अनुच्छेद 21 जनहित याचिका दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने अनुच्छेद 21 के तहत विभिन्न मौलिक अधिकारों के व्यापक क्रियान्वयन की मांग वाली जनहित याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी। अदालत ने कहा कि याचिका में मांगी गई राहतें अत्यधिक व्यापक हैं और सीमित मुद्दों पर नई याचिका दायर की जा सकती है।
क्या है मामला?
दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत विभिन्न मौलिक अधिकारों के व्यापक क्रियान्वयन की मांग करने वाली एक जनहित याचिका (PIL) को वापस लेने की अनुमति दे दी।
मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने कहा कि याचिका में मांगी गई राहतें अत्यधिक व्यापक (Too Broad) हैं और उन पर एक ही याचिका में विचार करना संभव नहीं है।
हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता को सीमित मुद्दों और विशिष्ट शिकायतों के साथ नई याचिका दाखिल करने की स्वतंत्रता प्रदान की।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने निश्चित रूप से जनहित की भावना से याचिका दायर की है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या न्यायालय इतनी व्यापक मांगों पर एक साथ निर्णय दे सकता है।
पीठ ने कहा कि—
याचिका जनहित में दायर की गई है, लेकिन इसमें मांगी गई राहतें इतनी व्यापक हैं कि उन पर एक ही कार्यवाही में विचार नहीं किया जा सकता।
इसी आधार पर अदालत ने याचिका वापस लेने की अनुमति दी।
याचिका में क्या मांगें की गई थीं?
याचिका अधिवक्ता सुनील कुमार शर्मा ने स्वयं याचिकाकर्ता के रूप में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर की थी।
याचिका में अदालत से परमादेश (Writ of Mandamus) जारी कर अनुच्छेद 21 से जुड़े विभिन्न अधिकारों को प्रभावी ढंग से लागू कराने की मांग की गई थी।
अनुच्छेद 21 के तहत किन अधिकारों का हवाला दिया गया?
याचिका में कहा गया कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार (Article 21) के अंतर्गत कई अधिकार शामिल हैं, जैसे—
- चिकित्सा उपचार का अधिकार।
- आजीविका का अधिकार।
- शांतिपूर्ण जीवन जीने का अधिकार।
- त्वरित न्याय (Speedy Trial) का अधिकार।
- प्रतिष्ठा की रक्षा का अधिकार।
- प्रदूषण मुक्त जल का अधिकार।
- शिक्षा का अधिकार।
- स्वास्थ्य का अधिकार।
- अवैध हिरासत से सुरक्षा।
अन्य क्या मांगें की गई थीं?
याचिका में इसके अतिरिक्त कई अन्य निर्देश भी मांगे गए थे, जिनमें शामिल हैं—
- जन्म के आधार पर नागरिकता से संबंधित दिशा-निर्देश।
- पासपोर्ट को नागरिकता का ठोस प्रमाण मानने की व्यवस्था।
- स्कूल शिक्षा को अधिक रोजगारोन्मुख (Employment-Oriented) बनाने के उपाय।
व्यावसायिक शिक्षा को अनिवार्य बनाने का सुझाव
याचिकाकर्ता ने स्कूलों में अनिवार्य व्यावसायिक प्रशिक्षण (Vocational Training) शुरू करने का भी सुझाव दिया।
इसके तहत विद्यार्थियों को विभिन्न कौशलों का प्रशिक्षण देने की मांग की गई, जैसे—
- बढ़ईगिरी (Carpentry)
- प्लंबिंग
- इलेक्ट्रिकल कार्य
- कंप्यूटर कौशल
- फूड प्रोसेसिंग
- सिलाई एवं परिधान निर्माण
- हस्तशिल्प
- साबुन एवं मोमबत्ती निर्माण
- अगरबत्ती निर्माण
- योग
- अन्य कौशल आधारित प्रशिक्षण
याचिका के अनुसार, इससे युवाओं में बेरोजगारी कम करने में मदद मिलेगी।
अदालत ने क्यों नहीं सुनी याचिका?
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि याचिका में मांगी गई राहतें अत्यधिक व्यापक हैं और उन्हें एक ही जनहित याचिका में प्रभावी रूप से नहीं परखा जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता किसी विशिष्ट मुद्दे या सीमित शिकायत के संबंध में याचिका दायर करते हैं, तो उस पर अलग से विचार किया जा सकता है।
अभी कोई अंतिम फैसला नहीं
हाईकोर्ट ने अनुच्छेद 21 के दायरे या याचिका में उठाए गए किसी भी मुद्दे के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की है।
अदालत ने केवल यह कहा है कि इतनी व्यापक मांगों पर एक ही जनहित याचिका में सुनवाई संभव नहीं है और याचिकाकर्ता को सीमित मुद्दों के साथ नई याचिका दायर करने की स्वतंत्रता दी है।
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