पटना हाई कोर्ट ने बिना वैध आदेश के मकान और चारदीवारी गिराए जाने को गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन बताया। कोर्ट ने पूर्वी चंपारण प्रशासन को तीन याचिकाकर्ताओं को कुल 5.5 लाख रुपये अंतरिम मुआवजा देने और मामले की विस्तृत जांच का निर्देश दिया।
बिना आदेश मकान गिराने पर हाई कोर्ट सख्त
पटना हाई कोर्ट ने बिना किसी वैध प्रशासनिक या न्यायिक आदेश के मकान और चारदीवारी गिराए जाने के मामले में पूर्वी चंपारण प्रशासन को तीन याचिकाकर्ताओं को कुल 5.5 लाख रुपये अंतरिम मुआवजा देने का निर्देश दिया है।
जस्टिस राज कुमार ने मामले की सुनवाई करते हुए अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि अधिकारियों की मौजूदगी में बिना किसी आदेश के घर और चारदीवारी को ध्वस्त कर दिया गया, लेकिन इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।
अदालत ने घर को गिराए जाने की गंभीरता को रेखांकित करते हुए इसकी तुलना ‘ब्रह्म हत्या’ जैसे महापाप से की।
‘घर केवल चार दीवारें नहीं, परिवार की पहचान और भावनात्मक जुड़ाव है’
हाई कोर्ट ने कहा कि जिस घर में कोई व्यक्ति रह रहा हो, उसे गिरा देना केवल एक निर्माण को नष्ट करना नहीं है। घर परिवार के लिए भावनात्मक जुड़ाव और पहचान का प्रतीक होता है।
अदालत ने कहा कि आर्थिक मुआवजा मकान के पुनर्निर्माण या मरम्मत में सहायता कर सकता है और प्रभावित परिवार को नई शुरुआत करने में मदद कर सकता है, लेकिन जो कुछ व्यक्ति या परिवार के साथ हुआ, उसकी पूरी भरपाई केवल धन से नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने यह भी कहा कि घर को गिराना व्यक्ति की पहचान की जड़ों पर प्रहार करने जैसा है और इससे परिवार को गहरा मानसिक एवं सामाजिक आघात पहुंचता है।
2017 में गिराए गए थे मकान और चारदीवारी
मामला वर्ष 2017 में याचिकाकर्ताओं के मकान और अन्य निर्माण गिराए जाने से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं ने अपने मकान और अन्य निर्माणों को गिराए जाने के खिलाफ मुआवजे तथा जमीन पर अपने कब्जे की सुरक्षा की मांग करते हुए हाई कोर्ट का रुख किया था।
याचिकाकर्ताओं का दावा था कि उन्होंने संबंधित जमीन पंजीकृत बिक्री विलेख (Registered Sale Deed) के जरिए खरीदी थी। उनके अनुसार, वर्ष 2016-17 में उनके खिलाफ अतिक्रमण की कार्यवाही शुरू की गई थी।
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि कार्यवाही लंबित रहने के दौरान एक सार्वजनिक सभा के बाद अधिकारी कथित तौर पर JCB मशीन लेकर मौके पर पहुंचे और मकान तथा अन्य निर्माणों को ध्वस्त कर दिया।
‘विध्वंस का कोई आदेश नहीं था’
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि मकान गिराने के लिए न तो कोई वैध आदेश पारित किया गया और न ही उन्हें अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर दिया गया।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया तथा अधिकारियों ने ऐसा कोई आदेश भी पेश नहीं किया जिससे मकान गिराने की अनुमति साबित होती हो।
इसके अलावा, याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि मौके पर मौजूद लोगों को ध्वस्त मकान से निकली निर्माण सामग्री और अन्य सामान अपने साथ ले जाने की अनुमति दी गई।
राज्य का दावा—भीड़ ने ढांचे गिराए, प्रशासन की भूमिका नहीं
राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि अतिक्रमण की कार्यवाही के संबंध में नोटिस जारी किए गए थे, लेकिन विध्वंस का कोई आदेश पारित नहीं किया गया था।
