बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि रजिस्टर्ड सेल डीड में पूरी रकम मिलने और स्वामित्व हस्तांतरण का उल्लेख हो तो अलग अनरजिस्टर्ड एग्रीमेंट के आधार पर धोखाधड़ी का केस नहीं बनता। कोर्ट ने आरोपियों को डिस्चार्ज किया।
रजिस्टर्ड सेल डीड को अनरजिस्टर्ड एग्रीमेंट से नहीं बदला जा सकता
बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा है कि यदि किसी रजिस्टर्ड सेल डीड में पूरी बिक्री राशि प्राप्त होने और संपत्ति का स्वामित्व खरीदार को हस्तांतरित होने का स्पष्ट उल्लेख है, तो उसके विपरीत किसी अलग अनरजिस्टर्ड एग्रीमेंट के आधार पर आपराधिक मामला आगे नहीं बढ़ाया जा सकता, खासकर तब जब संबंधित खरीदार उस एग्रीमेंट के पक्षकार ही न हों।
जस्टिस संदीप डी. पाटील की एकल पीठ ने यह टिप्पणी धारा 227, दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत डिस्चार्ज आवेदन खारिज किए जाने को चुनौती देने वाली आपराधिक याचिका पर सुनवाई करते हुए की।
मामला मूल रूप से दीवानी विवाद का हिस्सा
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से विवाद मूल रूप से दीवानी प्रकृति का दिखाई देता है। अदालत के अनुसार, धोखाधड़ी के अपराध के लिए आवश्यक यह तत्व भी सामने नहीं आया कि आरोपियों की शुरुआत से ही बेईमान मंशा थी।
कोर्ट ने निचली अदालत और पुनरीक्षण अदालत के आदेशों को रद्द करते हुए कहा कि डिस्चार्ज आवेदन पर विचार करते समय चार्जशीट के साथ मौजूद महत्वपूर्ण दस्तावेजों का स्वतंत्र रूप से विश्लेषण किया जाना चाहिए था।
₹2.84 करोड़ के सौदे से जुड़ा था विवाद
विवाद की शुरुआत एक ‘इसार पावती’ से हुई थी, जो एक तरह के मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग के रूप में तैयार की गई थी। इसमें संपत्ति की कुल कीमत ₹2.84 करोड़ तय होने का आरोप था। इस व्यवस्था के तहत ₹11 लाख का भुगतान चेक के माध्यम से किया गया था, जिसमें से ₹5 लाख का एक चेक बाद में बाउंस हो गया।
इसके बाद 7 मई 2014 को उसी संपत्ति के संबंध में आवेदकों के पक्ष में ₹70 लाख की एक रजिस्टर्ड सेल डीड निष्पादित की गई। इस दस्तावेज में स्पष्ट रूप से दर्ज था कि पूरी बिक्री राशि प्राप्त हो चुकी है और संपत्ति का स्वामित्व खरीदारों को हस्तांतरित कर दिया गया है।
शिकायतकर्ता ने अलग अनरजिस्टर्ड एग्रीमेंट पर भरोसा किया
शिकायतकर्ता ने उसी दिन निष्पादित एक अलग अनरजिस्टर्ड एग्रीमेंट पर भरोसा किया। यह एग्रीमेंट शिकायतकर्ता, उसके भाई और एक अन्य आरोपी के बीच था। इसमें कथित तौर पर पहले तय सौदे की शेष राशि का भुगतान किया जाना बाकी बताया गया था।
इसके अलावा, 9 अक्टूबर 2016 के एक ‘परतफेड एग्रीमेंट’ पर भी भरोसा किया गया, जिसमें कथित तौर पर कहा गया था कि ₹2.84 करोड़ में से केवल ₹1.17 करोड़ का भुगतान हुआ है और ₹1.67 करोड़ की राशि बाकी है।
हालांकि, यह महत्वपूर्ण तथ्य था कि मौजूदा आवेदक इन दोनों दस्तावेजों के पक्षकार नहीं थे।
कोर्ट ने कहा—रजिस्टर्ड दस्तावेज महत्वपूर्ण है
हाई कोर्ट ने चार्जशीट का अध्ययन करते हुए पाया कि आवेदकों ने रजिस्टर्ड सेल डीड के माध्यम से संपत्ति का टाइटल हासिल किया था और उसी दस्तावेज में ₹70 लाख की पूरी राशि प्राप्त होने की बात स्पष्ट रूप से दर्ज थी।
कोर्ट ने कहा कि एक ओर रजिस्टर्ड सेल डीड मौजूद है, जबकि शिकायतकर्ता उसी दिन तैयार किए गए एक अनरजिस्टर्ड एग्रीमेंट पर भरोसा कर रहा है, जो रजिस्टर्ड दस्तावेज की शर्तों के विपरीत है।
अदालत ने S. Saktivel v. M. Venugopal Pillai, [(2000) 7 SCC 104] के फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि रजिस्टर्ड एग्रीमेंट की शर्तों में बदलाव किसी अन्य रजिस्टर्ड एग्रीमेंट के माध्यम से ही किया जा सकता है।
