वकील पूरी पूछताछ के दौरान लगातार आरोपी के साथ बैठा रहेगा
सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश के कथित हिरासत में मौत (Custodial Death) मामले में कहा कि पुलिस हिरासत पर ऐसी शर्तें नहीं लगाई जा सकतीं, जिनसे जांच बाधित हो जाए। अदालत ने BNSS, 2023 की धारा 187 और 38 की व्याख्या करते हुए पुलिस हिरासत, पूछताछ और वकील की मौजूदगी पर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए।
पुलिस हिरासत पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हिरासत में हिंसा से सुरक्षा संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है, लेकिन अदालतें पुलिस हिरासत पर ऐसी कठोर और अव्यावहारिक शर्तें नहीं लगा सकतीं, जिनसे वैधानिक जांच का उद्देश्य ही विफल हो जाए।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि पुलिस हिरासत का उद्देश्य प्रभावी जांच करना है और न्यायालय द्वारा लगाई गई शर्तें इतनी कठोर नहीं होनी चाहिए कि जांच एजेंसी अपना कानूनी दायित्व ही पूरा न कर सके।
क्या था मामला?
मामला आंध्र प्रदेश में एक कथित हिरासत में मौत (Custodial Death) से जुड़ा है।
आरोप है कि एक व्यक्ति को 6 मई 2026 को पुलिस ने हिरासत में लिया, लेकिन उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया। बाद में उसकी मां ने हाई कोर्ट में हैबियस कॉर्पस याचिका दायर की और आरोप लगाया कि पुलिस हिरासत में यातना के कारण उसकी मौत हो गई तथा शव को गायब कर दिया गया।
इसके बाद एफआईआर दर्ज हुई और मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) गठित किया गया। जांच के दौरान एक पुलिस निरीक्षक (Inspector) को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजा गया।
मजिस्ट्रेट और हाई कोर्ट ने कौन-सी शर्तें लगाई थीं?
एसआईटी ने आरोपी पुलिस अधिकारी से पूछताछ के लिए 12 दिन की पुलिस हिरासत मांगी थी।
मजिस्ट्रेट ने 8 दिन की पुलिस हिरासत तो दी, लेकिन कई कड़ी शर्तें भी लगा दीं, जैसे—
- पूछताछ केवल केंद्रीय जेल के भीतर होगी।
- पूरी पूछताछ और हर गतिविधि की लगातार वीडियो रिकॉर्डिंग होगी।
- आरोपी का वकील पूछताछ के दौरान लगातार मौजूद रहेगा।
- किसी भी परिस्थिति में पुलिस हिरासत की अवधि आगे नहीं बढ़ाई जाएगी।
हाई कोर्ट ने कुछ राहत देते हुए अपराध स्थल पर ले जाने की अनुमति दी, लेकिन अधिकांश शर्तें बरकरार रखीं।
इसके खिलाफ राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
‘पूछताछ केवल जेल में’ वाली शर्त अव्यावहारिक
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले में—
- शव अभी तक बरामद नहीं हुआ,
- सीसीटीवी के मूल हार्ड डिस्क बरामद होने बाकी हैं,
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) की धारा 23 के तहत महत्वपूर्ण बरामदगी होनी बाकी है।
ऐसे में जांच अधिकारी को 160 किलोमीटर दूर स्थित जेल में बैठकर पूछताछ करने के लिए बाध्य करना न तो व्यावहारिक है और न ही जांच के हित में।
अदालत ने कहा कि पूछताछ केवल जेल तक सीमित रखना “अनुचित और अस्थिर (Unworkable and Unjustified)” है।
BNSS की धारा 187 की सुप्रीम कोर्ट ने की महत्वपूर्ण व्याख्या
अदालत ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 187 ने पुराने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) से अलग व्यवस्था बनाई है।
अब 15 दिन की पुलिस हिरासत एक साथ ही नहीं, बल्कि 40 या 60 दिनों की वैधानिक अवधि के भीतर अलग-अलग हिस्सों में भी दी जा सकती है, यदि जांच के दौरान नए तथ्य या साक्ष्य सामने आते हैं।
