के दौरान चोट लगने की संभावना सामने आती हो।
केस: Lahra Bai Tamre v. State of Chhattisgarh
निर्णय की तारीख: 12 अगस्त 2026
पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता
अगली सुनवाई: 13 अक्टूबर 2026
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