TVK विधायक को राहत, मामला एक पोस्टल बैलेट की कथित गड़बड़ी से जुड़ा
सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के उस अंतरिम आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें TVK विधायक आर. श्रीनिवास सेतुपति को तमिलनाडु विधानसभा कार्यवाही में भाग लेने से रोका गया था। मामला एक पोस्टल बैलेट की कथित गड़बड़ी से जुड़ा है।
Supreme Court of India ने बुधवार को Madras High Court के उस अंतरिम आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें R Srinivasa Sethupati को तमिलनाडु विधानसभा की कार्यवाही में भाग लेने से प्रतिबंधित किया गया था। यह विवाद एक पोस्टल बैलेट के कथित गलत निर्वाचन क्षेत्र में गिने जाने को लेकर उठा था।
न्यायमूर्ति Vikram Nath, न्यायमूर्ति Sandeep Mehta और न्यायमूर्ति Vijay Bishnoi की पीठ ने हाईकोर्ट की कार्यवाही पर भी फिलहाल रोक लगा दी।
हाईकोर्ट के आदेश को बताया “Atrocious”
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि हाईकोर्ट द्वारा चुनावी विवाद को रिट याचिका के जरिए सुनना गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
जस्टिस संदीप मेहता ने टिप्पणी की:
“It’s atrocious.”
पीठ ने कहा कि जब चुनाव परिणाम घोषित हो चुके हों, तब ऐसे विवादों का समाधान चुनाव याचिका (Election Petition) के जरिए होना चाहिए, न कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका के माध्यम से।
क्या है पूरा विवाद?
मामला तिरुपत्तूर विधानसभा सीट से जुड़ा है, जहां TVK विधायक श्रीनिवास सेतुपति ने KR Periakaruppan को महज एक वोट से हराया था।
DMK उम्मीदवार का आरोप था कि एक पोस्टल बैलेट गलती से दूसरे निर्वाचन क्षेत्र में गिन लिया गया। उनका दावा था कि यदि वह वोट सही तरीके से गिना जाता, तो मुकाबला बराबरी पर समाप्त होता।
DMK की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Mukul Rohatgi ने अदालत में कहा:
“एक वोट गलत निर्वाचन क्षेत्र में चला गया। यदि वह सही जगह गिना जाता, तो परिणाम ड्रॉ होता और फिर कानून के अनुसार टॉस की नौबत आती।”
TVK ने उठाया संविधान का मुद्दा
TVK विधायक सेतुपति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Abhishek Manu Singhvi ने दलील दी कि संविधान का अनुच्छेद 329(b) चुनावी मामलों में हाईकोर्ट की रिट क्षेत्राधिकार पर स्पष्ट रोक लगाता है।
याचिका में कहा गया कि:
- चुनाव विवाद केवल Representation of the People Act, 1951 की धारा 80 के तहत चुनाव याचिका के माध्यम से उठाए जा सकते हैं।
- पोस्टल बैलेट की गलत गिनती का मुद्दा धारा 100(1)(d)(iii) के तहत आता है।
- एक वोट का अंतर “असाधारण परिस्थिति” नहीं माना जा सकता जिससे रिट याचिका स्वीकार की जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों दी राहत?
सेतुपति की ओर से कहा गया कि हाईकोर्ट ने “साक्ष्य संरक्षण” के नाम पर ऐसा अंतरिम आदेश पारित कर दिया, जिसने प्रभावी रूप से एक निर्वाचित विधायक को निलंबित कर दिया।
याचिका में यह भी कहा गया कि:
- निर्वाचन आयोग ने तथ्यों पर विवाद जताया है,
- मामले में विस्तृत साक्ष्य और ट्रायल की आवश्यकता है,
- और यह सब केवल चुनाव याचिका में ही संभव है।
सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों पर प्रथम दृष्टया सहमति जताते हुए हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी।
मद्रास हाईकोर्ट की कार्यवाही भी स्थगित
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया:
“इस बीच, चुनौती दिए गए आदेश का प्रभाव और संचालन स्थगित रहेगा तथा हाईकोर्ट में लंबित कार्यवाही पर भी रोक रहेगी।”
कोर्ट ने DMK उम्मीदवार को दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का समय दिया है। इसके बाद TVK विधायक प्रत्युत्तर दाखिल करेंगे।
राजनीतिक संतुलन पर हाईकोर्ट की टिप्पणी भी विवाद में
सेतुपति की याचिका में हाईकोर्ट की उस टिप्पणी को भी चुनौती दी गई, जिसमें विधानसभा में उनके वोट के “राजनीतिक प्रभाव” का उल्लेख किया गया था।
याचिका में कहा गया कि राजनीतिक समीकरणों पर न्यायिक टिप्पणी चुनाव विवाद के दायरे से बाहर है और यह न्यायपालिका का अनावश्यक हस्तक्षेप माना जाएगा।
चुनावी कानून पर अहम संकेत
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि अदालत ने एक बार फिर स्पष्ट संकेत दिया है कि चुनाव प्रक्रिया और परिणामों को चुनौती देने का विशेष वैधानिक ढांचा मौजूद है, जिसे दरकिनार कर सीधे रिट याचिका दाखिल नहीं की जा सकती।
अब इस मामले की अगली सुनवाई जवाबी हलफनामों के बाद होगी।
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