SC ने विधि आयोग से अदालतों और ट्रिब्यूनलों में जमा रकम के प्रबंधन, निवेश, ब्याज, निकासी और वितरण से संबंधित मौजूदा व्यवस्थाओं पर एक व्यापक और समान कानूनी ढांचा तैयार करने को कहा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालत या ट्रिब्यूनल में डिक्री या मध्यस्थता अवार्ड की रकम जमा करना अपने आप में भुगतान नहीं है। रकम तभी भुगतान मानी जाएगी जब अवार्ड धारक उसे बिना शर्त निकाल सके। कोर्ट ने जमा रकम के प्रबंधन के लिए समान कानूनी व्यवस्था की जरूरत बताते हुए विधि आयोग से व्यापक ढांचे पर विचार करने को कहा।
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट करते हुए कहा है कि अदालत में डिक्री या मध्यस्थता अवार्ड की रकम जमा कर देना अपने आप में भुगतान नहीं माना जा सकता। रकम को तभी भुगतान या डिक्री/अवार्ड की संतुष्टि माना जाएगा, जब वह संबंधित पक्ष के लिए बिना किसी शर्त के उपलब्ध हो और वह उसे निकाल सके।
न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने National Seeds Corporation Ltd. v. National Agro Seeds Corporation (India) मामले में यह व्यवस्था दी। पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें अवार्ड की रकम अदालत में जमा किए जाने के बावजूद अवार्ड देनदार की ब्याज देनदारी को रकम अवार्ड धारक को हस्तांतरित किए जाने तक जारी रखा गया था।
रकम जमा और भुगतान में अंतर
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘जमा करना’ और ‘भुगतान’ समानार्थी नहीं हैं।
यदि अदालत में जमा रकम पर अवार्ड धारक या डिक्री धारक का बिना शर्त नियंत्रण है और वह उसे निकाल सकता है, तो उस सीमा तक इसे भुगतान अथवा अवार्ड/डिक्री की संतुष्टि माना जा सकता है। ऐसी स्थिति में संबंधित रकम पर ब्याज की देनदारी समाप्त हो सकती है।
लेकिन यदि रकम निकालने के लिए कोई शर्त, सुरक्षा या अन्य प्रतिबंध लगाया गया है, तो केवल अदालत में रकम जमा कर देने से ब्याज की देनदारी समाप्त नहीं होगी।
मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि जमा रकम का एक हिस्सा अवार्ड धारक के लिए स्वतंत्र रूप से उपलब्ध नहीं था। इसलिए उस अवधि के लिए ब्याज की देनदारी जारी रही।
अलग-अलग अदालतों में अलग व्यवस्था पर चिंता
पीठ ने अदालतों और ट्रिब्यूनलों में जमा होने वाली रकम के प्रबंधन को लेकर मौजूदा व्यवस्था में एकरूपता की कमी पर चिंता जताई।
कोर्ट ने पाया कि विभिन्न न्यायालयों में इन सवालों पर अलग-अलग प्रक्रियाएं अपनाई जा रही हैं—
- डिक्री या अवार्ड की कितनी रकम जमा की जाए;
- रकम किस बैंक या वित्तीय संस्था में रखी जाए;
- जमा रकम को कैसे निवेश किया जाए;
- निवेश से मिलने वाला ब्याज किसे मिले;
- रकम की निकासी की प्रक्रिया क्या हो;
- जमा राशि को कब रिन्यू या पुनः निवेश किया जाए;
- निवेश और उसके प्रबंधन की निगरानी कौन करे।
पीठ के अनुसार, ऐसी अलग-अलग व्यवस्थाएं समान परिस्थितियों में पक्षकारों के साथ अलग व्यवहार की स्थिति पैदा कर सकती हैं।
मध्यस्थता कानून में पर्याप्त स्पष्टता नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 में अदालत या ट्रिब्यूनल में जमा रकम तथा उस पर मिलने वाले ब्याज से जुड़े सभी पहलुओं को लेकर पर्याप्त स्पष्टता नहीं है।
अपील या अन्य न्यायिक कार्यवाही के दौरान अदालतें मामले की परिस्थितियों के अनुसार रकम जमा करने, उसके निवेश और निकासी को लेकर अलग-अलग निर्देश दे सकती हैं। इससे एक समान राष्ट्रीय व्यवस्था का अभाव बना रहता है।
विधि आयोग से व्यापक कानूनी ढांचे पर विचार
इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने मामले को विधि आयोग के विचार के लिए भेजा है। कोर्ट ने आयोग से अदालतों और ट्रिब्यूनलों में जमा रकम के—
प्रबंधन, निवेश, ब्याज, निकासी और वितरण
से संबंधित मौजूदा व्यवस्थाओं का अध्ययन करने तथा जरूरत पड़ने पर एक व्यापक और समान कानूनी ढांचा तैयार करने पर विचार करने को कहा है।
कोर्ट ने विदेशी व्यवस्थाओं का भी अध्ययन करने का सुझाव दिया है। इसके लिए आयोग को अमेरिका और कनाडा जैसी व्यवस्थाओं पर गौर करने तथा भारतीय रिजर्व बैंक, वित्त मंत्रालय और कानून एवं न्याय मंत्रालय से परामर्श करने को कहा गया है।
कॉमन प्लेटफॉर्म का सुझाव
पीठ ने यह भी सुझाव दिया कि अदालतों और ट्रिब्यूनलों में जमा रकम के प्रबंधन में कॉमन प्लेटफॉर्म के माध्यम से मानकीकरण किया जा सकता है।
ऐसी व्यवस्था में विभिन्न अदालतों और ट्रिब्यूनलों में जमा रकम को एक संगठित प्रणाली के तहत प्रबंधित कर उपयुक्त वित्तीय साधनों में निवेश किया जा सकता है। इससे रकम के सुरक्षित प्रबंधन के साथ-साथ ब्याज और निकासी की प्रक्रिया में भी एकरूपता लाई जा सकती है।
दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार
मूल विवाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने मध्यस्थता अवार्ड की तारीख से लेकर जमा रकम को अवार्ड धारक को ट्रांसफर किए जाने तक ब्याज की देनदारी बरकरार रखी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और अपील का निपटारा कर दिया।
इस फैसले का महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि अदालत में रकम जमा होना और वास्तविक भुगतान होना दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं। भुगतान तभी माना जाएगा जब संबंधित रकम पर डिक्री या अवार्ड धारक का वास्तविक और बिना शर्त उपयोग/निकासी का अधिकार उपलब्ध हो। केवल ऐसी जमा राशि, जिसे निकालने के लिए अतिरिक्त शर्त पूरी करनी पड़े, ब्याज की देनदारी स्वतः समाप्त नहीं करती।
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