CJI सूर्यकांत: लंबित मामलों पर विशेषज्ञ अदालतें जरूरी
- लंबित मामलों का निपटारा न्यायपालिका के सामने बड़ी चुनौती है।
- हर प्रकार के मामले के लिए एक समान समयसीमा उचित नहीं है।
- मामलों के लिए उपयुक्त समयसीमा तय करने हेतु समिति गठित की गई है।
- विशेषज्ञ अदालतें और विशेष ट्रिब्यूनल मामलों के शीघ्र निपटारे में मददगार हैं।
- जिला अदालतों में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना और न्यायिक नियुक्तियां महत्वपूर्ण हैं।
- तकनीक को जज की सहायक बनाना चाहिए, निर्णय लेने वाला नहीं।
- राज्य या क्षेत्र विशेष से जुड़े मामलों में पहले संबंधित हाई कोर्ट जाना चाहिए।
- CJI ने अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट की व्यापक संवैधानिक भूमिका पर जोर दिया।
- न्याय तक पहुंच को नागरिकों के करीब रखने के लिए प्रत्येक राज्य में हाई कोर्ट की व्यवस्था की गई है।
- न्यायिक मामलों को उनके संवैधानिक रूप से निर्धारित मंच पर ही ले जाना चाहिए।
भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा है कि देश की न्यायपालिका में लंबित मामलों का बोझ अब भी एक बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा कि न्यायिक व्यवस्था में काफी सुधार हुआ है, लेकिन जनता की यह अपेक्षा उचित है कि हर मामले का फैसला निश्चित समयसीमा में और जल्द होना चाहिए।
हालांकि, CJI ने स्पष्ट किया कि हर तरह के मामले के लिए एक जैसी समयसीमा तय नहीं की जा सकती। उपयुक्त समयसीमा निर्धारित करने के लिए एक समिति गठित की गई है और उसकी सिफारिशों के आधार पर मामलों के लिए समयसीमा तय की जाएगी।
विशेषज्ञ अदालतों से जल्द निपटारे पर जोर
CJI सूर्यकांत ने मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए विशेषज्ञ और विशेष अदालतों की व्यवस्था को महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने कहा कि सरकार के सहयोग से गंभीर अपराधों के मुकदमों के लिए एक साल के भीतर विशेष अदालतें स्थापित करने में सफलता मिली है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि परिवारिक विवादों के लिए फैमिली कोर्ट, व्यावसायिक मामलों के लिए कमर्शियल कोर्ट और विभिन्न विषयों के लिए विशेष ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं।
इनका उद्देश्य यह है कि अलग-अलग प्रकार के मामलों की सुनवाई संबंधित क्षेत्र में विशेषज्ञता रखने वाली अदालतों द्वारा की जाए और उन्हें निर्धारित समयसीमा में निपटाया जाए।
न्यायिक नियुक्तियां और जजों की संख्या भी महत्वपूर्ण
CJI ने माना कि न्यायपालिका अभी लंबित मामलों को कम करने में पूरी तरह सफल नहीं हुई है। इसके पीछे उन्होंने न्यायिक नियुक्तियों और जिला अदालतों में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता जैसे मुद्दों को भी महत्वपूर्ण बताया।
टेक्नोलॉजी जज की मददगार हो, जज का विकल्प नहीं
जस्टिस सूर्यकांत ने न्यायिक व्यवस्था में तकनीक के इस्तेमाल को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि तकनीक का इस्तेमाल न्यायाधीशों की सहायता के लिए किया जाना चाहिए, लेकिन उसे न्यायिक निर्णय लेने वाले जज का स्थान नहीं लेना चाहिए।
उनके अनुसार, उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि न्यायिक अधिकारी तकनीक के आधार पर यांत्रिक तरीके से फैसले लेना शुरू न कर दें।
राज्य से जुड़े मामलों में पहले हाई कोर्ट जाएं
CJI ने उन याचिकाओं पर भी चिंता जताई जो किसी विशेष राज्य या क्षेत्र से संबंधित होने के बावजूद सीधे सुप्रीम कोर्ट में दाखिल कर दी जाती हैं।
उन्होंने कहा कि जिन मामलों का प्रभाव पूरे देश पर पड़ता है, वे सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आ सकते हैं। लेकिन किसी विशेष राज्य या क्षेत्र से संबंधित मामलों को सामान्यतः पहले संबंधित हाई कोर्ट के सामने रखा जाना चाहिए।
अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट की व्यापक भूमिका
CJI सूर्यकांत ने संविधान में हाई कोर्ट की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर देते हुए अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226 का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट को संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं, जबकि अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट की शक्तियां हैं। उनके अनुसार, दोनों प्रावधानों का विश्लेषण करने पर अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट की शक्ति अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट की शक्ति से व्यापक है।
नागरिकों के लिए ‘न्याय उनके दरवाजे तक’
CJI ने कहा कि संविधान निर्माताओं की दृष्टि यह थी कि प्रत्येक राज्य में हाई कोर्ट हो, ताकि नागरिकों को अपने अधिकारों के संरक्षण के लिए दूर दिल्ली स्थित सुप्रीम कोर्ट तक जाने की आवश्यकता न पड़े।
उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के संवैधानिक, कानूनी, दीवानी या मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है और राज्य में हाई कोर्ट मौजूद है, तो उसे अपने राज्य के हाई कोर्ट का रुख करना चाहिए।
न्यायिक व्यवस्था में तय मंच का सम्मान जरूरी
CJI सूर्यकांत ने कहा कि न्यायिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए यह बेहद जरूरी है कि जिला अदालत में जाने वाला मामला जिला अदालत में, हाई कोर्ट में जाने वाला मामला हाई कोर्ट में और सुप्रीम कोर्ट के लिए निर्धारित मामला सुप्रीम कोर्ट में ही पहुंचे।
उन्होंने कहा कि यही भारत का संवैधानिक ढांचा है और इसका सम्मान किया जाना चाहिए।
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