FIR दर्ज कराने के लिए सीधे हाईकोर्ट नहीं जा सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने Article 226 की याचिका खारिज की

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि FIR दर्ज न होने पर पीड़ित को पहले BNSS की धारा 175(3) के तहत मजिस्ट्रेट से संपर्क करना होगा। Article 226 के तहत सीधे हाईकोर्ट आना उचित नहीं।

FIR के लिए हाईकोर्ट को प्रथम मंच नहीं बनाया जा सकता

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पुलिस द्वारा FIR दर्ज नहीं किए जाने की स्थिति में पीड़ित व्यक्ति सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाकर FIR दर्ज कराने का निर्देश नहीं मांग सकता, जब कानून में प्रभावी वैधानिक उपाय उपलब्ध हों।

कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में पीड़ित को पहले भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत उपलब्ध उपायों का इस्तेमाल करना चाहिए। हाईकोर्ट की असाधारण संवैधानिक अधिकारिता को FIR दर्ज कराने के लिए प्रथम मंच के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

यह आदेश जस्टिस चंद्र धारी सिंह और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने रमेश उपाध्याय की याचिका पर पारित किया।

जगद्गुरु रामभद्राचार्य के कथित बयान को लेकर FIR की मांग

याचिकाकर्ता ने जगद्गुरु रामभद्राचार्य के कथित बयानों को लेकर FIR दर्ज करने और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने की मांग की थी।

याची के अनुसार, 1 अक्टूबर 2025 को वाराणसी में कुछ लोगों ने उसे सोशल मीडिया पर प्रसारित एक वीडियो दिखाया था। याची का दावा था कि वीडियो में एक विशेष समुदाय के लोगों के संबंध में कथित आपत्तिजनक टिप्पणियां की गई थीं।

याचिकाकर्ता ने कहा कि इन कथित टिप्पणियों से उसे और समुदाय के अन्य लोगों को मानसिक पीड़ा, अपमान तथा धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंची।

वाराणसी पुलिस आयुक्त को शिकायत भेजने का दावा

याचिकाकर्ता के अनुसार, उसने 8 अक्टूबर 2025 को वाराणसी के पुलिस आयुक्त को शिकायत भेजकर FIR दर्ज करने की मांग की थी। उसका आरोप था कि पुलिस ने शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की।

याची ने सुप्रीम कोर्ट के Lalita Kumari v. Government of Uttar Pradesh फैसले का हवाला देते हुए दलील दी कि संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर FIR दर्ज करना पुलिस का अनिवार्य दायित्व है।

हालांकि, राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याची ने संबंधित पुलिस थाने में FIR दर्ज कराने के लिए संपर्क ही नहीं किया था। राज्य की ओर से यह भी कहा गया कि 8 अक्टूबर की शिकायत पुलिस को प्राप्त हुई थी, इसका कोई प्रमाण या डाक रिकॉर्ड याचिकाकर्ता ने प्रस्तुत नहीं किया।

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FIR दर्ज न होने पर BNSS की धारा 175(3) के तहत मजिस्ट्रेट से संपर्क करें

राज्य की दलील से सहमति जताते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यदि पुलिस FIR दर्ज नहीं करती है तो पीड़ित के पास BNSS की धारा 175(3) के तहत संबंधित मजिस्ट्रेट से संपर्क करने का प्रभावी वैधानिक उपाय मौजूद है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पुलिस FIR दर्ज नहीं करती या FIR दर्ज होने के बावजूद उचित जांच नहीं करती, तो संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष जाना प्राथमिक और प्रभावी remedy है।

मजिस्ट्रेट, कानून के तहत, FIR दर्ज करने का निर्देश देने के साथ-साथ उचित जांच सुनिश्चित कर सकता है और आवश्यक परिस्थितियों में जांच की निगरानी भी कर सकता है।

‘Sakiri Vasu’ फैसले का सुप्रीम कोर्ट से संदर्भ

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Sakiri Vasu v. State of Uttar Pradesh फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट के पास FIR दर्ज कराने और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित कराने के लिए व्यापक शक्तियां हैं।

इसलिए जब कानून स्वयं शिकायतकर्ता को प्रभावी remedy उपलब्ध कराता है, तो उस remedy को अपनाए बिना सीधे हाईकोर्ट की असाधारण jurisdiction का इस्तेमाल करना उचित नहीं है।

‘Sujal Biswas Atavar’ फैसले का भी उल्लेख

खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया Sujal Biswas Atavar v. State of Maharashtra फैसले का भी हवाला दिया।

कोर्ट ने कहा कि जब BNSS में प्रभावी वैधानिक उपाय उपलब्ध हों और याचिकाकर्ता ने उन उपायों का इस्तेमाल न किया हो, तब Article 226 के तहत High Court की extraordinary jurisdiction का इस्तेमाल केवल FIR दर्ज कराने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

‘Lalita Kumari’ का मतलब वैधानिक उपायों को दरकिनार करना नहीं

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि Lalita Kumari का निर्णय पुलिस को संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर FIR दर्ज करने का दायित्व निर्धारित करता है।

लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि पुलिस की कथित निष्क्रियता के मामले में शिकायतकर्ता कानून द्वारा उपलब्ध वैधानिक remedies को दरकिनार कर सीधे हाईकोर्ट पहुंच जाए।

अदालत ने कहा कि FIR दर्ज करने के संबंध में पुलिस के दायित्व और शिकायतकर्ता के लिए उपलब्ध procedural remedies—दोनों को साथ-साथ समझना होगा।

हाईकोर्ट ने सीधे Article 226 याचिकाओं पर जताई चिंता

खंडपीठ ने इस बात पर चिंता जताई कि बड़ी संख्या में लोग FIR दर्ज कराने के लिए उपलब्ध वैधानिक उपायों का इस्तेमाल किए बिना सीधे हाईकोर्ट पहुंच रहे हैं।

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कोर्ट ने कहा कि निष्पक्ष जांच का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन सहानुभूति प्रक्रिया का स्थान नहीं ले सकती।

BNSS में निर्धारित प्रक्रिया को केवल तकनीकी औपचारिकता नहीं माना जा सकता। यह शिकायतों के उचित स्तर पर निस्तारण और न्यायिक निगरानी के लिए बनाई गई महत्वपूर्ण व्यवस्था है।

शिकायत पुलिस तक पहुंची थी या नहीं, इस पर भी सवाल

अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि याची की शिकायत वास्तव में पुलिस तक पहुंची थी या नहीं, यह तथ्य स्वयं विवादित था।

याचिकाकर्ता की ओर से 8 अक्टूबर 2025 को भेजी गई शिकायत के पुलिस द्वारा प्राप्त किए जाने का कोई ठोस प्रमाण अथवा postal tracking record पेश नहीं किया गया।

ऐसी परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने सीधे Article 226 के तहत FIR दर्ज कराने के लिए अपनी extraordinary jurisdiction इस्तेमाल करने का पर्याप्त आधार नहीं पाया।

याचिका खारिज, वैधानिक उपाय अपनाने की स्वतंत्रता

इन परिस्थितियों में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ता को कानून के तहत उपलब्ध उचित वैधानिक उपाय अपनाने की स्वतंत्रता प्रदान की।

इस फैसले का मुख्य संदेश यह है कि पुलिस द्वारा FIR दर्ज न करने की शिकायत के मामले में BNSS की धारा 175(3) के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष remedy को नजरअंदाज कर सीधे Article 226 jurisdiction का सहारा नहीं लिया जा सकता, खासकर तब जब मामले में कोई असाधारण परिस्थिति हाईकोर्ट के सीधे हस्तक्षेप की मांग न करती हो।

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