सबरीमाला सुनवाई: CJI ने कहा यदि समाज किसी बुराई को समाप्त करना चाहता है, तो राज्य उस दिशा में कदम उठा सकता है

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  • जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “हिंदू समाज को एकजुट होना चाहिए और यह नहीं कहना चाहिए कि हम एक संप्रदाय के हैं, वे दूसरे संप्रदाय के हैं।
  • सबरीमाला सुनवाई: ‘सामाजिक सुधार बनाम धार्मिक स्वतंत्रता’ पर Supreme Court of India में गहन बहस
  • CJI ने कहा यदि समाज किसी बुराई को समाप्त करना चाहता है, तो राज्य उस दिशा में कदम उठा सकता है।
  • सुप्रीम कोर्ट कहा कि भेदभाव को समाप्त करना Article 25(2)(b) of the Constitution of India के तहत संभव


सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान सामाजिक सुधार, धार्मिक स्वतंत्रता और राज्य की भूमिका पर अहम टिप्पणियां। अनुच्छेद 25(2)(b) की सीमा पर बहस तेज।


सातवें दिन सुनवाई में संवैधानिक बहस तेज

Supreme Court of India में सबरीमाला मामले की सुनवाई के सातवें दिन संवैधानिक मुद्दों पर गहन बहस हुई। कार्यवाही का केंद्र धार्मिक स्वतंत्रता, सामाजिक सुधार और न्यायिक समीक्षा के बीच संतुलन पर रहा।

‘राज्य अजनबी नहीं, जनता का प्रतिनिधि’

मुख्य न्यायाधीश Surya Kant ने कहा कि सामाजिक कल्याण और सुधार का दायरा व्यापक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य कोई बाहरी संस्था नहीं, बल्कि जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है।

उन्होंने कहा कि यदि समाज किसी बुराई को समाप्त करना चाहता है, तो राज्य उस दिशा में कदम उठा सकता है। हालांकि, यह तय करना कि कौन-सा सुधार Article 25(2)(b) of the Constitution of India के दायरे में आता है, हर मामले के तथ्यों पर निर्भर करेगा।

‘अंतरात्मा ही मनुष्य को अलग बनाती है’

न्यायमूर्ति B. V. Nagarathna ने कहा कि सभी मनुष्य अंतरात्मा से संचालित होते हैं और यही उन्हें अन्य जीवों से अलग बनाता है।

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उन्होंने यह भी कहा कि समाज को संप्रदायों में बंटने के बजाय एकजुट होना चाहिए। मंदिरों में प्रवेश को लेकर भेदभाव दीर्घकाल में स्वयं संप्रदाय के लिए नुकसानदेह हो सकता है।

अदालत की भूमिका पर सवाल

न्यायमूर्ति Aravind Kumar ने सवाल उठाया कि क्या अदालतों को यह तय करना चाहिए कि किसी धार्मिक प्रथा का धार्मिक या शास्त्रीय अर्थ क्या है।

यह टिप्पणी तब आई जब वरिष्ठ अधिवक्ता Gopal Subramanium ने धार्मिक प्रथाओं की प्रकृति को लेकर “अंतर-धार्मिक” विवादों का जिक्र किया।

‘अदालत के पास निर्णय की शक्ति’

Gopal Subramanium ने दलील दी कि ऐसे मामलों में अदालत को साक्ष्यों के आधार पर निर्णय करना पड़ता है और यह उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है।

उन्होंने कहा कि कानूनी अधिकारों और नुकसान का निर्धारण केवल अदालत ही कर सकती है, भले ही ये परिस्थितियां आदर्श न हों।

सामाजिक सुधार बनाम धार्मिक प्रथा

न्यायमूर्ति B. V. Nagarathna ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी धार्मिक प्रथा में भेदभाव है—जैसे ऐतिहासिक रूप से सती प्रथा—तो उसे समाप्त करना सामाजिक सुधार के दायरे में आएगा और इसे धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।

उन्होंने कहा कि भेदभाव को समाप्त करना Article 25(2)(b) of the Constitution of India के तहत संभव है और इसके लिए हमेशा Article 14 of the Constitution of India का सहारा लेना जरूरी नहीं। जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “हिंदू समाज को एकजुट होना चाहिए और यह नहीं कहना चाहिए कि हम एक संप्रदाय के हैं, वे दूसरे संप्रदाय के हैं।

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क्या है सबरीमाला विवाद

यह मामला Sabarimala Temple में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक प्रथाओं में भेदभाव से जुड़ा है।

नौ जजों की संविधान पीठ

मुख्य न्यायाधीश Surya Kant की अध्यक्षता में नौ न्यायाधीशों की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है, जिसमें न्यायमूर्ति नागरत्ना, एम.एम. सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जॉयमाल्य बागची शामिल हैं।

2018 का ऐतिहासिक फैसला

28 सितंबर 2018 को Supreme Court of India की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से महिलाओं पर आयु-आधारित प्रतिबंध को हटाते हुए Kerala Hindu Places of Public Worship Rules, 1965 के नियम 3(b) को असंवैधानिक घोषित कर दिया था।


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