खरीदार उन समझौतों के पक्षकार नहीं थे
कोर्ट ने कहा कि रजिस्टर्ड सेल डीड शिकायतकर्ता और आवेदकों के बीच विक्रेता और खरीदार का संबंध स्थापित करती है। जब बिक्री राशि के भुगतान और टाइटल के हस्तांतरण को रजिस्टर्ड दस्तावेज में स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया है, तो उसके विपरीत व्याख्या का कोई आधार नहीं बनता।
अदालत ने कहा कि 7 मई 2014 का अनरजिस्टर्ड एग्रीमेंट और 9 अक्टूबर 2016 का परतफेड एग्रीमेंट आवेदकों के खिलाफ उपयोगी नहीं हो सकते, क्योंकि वे इन दस्तावेजों के पक्षकार ही नहीं थे।
धारा 420 IPC के लिए शुरुआत से धोखाधड़ी की मंशा जरूरी
हाई कोर्ट ने कहा कि धारा 420 IPC के तहत धोखाधड़ी का अपराध स्थापित करने के लिए यह दिखाना आवश्यक है कि आरोपी की बेईमान मंशा लेन-देन की शुरुआत से ही मौजूद थी।
मौजूदा मामले में रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेज यह दिखाते हैं कि आवेदक पहले के कथित मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग, 7 मई 2014 के अलग समझौते और 9 अक्टूबर 2016 के परतफेड एग्रीमेंट के पक्षकार नहीं थे।
ऐसे में अदालत ने माना कि आवेदकों के खिलाफ धारा 420 IPC के तहत अपराध बनना संभव नहीं है।
आपराधिक प्रक्रिया का इस्तेमाल वसूली के लिए नहीं हो सकता
कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि आपराधिक प्रक्रिया का इस्तेमाल व्यक्तिगत बदला लेने, किसी को परेशान करने या बकाया राशि की वसूली के लिए नहीं किया जा सकता।
अदालत ने G. Sagar Suri v. State of U.P., [(2000) 2 SCC 636] का हवाला देते हुए कहा कि हाई कोर्ट की धारा 482 CrPC के तहत शक्तियों का इस्तेमाल न्याय के उद्देश्यों को सुरक्षित करने और अदालत की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए किया जाना चाहिए।
धारा 227 CrPC पर कोर्ट ने दी अहम टिप्पणी
हाई कोर्ट ने कहा कि धारा 227 CrPC के तहत डिस्चार्ज आवेदन पर फैसला करते समय अदालत को बेहद सावधानी बरतनी चाहिए और उसे अभियोजन का महज ‘पोस्ट ऑफिस’ बनकर नहीं रहना चाहिए।
चार्जशीट का हिस्सा बनने वाले प्रत्येक महत्वपूर्ण दस्तावेज का स्वतंत्र रूप से विश्लेषण किया जाना आवश्यक है। कोर्ट के अनुसार, निचली अदालतों ने इस जिम्मेदारी को ठीक से पूरा नहीं किया और महत्वपूर्ण दस्तावेजों पर विचार करने के बजाय केवल मामले के सतही पहलुओं पर ध्यान दिया।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने आरोपियों को किया डिस्चार्ज
बॉम्बे हाई कोर्ट ने आपराधिक आवेदन स्वीकार करते हुए 1 जनवरी 2025 के सोलापुर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश और 23 जुलाई 2025 के सोलापुर सेशन कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया।
इन दोनों अदालतों ने आरोपियों के डिस्चार्ज आवेदन को खारिज कर दिया था। हाई कोर्ट ने अब आवेदकों को अभियोजन से डिस्चार्ज कर दिया है।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि उसके आदेश में की गई टिप्पणियां केवल मौजूदा आवेदकों के मामले तक सीमित रहेंगी। इनका प्रभाव अन्य आरोपियों के खिलाफ चल रहे ट्रायल या लंबित दीवानी कार्यवाही पर नहीं पड़ेगा। लंबित सिविल मामले अपने गुण-दोष के आधार पर स्वतंत्र रूप से तय किए जाएंगे।
मामला: Prabhakar Rajaram Kshirsagar v. State of Maharashtra
क्रिमिनल एप्लिकेशन नंबर: 921 of 2025
फैसला: 24 जुलाई 2026
पीठ: जस्टिस संदीप डी. पाटील, बॉम्बे हाई कोर्ट
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