राज्य ने विध्वंस में अपनी भूमिका से इनकार करते हुए दावा किया कि मकान और अन्य ढांचों को भीड़ ने नुकसान पहुंचाया था।
हालांकि, हाई कोर्ट ने इस तर्क को अधिकारियों की जिम्मेदारी से मुक्ति का आधार नहीं माना।
‘भीड़ की अवैध कार्रवाई अधिकारियों को जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करती’
अदालत ने कहा कि यदि याचिकाकर्ताओं के घर को बिना किसी आधिकारिक निर्णय के और अतिक्रमण की कार्यवाही के बीच भीड़ द्वारा ध्वस्त किया गया, तब भी इससे प्रशासनिक अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो जाते।
कोर्ट ने विशेष रूप से इस बात पर सवाल उठाया कि अधिकारियों ने भीड़ की कथित अवैध कार्रवाई को रोकने, दोषियों की पहचान करने और उनके खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय याचिकाकर्ताओं की जमाबंदी रद्द करने की प्रक्रिया शुरू कर दी।
अदालत ने कहा कि इस दौरान अधिकारियों ने इस बात पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया कि मकान गिराए जाने से याचिकाकर्ताओं और उनके परिवारों को कितनी परेशानी तथा जीवन में कितनी उथल-पुथल का सामना करना पड़ा।
आश्रय का अधिकार अनुच्छेद 21 का हिस्सा
पटना हाई कोर्ट ने कहा कि आश्रय का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित मौलिक अधिकार का हिस्सा है।
अदालत के अनुसार, जब संविधान किसी नागरिक को आश्रय का अधिकार देता है, तो उससे यह अधिकार छीनना केवल मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं है, बल्कि इससे प्रभावित व्यक्ति और उसके परिवार को गहरी पीड़ा और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि मकान को केवल एक भौतिक संरचना के रूप में नहीं देखा जा सकता। उसमें रहने वाले परिवार के लिए उसका सामाजिक, भावनात्मक और व्यक्तिगत महत्व भी होता है।
तीन याचिकाकर्ताओं को 5.5 लाख रुपये अंतरिम मुआवजा
अदालत ने पूर्वी चंपारण के आयुक्त को निर्देश दिया कि तीन याचिकाकर्ताओं को कुल 5.5 लाख रुपये का अंतरिम मुआवजा दो महीने के भीतर दिया जाए।
मुआवजे का विवरण इस प्रकार है:
- एक याचिकाकर्ता को — ₹1.5 लाख
- अन्य दो याचिकाकर्ताओं को — ₹2-2 लाख
- कुल — ₹5.5 लाख
इसके साथ ही हाई कोर्ट ने आयुक्त को मामले की विस्तृत जांच करने और याचिकाकर्ताओं को दिए जाने वाले अंतिम मुआवजे की राशि निर्धारित करने का निर्देश दिया।
अदालत ने कहा कि यह प्रक्रिया अंतरिम मुआवजा दिए जाने के बाद तीन महीने के भीतर पूरी की जाए।
प्रशासनिक कार्रवाई पर न्यायिक जवाबदेही का संदेश
फैसले में हाई कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि अतिक्रमण या किसी अन्य प्रशासनिक कार्रवाई के नाम पर भी किसी नागरिक के घर को बिना वैध आदेश और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के ध्वस्त नहीं किया जा सकता।
फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि अदालत ने मकान के भौतिक नुकसान के साथ-साथ उससे जुड़े गरिमा, आश्रय, पारिवारिक सुरक्षा और भावनात्मक क्षति को भी न्यायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना।
कानूनी महत्व
पटना हाई कोर्ट की यह टिप्पणी प्रशासनिक विध्वंस की कार्रवाई में कानूनी प्रक्रिया, नागरिकों के आश्रय के अधिकार और राज्य की जवाबदेही के महत्व को रेखांकित करती है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी अवैध भीड़ की कार्रवाई का हवाला देकर प्रशासनिक अधिकारी अपनी संवैधानिक और कानूनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकते।
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