आईटी एक्ट की धारा 66 गैर-जमानती नहीं; सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की टिप्पणी रद्द की

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सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66 की प्रकृति तय करने के लिए धारा 77-बी को पढ़ना आवश्यक है। कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की उस टिप्पणी को रद्द कर दिया, जिसमें धारा 66 को गैर-जमानती माना गया था।


सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (Information Technology Act, 2000) की धारा 66 की प्रकृति को लेकर महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि इस धारा को स्वतंत्र रूप से नहीं, बल्कि धारा 77-बी के साथ पढ़ा जाना चाहिए। इसी प्रावधान से यह निर्धारित होता है कि धारा 66 के तहत अपराध जमानती है या गैर-जमानती।

न्यायमूर्ति एम.एम. सुन्दरेश और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की उस टिप्पणी को रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि धारा 66 को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम में जमानती अपराध के रूप में परिभाषित नहीं किया गया है।


क्या था मामला?

मामला एक हैबियस कॉर्पस याचिका से जुड़ा था, जिसमें अपीलकर्ता ने अपने पुत्र की रिहाई की मांग की थी।

अपीलकर्ता के पुत्र को एक लुक आउट सर्कुलर (Look Out Circular) के आधार पर हवाई अड्डे पर हिरासत में लिया गया था। यह कार्रवाई उस एफआईआर के संबंध में की गई थी, जिसमें—

  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66, 72 और 84-सी, तथा
  • भारतीय न्याय संहिता, 2023 (Bharatiya Nyaya Sanhita) की धारा 78(1)(ii)
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के तहत आरोप दर्ज किए गए थे।


हाईकोर्ट ने क्या कहा था?

हैबियस कॉर्पस याचिका का निस्तारण करते समय हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि आईटी एक्ट की धारा 66 को अधिनियम में जमानती अपराध के रूप में परिभाषित नहीं किया गया है, इसलिए इसे गैर-जमानती माना गया।

इसी कानूनी प्रश्न को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई।


सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने निर्णय देते समय सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 77-बी पर विचार ही नहीं किया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि—

धारा 66 के तहत अपराध की प्रकृति निर्धारित करने के लिए धारा 77-बी को साथ में पढ़ना अनिवार्य है।

इसलिए केवल धारा 66 को देखकर उसे गैर-जमानती मानना कानून के अनुरूप नहीं है।


क्या कहा धारा 77-बी में?

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 77-बी यह निर्धारित करती है कि अधिनियम के किन अपराधों को जमानती या गैर-जमानती माना जाएगा।

इसी कारण धारा 66 की प्रकृति का निर्धारण भी धारा 77-बी के आलोक में किया जाना चाहिए।


सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की उस टिप्पणी को रद्द (Set Aside) कर दिया, जिसमें धारा 66 को गैर-जमानती माना गया था।

हालांकि, अदालत ने इस कानूनी स्पष्टीकरण के साथ अपील का निस्तारण कर दिया।


फैसले का महत्व

यह निर्णय स्पष्ट करता है कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के अपराधों की जमानती या गैर-जमानती प्रकृति निर्धारित करते समय संबंधित वैधानिक प्रावधानों, विशेष रूप से धारा 77-बी, को अनदेखा नहीं किया जा सकता। यह फैसला भविष्य में आईटी एक्ट के मामलों में जमानत से जुड़े विवादों के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करेगा।

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मामला: Maharaj Saran v. State of Punjab, SLP (Crl.) No. 6547 of 2026, निर्णय दिनांक 16 जुलाई 2026।


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