इसलिए मजिस्ट्रेट यह नहीं कह सकता कि “किसी भी हालत में आगे पुलिस हिरासत नहीं बढ़ेगी।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा आदेश कानून द्वारा दी गई जांच एजेंसी की वैधानिक शक्ति को पहले ही समाप्त कर देता है।
पूछताछ के दौरान वकील की मौजूदगी पर क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने BNSS की धारा 38 की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि गिरफ्तार व्यक्ति को पूछताछ के दौरान अपने वकील से मिलने का अधिकार है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वकील पूरी पूछताछ के दौरान लगातार आरोपी के साथ बैठा रहेगा।
हालांकि अदालत ने यह व्यवस्था बरकरार रखी कि वकील ऐसी जगह मौजूद रह सकता है, जहां से वह आरोपी को देख सके, लेकिन वह किसी भी प्रकार से पूछताछ में हस्तक्षेप नहीं करेगा।
वीडियोग्राफी पर भी स्पष्ट किया कानून
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पूछताछ और बरामदगी की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग एक अच्छा और आवश्यक सुरक्षा उपाय है।
यह आरोपी को यातना के आरोपों से बचाने के साथ-साथ जांच एजेंसी को भी झूठे आरोपों से सुरक्षा प्रदान करता है।
लेकिन अदालत ने यह भी कहा कि पूरे सफर (Transit) की लगातार वीडियोग्राफी कराना व्यावहारिक नहीं है।
वीडियो रिकॉर्डिंग केवल वास्तविक पूछताछ और बरामदगी की प्रक्रिया तक सीमित रहनी चाहिए।
आरोपी की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी तय
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पूछताछ के दौरान आरोपी को—
- धमकी,
- लालच,
- मानसिक या शारीरिक उत्पीड़न,
- थर्ड डिग्री,
- या किसी भी प्रकार की प्रताड़ना नहीं दी जाएगी।
साथ ही जांच अधिकारी, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक, एसआईटी के सदस्य तथा संबंधित अधिकारी आरोपी की सुरक्षा के लिए संयुक्त रूप से जिम्मेदार होंगे।
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्देश
अदालत ने आदेश दिया कि—
- पुलिस हिरासत की कुल अवधि 15 दिन से अधिक नहीं होगी।
- पूछताछ एसआईटी के निर्धारित पूछताछ केंद्र या विजयवाड़ा स्थित सुरक्षित पुलिस परिसर में की जा सकेगी।
- पूछताछ और बरामदगी की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य होगी।
- पूरे सफर की लगातार वीडियोग्राफी आवश्यक नहीं होगी।
- आरोपी का वकील केवल दृष्टि सीमा (Within Sight) में रह सकेगा, लेकिन पूछताछ में हस्तक्षेप नहीं करेगा।
- सीसीटीवी फुटेज और वीडियो रिकॉर्डिंग जांच पूरी होने के बाद आवश्यक प्रमाणपत्र सहित मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत की जाएगी।
- एसआईटी निष्पक्ष, वैज्ञानिक और स्वतंत्र जांच करेगी तथा किसी न्यायालय की टिप्पणियों से प्रभावित नहीं होगी।
फैसले का महत्व
यह निर्णय BNSS, 2023 के लागू होने के बाद पुलिस हिरासत और पूछताछ से जुड़े कानून की सबसे महत्वपूर्ण व्याख्याओं में से एक माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मानवाधिकारों और प्रभावी आपराधिक जांच के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। अदालतें आरोपी के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए सुरक्षा उपाय तो लागू कर सकती हैं, लेकिन ऐसी शर्तें नहीं लगा सकतीं जो जांच एजेंसी की वैधानिक शक्तियों को निष्प्रभावी बना दें।
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