सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: एक ही दिन नोटिस देने से जॉइंट कमेटी अनिवार्य नहीं, जब तक दोनों सदनों में मोशन एडमिट न हो

जजेज़ (इंक्वायरी) एक्ट, 1968 की व्याख्या पर ऐतिहासिक निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि एक ही दिन दोनों सदनों में नोटिस दिया गया हो लेकिन दोनों में एडमिट न हो, तो जॉइंट कमेटी अनिवार्य नहीं है। डिप्टी चेयरमैन को अनुच्छेद 91 के तहत पूर्ण अधिकार है।

✍️ कानूनी संवाददाता | नई दिल्ली

🔴 सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: एक ही दिन नोटिस देने से जॉइंट कमेटी अनिवार्य नहीं, जब तक दोनों सदनों में मोशन एडमिट न हो

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीशों के महाभियोग (impeachment) की प्रक्रिया से जुड़े एक अत्यंत संवेदनशील संवैधानिक प्रश्न पर बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि लोकसभा और राज्यसभा में एक ही दिन नोटिस ऑफ मोशन दिया गया हो, लेकिन दोनों सदनों में उसे स्वीकार (admit) नहीं किया गया हो, तो संयुक्त समिति (Joint Committee) का गठन अनिवार्य नहीं है

जस्टिस दिपांकर दत्ता और सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने एक मौजूदा दिल्ली हाईकोर्ट जज द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए कहा कि जजेज़ (इंक्वायरी) एक्ट, 1968 की धारा 3(2) के पहले प्रावधान (first proviso) का दायरा सीमित है और उसे व्यापक रूप से पढ़कर संसदीय प्रक्रिया को बाधित नहीं किया जा सकता।


⚖️ क्या था कानूनी सवाल?

यह मामला पहली बार इस प्रश्न को उठाता है कि:

क्या केवल इस आधार पर कि दोनों सदनों में एक ही दिन नोटिस दिया गया था, संयुक्त समिति का गठन अनिवार्य हो जाता है—even यदि एक सदन में नोटिस एडमिट ही न हुआ हो?

सुप्रीम कोर्ट ने इसका उत्तर स्पष्ट “न” में दिया।


🔍 सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियाँ (Key Holdings)

1️⃣ Section 3(2) का पहला प्रावधान कब लागू होगा?

अदालत ने कहा:

  • पहला प्रावधान केवल एक ही विशेष परिस्थिति में लागू होता है
  • जब दोनों सदनों में नोटिस एक ही दिन दिया जाए और दोनों में उसे स्वीकार (admit) भी कर लिया जाए

“पहला प्रावधान न तो सर्वव्यापी है और न ही सभी संभावित परिस्थितियों को कवर करता है।”

अदालत ने चेतावनी दी कि यदि याचिकाकर्ता की दलील मानी जाए, तो यह:

  • न्यायिक कानून-निर्माण (judicial legislation) होगा
  • और संसद की कार्यवाही को जानबूझकर निष्फल करने का हथियार बन सकता है

“प्रावधान को ऐसा वीटो नहीं बनाया जा सकता जिससे कार्यवाही ही ठप हो जाए।”


2️⃣ डिप्टी चेयरमैन की संवैधानिक क्षमता पर मुहर

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि:

  • केवल राज्यसभा के चेयरमैन ही नोटिस स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं
  • डिप्टी चेयरमैन को यह अधिकार नहीं है
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सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा:

  • अनुच्छेद 91 के तहत,
  • जब चेयरमैन का पद रिक्त हो,
  • तो डिप्टी चेयरमैन ही चेयरमैन के सभी कर्तव्यों का निर्वहन करता है

“यदि डिप्टी चेयरमैन को यह अधिकार न दिया जाए, तो संवैधानिक शून्य (constitutional vacuum) पैदा हो जाएगा।”


3️⃣ स्पीकर की कार्रवाई स्वतंत्र और वैध

अदालत ने स्पष्ट किया कि:

  • लोकसभा स्पीकर ने
  • राज्यसभा से आधिकारिक सूचना मिलने के बाद
  • कि नोटिस एडमिट नहीं हुआ है
  • स्वतंत्र रूप से समिति गठित की

यह कार्रवाई:

  • राज्यसभा में क्या हुआ या नहीं हुआ
  • उस पर निर्भर नहीं करती,
  • जब तक दोनों सदनों में मोशन एडमिट न हो

“भले ही डिप्टी चेयरमैन का निर्णय गलत मान लिया जाए, तब भी स्पीकर की कार्रवाई स्वतः अवैध नहीं हो जाती।”


4️⃣ राज्यसभा सचिवालय की भूमिका पर सख्त टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:

  • संसद सचिवालय की भूमिका केवल प्रशासनिक (administrative) है
  • वह अर्ध-न्यायिक (quasi-judicial) भूमिका नहीं निभा सकता

अदालत ने पाया कि:

  • सचिव-जनरल ने नोटिस को “not in order” बताते समय
  • अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर
  • आरोपों के गुण-दोष (merits) पर विचार किया

हालाँकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि:

  • ये टिप्पणियाँ अकादमिक प्रकृति की हैं
  • और इससे डिप्टी चेयरमैन के निर्णय पर कोई असर नहीं पड़ता

5️⃣ Article 32 के तहत कोई राहत नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा कि:

  • अनुच्छेद 32 केवल मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए है
  • संसद की आंतरिक प्रक्रियाओं में
  • तब तक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता
  • जब तक किसी मौलिक अधिकार का प्रत्यक्ष उल्लंघन न हो

“प्रतिष्ठा को हुआ नुकसान, चाहे कितना भी दुर्भाग्यपूर्ण हो, संवैधानिक प्रक्रिया को रोकने का आधार नहीं हो सकता।”


📜 मामले की पृष्ठभूमि (Factual Matrix)

  • 14 मार्च 2025: दिल्ली हाईकोर्ट जज के सरकारी आवास पर आग
  • कथित रूप से जली हुई नकदी बरामद
  • CJI द्वारा गठित इन-हाउस कमेटी ने आरोप सही पाए
  • रिपोर्ट राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजी गई
  • पहले की रिट याचिका अगस्त 2025 में खारिज
  • संसद के मानसून सत्र में दोनों सदनों में नोटिस
  • राज्यसभा में नोटिस एडमिट नहीं
  • लोकसभा स्पीकर ने समिति गठित की
  • इसी के खिलाफ वर्तमान याचिका दायर हुई
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🧠 निर्णय का संवैधानिक महत्व

यह फैसला:

  • न्यायिक महाभियोग प्रक्रिया की स्पष्टता तय करता है
  • संसद के दोनों सदनों की स्वायत्त भूमिका को सुरक्षित करता है
  • Article 32 की सीमाओं को दोहराता है
  • और न्यायपालिका व विधायिका के बीच संवैधानिक संतुलन को बनाए रखता है

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