इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिल्ली यूनिवर्सिटी की ग्रेजुएट आकृति चौधरी की NSA हिरासत रद्द करते हुए राज्य की कार्रवाई पर सख्त टिप्पणी की और ₹5 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया।
NSA के तहत हिरासत रद्द, हाईकोर्ट ने राज्य की कार्रवाई पर जताई नाराजगी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा में फैक्ट्री श्रमिकों के विरोध-प्रदर्शन से जुड़े मामले में 25 वर्षीय दिल्ली यूनिवर्सिटी ग्रेजुएट आकृति चौधरी के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत की गई हिरासत को रद्द कर दिया।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने 2 सितंबर को हिरासत आदेश को निरस्त किया। 15 पन्नों के फैसले में अदालत ने राज्य की कार्रवाई और नौकरशाही-पुलिस के अधिकारों के इस्तेमाल पर कड़ी टिप्पणी की।
कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि उत्तर प्रदेश में नौकरशाही और पुलिस द्वारा शक्ति का अनियंत्रित दुरुपयोग जारी रहा तो राज्य को “Orwellian Dystopia” में बदलने में देर नहीं लगेगी।
अधिकारियों को संविधान के प्रति निष्ठा की याद दिलाई
अदालत ने कहा कि जब नौकरशाही और पुलिस अपने शपथ के अनुरूप काम करती हैं, तो राज्य की जनता उन्हें अत्यंत सम्मान देती है। लेकिन जब अधिकारी अपनी शपथ की अनदेखी करते हुए उसके विपरीत कार्य करते हैं, तो जनता उन्हें ब्रिटिश शासन की दमनकारी विरासत के रूप में देखने लग सकती है।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति नागरिकों में आक्रोश और असंतोष पैदा कर सकती है तथा नागरिक स्वतंत्रताओं को प्रभावित करने वाली गैर-कानूनी कार्रवाई होने पर अदालतें कठोर आदेश पारित कर सकती हैं।
पीठ ने कहा कि यदि नौकरशाही में मौजूद अधिकारी अपनी शक्तियों के दुरुपयोग से बाज नहीं आए, तो “it shan’t be long before the errant in the bureaucracy reduce the State of Uttar Pradesh to an Orwellian Dystopia.”
IAS-IPS और नागरिकों के संबंध से तय होता है Rule of Law
हाईकोर्ट ने IAS और IPS अधिकारियों तथा उत्तर प्रदेश के उन नागरिकों, जिनकी वे सेवा करते हैं, के बीच संबंध को Rule of Law के अस्तित्व से जोड़ा।
कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों को कानून ने व्यापक शक्तियां दी हैं और इसके पीछे महत्वपूर्ण कारण हैं। उनका दायित्व है कि वे नागरिकों के संवैधानिक एवं कानूनी अधिकारों, सम्मान, गरिमा और कल्याण की रक्षा करते हुए सुशासन सुनिश्चित करें और साथ ही राज्य की स्थिरता तथा देश की एकता एवं अखंडता को बनाए रखें।
लेकिन अदालत ने याद दिलाया कि “with great powers come great responsibility.” इसलिए नौकरशाही को समय-समय पर यह आत्मनिरीक्षण करना चाहिए कि उसके द्वारा प्रदान की गई शक्ति का इस्तेमाल किस सीमा तक और किस तरीके से किया जा रहा है।
अधिकारियों की निष्ठा राजनीतिक कार्यपालिका नहीं, संविधान के प्रति
अदालत ने कहा कि IAS और IPS अधिकारियों को यह समझना चाहिए कि उनकी निष्ठा संविधान और भारत के प्रति है, न कि राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति।
फैसले में कहा गया कि अधिकारियों की ईमानदारी और निष्पक्षता उन लोगों के प्रति होनी चाहिए जिनकी वे सेवा करते हैं। लोकतंत्र में अधिकारी जनता के सेवक हैं और जनता ही वास्तविक “masters” है।
कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि IAS और IPS देश की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं में से लोगों को आकर्षित करते हैं और तीन चरणों वाली कठिन चयन प्रक्रिया के बाद वे इन महत्वपूर्ण पदों पर पहुंचते हैं। ऐसे में उनसे संवैधानिक मूल्यों और अपनी शपथ के अनुरूप कार्य करने की अपेक्षा और भी अधिक है।
शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का ‘Safety Valve’
