किरायेदार पहले से काबिज था तो समझौते के बाद कब्जा जारी रहना ‘आंशिक पालन’ में मिला कब्जा नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बिक्री समझौता होने मात्र से मकान मालिक-किरायेदार संबंध समाप्त नहीं होता। पहले से काबिज किरायेदार को कब्जा जारी रहने के आधार पर बिक्री समझौते के आंशिक पालन में मिला कब्जा नहीं माना जा सकता।
Allahabad High Court ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि मकान मालिक और किरायेदार के बीच बिक्री समझौता (Agreement to Sell) निष्पादित हो जाने मात्र से किरायेदारी स्वतः समाप्त नहीं होती। यदि किरायेदार बिक्री समझौते से पहले ही संपत्ति पर काबिज था, तो समझौते के बाद उसका कब्जा जारी रहना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उसे बिक्री समझौते के आंशिक पालन में कब्जा सौंपा गया था।
न्यायमूर्ति डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए राजेश कुमार चौरसिया व दो अन्य की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी। याचिका कानपुर नगर की लघु वाद न्यायालय के 14 मई के फैसले के खिलाफ दाखिल की गई थी। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा।
किरायेदारी समाप्त होने का स्पष्ट या निहित प्रमाण जरूरी
कोर्ट ने कहा कि यदि किरायेदार यह दावा करता है कि बिक्री समझौते के बाद उसका कब्जा किरायेदारी के आधार पर नहीं, बल्कि बिक्री समझौते के आंशिक पालन में है, तो उसे यह साबित करना होगा कि पुरानी किरायेदारी स्पष्ट रूप से अथवा निहित रूप से समाप्त हो गई थी।
मामले में किरायेदार पहले से ही दुकान पर कब्जे में था। इसलिए केवल यह तथ्य कि बिक्री समझौते के बाद भी उसका कब्जा बना रहा, इस निष्कर्ष के लिए पर्याप्त नहीं था कि उसे समझौते के तहत नया कब्जा दिया गया था।
2002 में हुआ था दुकान खरीदने का समझौता
मकान मालिक ने वर्ष 2019 में कानपुर नगर की लघु वाद न्यायालय में किरायेदारों को दुकान से बेदखल करने के लिए मुकदमा दायर किया था। आरोप था कि किरायेदारों ने 1 जनवरी 2003 से 31 अगस्त 2019 तक किराया नहीं दिया। इसके बाद मकान मालिक ने 1 सितंबर 2019 को नोटिस जारी कर किरायेदारी समाप्त कर दी।
इसके जवाब में किरायेदारों ने कहा कि 24 दिसंबर 2002 को दुकान खरीदने का समझौता हुआ था और उसके साथ कब्जा सौंपने संबंधी पत्र भी तैयार किया गया था। उनका तर्क था कि इस समझौते के बाद मकान मालिक-किरायेदार का संबंध समाप्त हो गया और उनका कब्जा बिक्री समझौते के आंशिक पालन में हो गया था।
कब्जा पत्र भी पर्याप्त रूप से साबित नहीं हुआ
हाईकोर्ट ने किरायेदारों की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने पाया कि किरायेदार बिक्री समझौते से पहले ही संपत्ति पर कब्जे में थे। ऐसे में कब्जे की निरंतरता मात्र से कब्जे की प्रकृति बदल जाने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि पंजीकृत समझौते में संपत्ति का कब्जा बिक्री विलेख के निष्पादन के समय दिए जाने की बात कही गई थी। यह परिस्थिति किरायेदारों के उस दावे के विपरीत थी कि उन्हें समझौते के समय ही कब्जा दे दिया गया था।
इसके अलावा, कब्जा पत्र के गवाहों की गवाही भी नहीं कराई गई थी। इसलिए कोर्ट ने माना कि उस दस्तावेज को पर्याप्त रूप से साबित नहीं किया गया।
पूरी कीमत चुकाने से स्वामित्व हस्तांतरित नहीं होता
हाईकोर्ट ने एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू स्पष्ट करते हुए कहा कि बिक्री की पूरी कीमत का भुगतान कर देने मात्र से Agreement to Sell, बिक्री विलेख नहीं बन जाता और उससे संपत्ति का स्वामित्व हस्तांतरित नहीं होता।
इस आधार पर कोर्ट ने किरायेदारों की पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए लघु वाद न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा।
कानूनी निष्कर्ष: इस फैसले का मूल सिद्धांत यह है कि पहले से मौजूद किरायेदारी और बाद में हुए बिक्री समझौते के बीच संबंध को केवल कब्जे की निरंतरता से नहीं बदला जा सकता। किरायेदार को यह स्थापित करना होगा कि किरायेदारी वास्तव में समाप्त हो गई थी और उसके बाद कब्जा बिक्री समझौते के आंशिक पालन के परिणामस्वरूप प्राप्त हुआ।
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