कोर्ट ने राज्य को यह भी याद दिलाया कि हर समाज में सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर तनाव और असहमति होना स्वाभाविक है।
अदालत ने शांतिपूर्ण आंदोलनों को pressure cooker के safety valve से तुलना करते हुए कहा कि विरोध-प्रदर्शन लोगों के भीतर जमा असंतोष को बाहर निकलने का माध्यम देते हैं। यदि ऐसे आंदोलनों को रोककर लोगों की भावनाओं को दबाया जाता है, तो जब लोग सड़कों पर उतरते हैं, स्थिति हिंसक होना और कानून-व्यवस्था के लिए मुश्किल पैदा करना अधिक संभावित हो सकता है।
श्रमिकों के अधिक वेतन और मानवीय काम के घंटे की मांग को लेकर था प्रदर्शन
पुलिस ने अपने पक्ष में ऐसे वीडियो फुटेज पर भरोसा किया जिसमें बड़ी संख्या में लोग दिखाई दे रहे थे। इनमें पुरुष और महिलाएं ग्रामीण पारंपरिक परिधान में थे तथा एक व्यक्ति भीड़ को संबोधित करता हुआ दिखाई दे रहा था।
हाईकोर्ट ने इन वीडियो को लेकर पुलिस की दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि किसी भी वीडियो में भीड़ को उत्तेजित या हथियारों से लैस नहीं दिखाया गया था।
इसके बजाय भीड़ संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों का इस्तेमाल करती और अधिक वेतन तथा मानवीय काम के घंटों की मांग को लेकर प्रदर्शन करती हुई दिखाई दे रही थी।
NSA हिरासत अपवाद है, जमानत का विकल्प नहीं
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि National Security Act (NSA) के तहत हिरासत एक अपवाद है। इसका इस्तेमाल किसी ऐसे व्यक्ति को हिरासत में रखने के विकल्प के रूप में नहीं किया जा सकता जिसे उसके खिलाफ चल रहे मामले की merits के आधार पर जमानत मिल सकती है।
अदालत ने राज्य द्वारा “गढ़ी हुई reasoning” के आधार पर किसी व्यक्ति को हिरासत में रखने के प्रयास को स्वीकार्य नहीं माना।
District Magistrate के हिरासत आदेश पर भी कड़ी टिप्पणी
गौतम बुद्ध नगर के District Magistrate द्वारा हिरासत के लिए दिए गए grounds को अदालत ने “repetitive, speculative and only an opinion based” बताया।
पीठ ने कहा कि इन opinions के समर्थन में “shred of evidence/material” का भी उल्लेख नहीं किया गया था।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि detention के grounds केवल आरोप और opinion तक सीमित नहीं रह सकते। यदि District Magistrate के मन में कोई subjective opinion बनती है तो उसे समर्थन देने के लिए रिकॉर्ड पर मौजूद material का उल्लेख होना आवश्यक है। अन्यथा ऐसी कार्रवाई मनमानी मानी जाएगी।
Article 21 के अधिकारों को surmises के आधार पर नहीं छीना जा सकता
अदालत ने कहा कि संविधान के Article 21 के तहत किसी व्यक्ति के अधिकारों का सीधे उल्लंघन करने वाली शक्ति का इस्तेमाल केवल surmises, biases, conjectures और opinions के आधार पर नहीं किया जा सकता।
NSA के तहत हिरासत के लिए मजबूत और ठोस material आवश्यक है। केवल अनुमान या आशंका पर्याप्त नहीं है।
संवैधानिक अदालत को यह सुनिश्चित करना होगा कि District Magistrate की subjective satisfaction महज अनुमान और अटकलों से आगे बढ़कर रिकॉर्ड पर उपलब्ध material पर आधारित हो।
NSA हिरासत के लिए तत्काल खतरे का ठोस आधार जरूरी
हाईकोर्ट ने कहा कि detention order की समीक्षा करते समय Constitutional Court को इस बात से संतुष्ट होना आवश्यक है कि District Magistrate की subjective satisfaction रिकॉर्ड पर उपलब्ध material से उचित रूप से समर्थित है।
साथ ही यह भी दिखना चाहिए कि यदि व्यक्ति को तत्काल हिरासत में नहीं लिया जाता, तो public order के बाधित होने या national security को नुकसान पहुंचाने की वास्तविक और गंभीर संभावना है।
यदि ऐसा material मौजूद नहीं है, तो detention के grounds और detention order दोनों को unjustified मानकर रद्द किया जा सकता है।
‘Casual and cavalier exercise of authority’ पर ₹5 लाख मुआवजा
हाईकोर्ट ने गौतम बुद्ध नगर के District Magistrate के माध्यम से राज्य द्वारा की गई कार्रवाई को “casual and cavalier exercise of authority” करार दिया।
अदालत के अनुसार, इस कार्रवाई ने याचिकाकर्ता के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन किया। इसलिए कोर्ट ने आकृति चौधरी को ₹5 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि यह राशि गौतम बुद्ध नगर के District Magistrate के वेतन से वसूल की जाए, जिन्होंने बिना उचित application of mind के detention order पारित किया। इसके अलावा, यदि अन्य अधिकारी भी इस कार्रवाई के लिए जिम्मेदार पाए जाते हैं, तो उनके स्तर तक जिम्मेदारी तय कर वेतन से राशि की वसूली की जा सकती है।
आकृति चौधरी की भूमिका: श्रमिकों के समर्थन में शांतिपूर्ण प्रदर्शन
अदालत के अनुसार, आकृति चौधरी ने श्रमिकों के समर्थन में नागरिकों को एकत्र होने और उनके अधिकारों के लिए आवाज उठाने का आह्वान किया था।
कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई material नहीं था जिससे यह साबित हो कि प्रस्तावित या आयोजित आंदोलन हिंसक होगा अथवा राज्य के अधिकार को चुनौती देगा।
अदालत ने रेखांकित किया कि Freedom of Speech and Expression में किसी मुद्दे के समर्थन में सड़कों पर आकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना और बिना हथियारों के एकत्र होना भी शामिल है, बशर्ते इससे public order को खतरा न हो।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन को केवल आशंका के आधार पर नहीं रोका जा सकता
हाईकोर्ट ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में बिना हथियारों के एकत्र लोगों के बीच कुछ शरारती तत्व हिंसा पैदा कर सकते हैं। ऐसे तत्व किसी ऐसे पक्ष द्वारा भेजे जा सकते हैं जो प्रदर्शन को विफल करना चाहता हो।
अदालत ने कहा कि ऐसे तत्वों की हिंसा के लिए पूरे समूह को जिम्मेदार ठहराना “patently unjust” होगा।
कोर्ट ने चेतावनी दी कि केवल शांति भंग होने की आशंका के आधार पर लोगों को सार्वजनिक स्थानों पर एकत्र होने या अपने अधिकारों के लिए प्रदर्शन करने से रोकना “throwing the baby out of the bath water” जैसा होगा।
पुलिस को बड़े प्रदर्शनों के प्रबंधन और Videography पर जोर
अदालत ने कहा कि राज्य के पास एक मजबूत और सक्षम पुलिस बल है, जिसे बड़े जमावड़ों में public order बनाए रखने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
साथ ही, पुलिस को ऐसे प्रदर्शनों की videography भी करनी चाहिए और यह रिकॉर्ड करना चाहिए कि भीड़ किस तरह व्यवहार कर रही थी। इससे यदि बाद में हिंसा होती है तो वास्तविक जिम्मेदारी तय करने में सहायता मिलेगी।
कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर collective expression of opinion संविधान द्वारा संरक्षित है और राज्य की केवल subjective opinion के आधार पर इस अधिकार को खत्म नहीं किया जा सकता।
फैसले का व्यापक कानूनी संदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला NSA के इस्तेमाल, Article 21, शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार और प्रशासनिक शक्तियों की जवाबदेही को लेकर महत्वपूर्ण संदेश देता है।
फैसले में स्पष्ट किया गया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून जैसे कठोर preventive detention कानून का इस्तेमाल सामान्य आपराधिक प्रक्रिया या संभावित जमानत को दरकिनार करने के लिए नहीं किया जा सकता। राज्य को detention order के समर्थन में ठोस material और स्पष्ट कारण दिखाने होंगे।
साथ ही, अदालत ने प्रशासनिक अधिकारियों को याद दिलाया कि Rule of Law का वास्तविक परीक्षण इस बात से होता है कि राज्य अपनी शक्तियों का इस्तेमाल नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों के साथ किस तरह संतुलित करता है।
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